कर्नाटक में सीएम बदलना कांग्रेस के नजरिये में बदलाव, पढ़ें रशीद किदवई का आलेख

Author : रशीद किदवई Published by : Pritish Sahay Updated At : 01 Jun 2026 5:30 AM

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सिद्धारमैया, केसी वेणुगोपाल और डीके शिवकुमार, फोटो- पीटीआई

Karnataka CM Change: कर्नाटक की राजनीति आगे किस करवट बैठती है, यह तो वक्त बतायेगा, मगर दिल्ली से निकला संदेश साफ है. राहुल गांधी अब उन मामलों में भी निर्णायक कदम उठाने के लिए तैयार हैं, जहां पहले वह आम सहमति बनाने के नाम पर उन्हें लंबे समय तक लटकाये रखते थे.

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Karnataka CM Change: कर्नाटक की राजनीति में महीनों से चल रही अटकलों, खंडन-मंडन और दिल्ली में हुई गुप्त बैठकों के सिलसिले पर 28 मई की सुबह तब विराम लग गया, जब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने डीके शिवकुमार के साथ ब्रेकफास्ट मीटिंग में अपने इस्तीफे की पुष्टि की. शनिवार को कांग्रेस विधायक दल का नेता चुने जाने के साथ ही डीके शिवकुमार का कर्नाटक का अगला मुख्यमंत्री बनना तय हो गया. बीते कुछ वर्षों की राजनीति में मुख्यमंत्रियों को बदलने में भाजपा ने महारत हासिल कर ली है. इसके विपरीत, कांग्रेस का मॉडल बेहद धीमा और कशमकश से भरा होता है. कर्नाटक में ऐसा ही हुआ है. सिद्धारमैया को सम्मानजनक विदाई और उनकी जगह डीके शिवकुमार को राज्य की कमान सौंपा जाना कांग्रेस की इसी पारंपरिक शैली का हिस्सा है. अलबत्ता, यह एक नयी शुरुआत की ओर भी इशारा करता है. स्पष्ट है कि राहुल गांधी अब उन मामलों में भी निर्णायक कदम उठाने के लिए तैयार हैं, जहां पहले वह आम सहमति बनाने के नाम पर उन्हें लंबे समय तक लटकाये रखते थे.

पर पार्टी ने एक जमे-जमाये कद्दावर नेता को हटाकर कोई सियासी जोखिम तो मोल नहीं ले लिया? राजनीतिक पंडित इसे एक ऐसा सोचा-समझा जोखिम मान रहे हैं, जिसे लेना कांग्रेस के लिए अपरिहार्य भी हो गया था. कांग्रेस के लिए चुनौतियां 2023 में उसी दिन शुरू हो गयी थीं, जिस दिन उसने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की थी. उसे 224 सदस्यीय विधानसभा में 135 सीटों पर जीत मिली थी, जो बीते कई दशकों में पार्टी का सबसे शानदार प्रदर्शन था. पर उस जीत के भीतर एक अंतर्विरोध भी छिपा था. सिद्धारमैया के पास जनाधार और व्यापक सामाजिक गठबंधन था, जबकि डीके शिवकुमार संगठनात्मक ताकत से लैस थे और राज्य में शीर्ष पद के लिए उनकी सबसे मजबूत दावेदारी भी थी. ऐसे में, आलाकमान को समझौता करवाना पड़ा. इसके तहत सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने और शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिली. दोनों के बीच सत्ता के रोटेशन को लेकर ढाई-ढाई साल का कोई समझौता हुआ या नहीं, इस बारे में भ्रम बना रहा.

अब जब अगले विधानसभा चुनाव में दो साल से भी कम का वक्त रह गया है, तब शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिद्धारमैया के समर्थक विधायकों को अपने साथ दिखाने की मानी जा रही है. लेकिन यहां पर एक पेच भी है. दरअसल, यह मान लिया जाता है कि कांग्रेस शासित राज्यों में विधायक किसी न किसी गुट के स्थायी सदस्य होते हैं. पर हकीकत इससे अधिक जटिल है. कांग्रेस के विधायक अपेक्षाकृत अधिक लचीले, सतर्क और दिल्ली से मिलने वाले राजनीतिक संकेतों के प्रति संवेदनशील होते हैं. जब कोई मुख्यमंत्री लोकप्रिय दिखाई देता है और चुनाव जिताने की क्षमता रखता है, तब अधिकांश विधायक उसके साथ खड़े नजर आते हैं. पर जैसे ही उन्हें संकेत मिलने लगते हैं कि पार्टी हाईकमान मुख्यमंत्री की राजनीतिक उपयोगिता को तौलने लगा है, उनका व्यवहार बदलने लगता है.

हालांकि यह कहना मुनासिब नहीं कि सभी विधायक अचानक डीके शिवकुमार के समर्थक बन जायेंगे. पर अनेक विधायकों ने यह संकेत जरूर दिया है कि वे कांग्रेस के भविष्य की खातिर आलाकमान का फैसला स्वीकार करने के लिए तैयार हैं. फिर भी सिद्धारमैया के लोकप्रिय जनाधार के बीच अपनी जगह बनाना शिवकुमार के लिए आसान नहीं. पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों को जोड़ने वाली सिद्धारमैया की ‘अहिंदा’ राजनीति ने कांग्रेस को 2023 में ऐतिहासिक जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी. उनकी गारंटी योजनाएं आज भी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी हैं. ऐसे नेता को कार्यकाल के बीच में हटाने पर अगर कोई असंतोष पैदा होता है, तो उससे शिवकुमार कैसे निपटेंगे, यह देखने वाली बात होगी.

यह एक राज्य में केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि राहुल गांधी के नजरिये में बदलाव की भी दास्तान है, जो चार मई के बाद और स्पष्ट होकर सामने आयी है. उस दिन दक्षिण भारत के सियासी कैनवास ने कांग्रेस को एक नयी दिशा दिखाई. केरल में कांग्रेस-नीत गठबंधन सत्ता में शानदार वापसी करने में सफल रहा. वहीं तमिलनाडु में विजय की टीवीके जब सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, तब कांग्रेस ने वहां अतीत की पुरानी यादों में खोये रहने के बजाय व्यावहारिक राजनीति को चुना, जिसके चलते पार्टी दशकों बाद राज्य में दो कैबिनेट मंत्रियों के साथ नयी सरकार का हिस्सा बनी.

दरअसल राहुल गांधी को अहसास हो गया है कि कांग्रेस दक्षिण भारत में चुनाव जीत सकती है, व्यावहारिक राजनीति के जरिये सरकारों में भागीदारी कर सकती है, वरिष्ठ नेताओं के बीच संतुलन बना सकती है और युवा मतदाताओं से भी संवाद स्थापित कर सकती है. कर्नाटक की राजनीति आगे किस करवट बैठती है, यह तो वक्त बतायेगा, मगर संदेश साफ है. सिद्धारमैया ने अपनी पारी खेल ली है. अब बारी शिवकुमार की है. राहुल गांधी भी शायद लंबे अरसे के बाद ऐसे नेता के रूप में नजर आ रहे हैं, जो कांग्रेस को यह याद दिलाने के लिए तैयार हैं कि राजनीति में सही समय पर लिया गया निर्णय ही सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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रशीद किदवई

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By रशीद किदवई

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