History of Munda Tribes 8 : मुंडा समाज में मौजूद हैं दो शाखाएं, लोककथाओं में मिलते हैं प्रमाण

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Pator Munda of jharkhand

मुंडा समाज को दो शाखाएं

History of Munda Tribes : मुंडा जनजाति एक ओर जहां 21 किली या कबीले में बंटी थी, वहीं इनके बीच दो शाखाओं के होने के भी प्रमाण मिलते हैं. ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ ही कई लोककथाएं भी इन दो शाखाओं को लेकर मुंडा समाज में विद्यमान हैं, जो दो भाइयों के अलगाव से संबंधित है

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History of Munda Tribes 8 : मुंडा आदिवासियों के इतिहास को जब हम समझने की कोशिश करते है, तो हमें खंगार मुंडा या पातर मुंडा की जानकारी मिलती है. यह मुंडा जनजाति का ही हिस्सा थे. इनके बारे में और अधिक जानकारी के लिए हमें मुंडाओं के इतिहास को प्राचीन समय से जानना होगा. मुंडा आदिवासी संतालों को अपना भाई मानती है. प्राचीन इतिहास के अनुसार ये दोनों जनजाति एक साथ ही सोन नदी को पार करके छोटानागपुर की तरफ बढ़ी थी, लेकिन वहीं से इनका अलगाव हुआ. मुंडा जब छोटानागपुर में प्रवेश कर रहे थे, उसी दौरान मुंडा जनजाति में भी विभाजन हुआ और एक वर्ग -खंगार मुंडा या पातर मुंडा के रूप में सामने आया, जबकि दूसरा वर्ग कोमपाट मुंडा कहलाया.

कौन थे खंगार मुंडा या पातर मुंडा?

इतिहासकार बालमुकुंद वीरोत्तम ने अपनी किताब झारखंड: इतिहास एवं संस्कृति में इस बात का जिक्र किया है कि मुंडा जाति दो शाखाओं में विभाजित थी, जिनके नाम हैं- 1. महली मुंडा और 2. कोमपाट मुंडा. वे अपनी किताब में बताते हैं कि इनदोनों शाखाओं के बीच श्रेष्ठता का मसला था और वे दोनों एक दूसरे को श्रेष्ठ बताते थे. शरत चंद्र राय ने भी अपनी किताब में मुंडा समाज की इन दोनों शाखाओं का जिक्र किया है. इन दो शाखाओं को लेकर मुंडा समाज में एक लोककथा प्रचलित है, जिसके बारे में मुंडा समाज के लोग आज भी बात करते हैं.

क्या है लोककथा?

Munda brothers
मुंडा भाई, तस्वीर संस्कृति मंत्रालय

मुंडा समाज की दो शाखाओं के बारे में मुंडा समाज में जो कहानियां प्रचलित हैं उनके अनुसार जब मुंडा आदिवासी छोटानागपुर में प्रवेश किए, तो दो भाई आगे-पीछे चल रहे थे. जो भाई आगे चल रहे थे, उनकी पत्नी का प्रसव हुआ तो उन्होंने आगे बढ़ते वक्त बच्चे के नाल को चूल्हे में डाल दिया और चूल्हे को बंद करके आगे चले गए. पीछे चल रहे भाई जब उस जगह पर पहुंचे तो उन्हें ऐसा लगा कि उनके भाई ने उनके लिए शिकार का कुछ हिस्सा छोड़ दिया है और उन्होंने उस मांस को खा लिया. फिर जब दोनों भाई मिले तो सच्चाई का पता चला. इस सच्चाई के सामने आने के बाद ही मुंडा समाज दो भागों में विभाजित हुआ, जिस समाज ने अशुद्ध मांस खाया था उसे पातर मुंडा कहा गया और दूसरा को कोमपाट मुंडा कहा गया.

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पातर मुंडा और कोमपाट मुंडा में नहीं है कोई विवाद : सुखदेव पाहन

सुखदेव पाहन बताते हैं कि पातर मुंडा और कोमपाट मुंडा दोनों ही मुंडा जाति का हिस्सा हैं. इनके बीच विवाद जैसा कुछ नहीं है, बस कुछ लोककथाएं हैं, जो यह बताती है कि मुंडा समाज में दो शाखाएं थीं और इनके बीच कुछ अलगाव था.

पातर मुंडा और कोमपाट मुंडा के बीच नहीं होती थी शादी : वीरेंद्र सोय

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर वीरेंद्र सोय बताते हैं कि मुंडा समाज के बीच बंटवारा कब हुआ यह तो बता पाना मुश्किल है. लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि यह छोटानागपुर में प्रवेश के दौरान की बात ही रही होगी. जिस वक्त संताल और मुंडा साथ थे उसी दौरान की कहानी मेरी समझ से समाज में प्रचलित है, क्योंकि संताल में भी महली होते हैं, जिन्हें पातर मुंडा के समकक्ष माना जाता है. रीति-रिवाज तो दोनों के एक समान ही हैं, लेकिन कोमपाट मुंडा प्रकृति के ज्यादा नजदीक हैं, जबकि पातर मुंडा कुछ दूर प्रतीत होते हैं. संभवत: यह स्थिति भौगोलिक दुराव के वजह से भी बनी हो, यह संभव हो सकता है.

एक ही गांव में रहते थे पातर और कोमपाट : गुंजल इकिर मुंडा

गुंजल इकिर मुंडा बताते हैं कि पातर और कोमपाट दोनों ही मुंडा हैं, लेकिन ये दो शाखाओं में विभाजित हैं. जहां तक गांव ही बात है तो दोनों एक ही गांव में पहले भी रहते थे और आज भी रहते हैं. हां, दोनों शाखाओं में प्राचीन समय में शादी-विवाह वर्जित था.

पातर और कोमपाट के बीच का विभाजन भौगोलिक दूरी की वजह से बना होगा : रूपलक्ष्मी मुंडा

भारत मुंडा समाज की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रूपलक्ष्मी मुंडा बताती हैं कि मुंडा समाज में कोई विभाजन नहीं है. मैं तो सिंहभूम की हूं, तो मैंने इस तरह का कोई विभाजन नहीं देखा था. हां रांची में इस तरह की बातें होती हैं, लेकिन जहां तक बात रीति-रिवाज की है, तो मुंडा समाज की दोनों शाखाओं में कोई अंतर मुझे नहीं दिखता है. संभवत: इतिहास में यह दो भाइयों के बीच अनबन की बात रही होगी. जहां तक शादी-विवाह की बात है तो हमारी तरफ पुराने लोग यही बताते थे कि हम अपने परिचितों में शादी करते हैं.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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