न्यायिक फैसलों में बढ़ते विलंब का हल, पढ़ें विराग गुप्ता का आलेख

Author : विराग गुप्ता Published by : Pritish Sahay Updated At : 01 Jun 2026 5:20 AM

विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट, फोटो- एएनआई

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट के नये फैसले के अनुसार सिविल और क्रिमिनल, दोनों तरह के मुकदमों में तीन महीने के भीतर लिखित फैसला जारी होना चाहिए. जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन या अधिकतम अगले दिन सुनाकर उसे हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए. कोर्ट का आदेश जेल प्रशासन तक तुरंत पहुंचे, जिससे आरोपी की उसी दिन रिहाई हो सके. सुप्रीम कोर्ट ने 25 साल पहले अनिल राय बनाम बिहार सरकार और उसके बाद अनेक अन्य फैसलों से लिखित फैसला जारी करने की समय सीमा निर्धारित की थी.

विज्ञापन

Supreme Court: न्याय में विलंब सबसे बड़ा अन्याय है. इससे जनता के संवैधानिक अधिकारों का संगठित हनन होता है. सोशल मीडिया में ट्रेंडिंग कॉकरोच विवाद की जड़ में न्यायिक व्यवस्था की बदहाली के प्रति लोगों की निराशा और गुस्सा झलक रही है. ऐसे में, झारखंड और दूसरे राज्यों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ का फैसला उम्मीद बढ़ाता है. अनुच्छेद 142 के तहत जारी गाइडलाइंस के अनुसार हाईकोर्टों में सुनवाई के बाद सुरक्षित मामलों में जजों को तीन महीने के भीतर फैसला देना होगा. चीफ जस्टिस ने जिस दिन यह फैसला सुनाया, उसी दिन जस्टिस मनोज मिश्रा ने दोहरे हत्याकांड के मामले में ऑर्डर रिजर्व रखने के 15 महीने बाद लिखित फैसला जारी किया है.

आवारा कुत्तों के मामले में 109 दिन बाद और बिहार में एसआइआर मामले में सुनवाई खत्म होने के 118 दिन बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले आये हैं. वर्ष 2015 की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के 487 फैसलों में से 38 फीसदी मामलों में आदेश रिजर्व रखने के एक महीने के बाद लिखित फैसला आया. गौरतलब है कि 2जी घोटाले में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा के मामले में 433 दिन बाद लिखित फैसला आया था.

संविधान के अनुसार किसी भी व्यक्ति को 48 घंटे से ज्यादा बेवजह हिरासत या जेल में रखना गलत है. इसलिए जमानत के मामलों की सुनवाई और फैसलों में विलंब से लोगों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होने के साथ जेलों में भीड़ भी बढ़ रही है. जिला अदालतों में कुल 4.92 करोड़ मामले लंबित हैं, जिनमे 3.8 करोड़ आपराधिक मामले हैं. इन मामलों में जेलों में बंद अधिकांश आरोपी गरीब और अशिक्षित हैं. जबकि अभियोजन की तरफ से पुलिस सरकारी खर्चे पर मुकदमे लडती है. सुप्रीम कोर्ट के नये फैसले के अनुसार सिविल और क्रिमिनल, दोनों तरह के मुकदमों में तीन महीने के भीतर लिखित फैसला जारी होना चाहिए.

जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन या अधिकतम अगले दिन सुनाकर उसे हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए. कोर्ट का आदेश जेल प्रशासन तक तुरंत पहुंचे, जिससे आरोपी की उसी दिन रिहाई हो सके. सुप्रीम कोर्ट ने 25 साल पहले अनिल राय बनाम बिहार सरकार और उसके बाद अनेक अन्य फैसलों से लिखित फैसला जारी करने की समय सीमा निर्धारित की थी. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस कॉन्फ्रेंस की 1989-90 की रिपोर्ट में कहा गया था कि सुनवाई खत्म होने के छह सप्ताह के भीतर लिखित फैसला जारी होना चाहिए.

सिविल प्रोसिजर कोड (सीपीसी) के अनुसार सुनवाई खत्म होने के 30 दिन के भीतर आदेश जारी होना चाहिए. विशेष मामलों में यह अवधि 60 दिन हो सकती है. पुरानी सीआरपीसी में इस बारे में स्पष्ट प्रावधान नहीं थे. लेकिन नये भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के अनुसार सुनवाई खत्म होने के 45 दिन के भीतर आदेश जारी होना चाहिए. नये क्रिमिनल कानून के अनुसार सरकार का यह दावा है कि मुकदमों का फैसला तीन साल के भीतर हो जायेगा. लेकिन मुकदमों के बढ़ते बोझ और जजों की टिप्पणियों से यह साफ है कि अदालतें जल्द न्याय देने की संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरा करने में विफल हो रही हैं. जमानत के फैसलों में विलंब से अनुच्छेद-21 में मिले संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है. संविधान के अनुच्छेद-141 के तहत सुप्रीम कोर्ट के फैसले बाध्यकारी होते हैं.

दीवानी और फौजदारी कानूनों में स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद संवैधानिक अदालतों में फैसलों में विलंब के मामलों का बढ़ना चिंताजनक है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय किशन कौल ने कहा था कि अदालतों में लंबी बहस की वजह से मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है. इस साल सुप्रीम कोर्ट ने एसओपी के माध्यम से मानक प्रक्रिया निर्धारित की है. उसके तहत वकीलों को बहस के बिंदुओं का समरी नोट देने के साथ सीमित समय में बहस पूरा करना जरुरी है. लेकिन हकीकत में भारी-भरकम चार्जशीट और लंबी बहस के बाद जजों के जटिल फैसलों से मुकदमों का अंबार बढ़ रहा है.

हाईकोर्ट में 325 पद और जिला अदालतों में 4,721 जजों के पद खाली हैं. इसलिए विधि आयोग की रिपोर्ट के अनुसार जजों की संख्या बढ़ाने की बजाय रिक्त पदों की भर्ती जरूरी है. पश्चिम बंगाल के चुनाव में मतदाता सूची से जुड़े लाखों विवादों के निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जजों की नियुक्ति हुई थी. अब जमानत से जुड़े मामलों में जल्द सुनवाई और फैसलों के साथ बेगुनाह अंडरट्रायल्स की रिहाई के लिए छुट्टियों के दौरान जजों को विशेष न्यायिक अभियान चलाने की जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज रवींद्र भट्ट के अनुसार न्याय में देरी से अदालतों के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर हो रहा है. सुनवाई और फैसलों में विलंब का खामियाजा अधिकांशतः कमजोर वर्ग के लोगों को भुगतना पड़ता है.

न्यायिक फैसलों में विलंब के पीछे न्याय को प्रभावित करने वाले दूसरे कारण भी हो सकते हैं. पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में फैसला जारी होने में विलंब के मामले में स्टेनो की डायरी जब्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था. दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के बंगले में नोटों के बोरों के जलने के बाद न्यायपालिका के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर हुआ है. मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को स्वीकारते हुए जजों को बेदाग मानने से इनकार किया है. ऐसे में, फैसलों में विलंब से जजों की मंशा पर संदेह के साथ भ्रष्टाचार की गुंजाइश बढ़ती है. इसलिए खुली अदालत में मौखिक फैसले के बाद लिखित फैसले को जल्द जारी करने से लोगों को सही न्याय मिलने के साथ जजों की साख भी बढ़ेगी.

हाईकोर्ट संवैधानिक अदालत हैं, जिनका स्वतंत्र क्षेत्राधिकार होता है. नयी गाइडलाइंस के अनुसार फैसलों में विलंब से पीड़ित लोग चीफ जस्टिस के सामने अर्जी लगा सकते हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर देखा जाये, तो ऐसी अर्जियों से मुख्य मामले की सुनवाई और फैसले में और ज्यादा विलंब होता है. नेता और अफसर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का पालन न करें, तो उनके खिलाफ अवमानना और सजा की कार्रवाई हो जाती है. सीपीसी, बीएनएसएस कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार लिखित फैसला जारी करने में विलंब करने वाले जजों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए. नयी गाइडलाइंस के अनुसार सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के नियमों में संशोधन हो, तो फैसलों में विलंब से जुड़े मसलों का सुनिश्चित समाधान हो सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

विज्ञापन
विराग गुप्ता

लेखक के बारे में

By विराग गुप्ता

लेखक और वकील

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola