व्यावसायिक हित नहीं, जन स्वास्थ्य महत्वपूर्ण

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 17 Apr 2026 11:54 AM

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जन स्वास्थ्य

Public health : आज भारत एक ऐसे जन स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है, जो तेजी से फैल रहा है. मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग की बढ़ती दरें, अब केवल समाज के समृद्ध शहरी वर्गों तक ही सीमित नहीं हैं. अब वे समाज के सभी वर्गों में फैल रही हैं, जिनमें बच्चे और युवा भी शामिल हैं.

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Public health : किसी देश के राजनेताओं का जनता को उनकी खान-पान की आदतों के बारे में सलाह देना एक दुर्लभ बात है. लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर राष्ट्र को संबोधित करते हुए बीमारियों से बचाव और स्वस्थ खानपान के बारे में सलाह देते रहते हैं. इसका जनता पर सकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है, और लोग अपनी पूरी क्षमता से उसका पालन करने का प्रयास करते हैं. कुछ समय पहले उन्होंने देश में मोटापे की बढ़ती समस्या को लेकर लोगों को सलाह दी थी कि वे खाना पकाने वाले तेल का इस्तेमाल कम से कम 10 प्रतिशत तक कम कर दें.


आज भारत एक ऐसे जन स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है, जो तेजी से फैल रहा है. मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग की बढ़ती दरें, अब केवल समाज के समृद्ध शहरी वर्गों तक ही सीमित नहीं हैं. अब वे समाज के सभी वर्गों में फैल रही हैं, जिनमें बच्चे और युवा भी शामिल हैं. सरकार मानती है कि इस संकट का एक मुख्य कारण पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का बढ़ता सेवन है, जिनमें वसा, चीनी और नमक की मात्रा ज्यादा होती है-जिन्हें तकनीकी रूप से ‘एचएफएसएस’ कहा जाता है. हाल के अनुमान बताते हैं कि भारतीय वयस्कों और किशोरों में अधिक वजन और मोटापे की दरों में लगातार वृद्धि हो रही है, जबकि भारत के पास पहले से ही मधुमेह के रोगियों की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का रिकॉर्ड है. इसके साथ ही, पिछले 15 वर्षों में पैक किये गये और अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य उत्पादों की बिक्री में लगभग 40 गुना उछाल आया है.

उपभोक्ता अक्सर इन उत्पादों में मौजूद चीनी, नमक या अस्वास्थ्यकर वसा की अत्यधिक मात्रा से अनजान रहते हैं. इसी कारण पूरे देश में पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ ‘फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग’ (एफओपीएल ) की जोरदार वकालत कर रहे हैं. इस पहल के तहत, खाने के पैकेट के सामने आसानी से समझ में आने वाले चेतावनी वाले लेबल लगाये जाते हैं, ताकि जब किसी प्रोडक्ट में चीनी, नमक या अनहेल्दी फैट जैसे नुकसानदायक पोषक तत्व अधिक मात्रा में हों, तो ग्राहकों को चेतावनी दी जा सके.


यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया है, जिसने साफ तौर पर चेतावनी वाले लेबलों के महत्व पर जोर दिया है, जो ग्राहकों को प्रभावी ढंग से जानकारी दे सकें. सुप्रीम कोर्ट ने 10 फरवरी को सुझाव दिया, कि ‘पहले से पैक किये गये खाने के किसी भी प्रोडक्ट के रैपर/पैकेट पर, फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग के रूप में चेतावनी जरूर होनी चाहिए…’ न्यायालय ने यह भी कहा कि एफओपीएल एक ऐसी व्यवस्था है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित है और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर शीर्ष अदालत को जवाब दे. सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश साफ है, फिर भी हैरानी की बात है कि रेगुलेटरी प्रक्रिया में बार-बार देरी हो रही है.

एफएसएसएआइ अभी भी लगातार हितधारकों के साथ चर्चाएं कर रहा है, जिनमें ज्यादातर लोग इंडस्ट्री से जुड़े हैं तथा बहुत कम लोग उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. और इंडस्ट्री एफओपीएल फ्रेमवर्क के तहत चेतावनी वाले लेबल शामिल करने को तैयार नहीं है, इसके बजाय, वह ‘स्टार रेटिंग’ सिस्टम के पक्ष में है. हमारे देश और दुनियाभर के विशेषज्ञ लगातार एक जैसी ही सलाह दे रहे हैं. कुछ वर्ष पूर्व, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक चेतावनी जारी की थी कि मीठे पेय पदार्थ दुनियाभर के लोगों के खाने में शुगर का एक बड़ा जरिया हैं. ये मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और दांतों की सड़न का कारण बनते हैं. डब्ल्यूएचओ लोगों को पैकेट वाले पेय पदार्थों के मामले में सावधानी बरतने की सलाह देता है, क्योंकि उनमें अक्सर चीनी की मात्रा स्वस्थ स्तर से अधिक होती है. इस समय बाजार में कई तरह के पैकेट वाले खाद्य पदार्थ बिक रहे हैं, जिनमें से कई में चीनी, फैट और नमक की मात्रा अत्यधिक होती है. आम तौर पर कंपनियां जानबूझकर इन सामान में चीनी, सैचुरेटेड फैट और नमक की अधिक मात्रा का इस्तेमाल करती हैं, ताकि वे लोगों को इनकी लत लगा सकें. इसलिए, एफएसएसएआइ की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसी चीजों से उपभोक्ताओं को सुरक्षित रखने के लिए असरदार नियम बनाये.


क्या लाखों भारतीय उपभोक्ताओं-विशेषकर बच्चों-के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, या फिर खाद्य उद्योग के व्यावसायिक हितों को? भारत में खाद्य नीति का मार्गदर्शन किसके हितों के आधार पर होना चाहिए? भारत की खाद्य नियामक प्रणाली की विश्वसनीयता इन्हीं प्रश्नों के उत्तर पर निर्भर करती है. जैसा कि शीर्ष अदालत ने भी कहा है, अधिक वसा, चीनी और नमक वाले खाद्य पदार्थों पर चेतावनी-संदेश नागरिकों का स्वास्थ्य अधिकार है. हमें यह समझना होगा कि ‘पैकेट के सामने की ओर लगाये जाने वाले चेतावनी-लेबल’ कोई उद्योग विरोधी कदम नहीं हैं. ये उपभोक्ता हितैषी और जन स्वास्थ्य हितैषी कदम हैं. जिम्मेदार कंपनियों को पारदर्शिता और उपभोक्ता जागरूकता का स्वागत करना चाहिए. इस अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर, एफएसएसएआइ को वह साहस और स्वायत्तता दिखानी चाहिए, जिसकी अपेक्षा एक राष्ट्रीय नियामक संस्था से की जाती है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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