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नदियों के कायाकल्प का संकल्प

Updated at : 10 Mar 2024 11:37 PM (IST)
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नदियों के कायाकल्प का संकल्प

राजनीतिक इच्छाशक्ति के बगैर किसी व्यापक मिशन पर काम करना और आवश्यक संसाधनों को जुटाना संभव नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी ने इस मिशन में व्यक्तिगत स्तर पर रुचि ली और वे मिशन की प्रगति के बारे में निरंतर जानकारी लेते रहे. इससे मिशन को आगे बढ़ाने में प्रेरणा और सहयोग प्राप्त हुआ.

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डॉ विनोद तारे

गंगा नदी के संरक्षण और नदी के जैव-परितंत्र के पुर्नस्थापन के लिए किये गये प्रयासों की सफलता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा भारत सरकार के नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के अग्रणी कार्यक्रम नमामि गंगे को प्राकृतिक जैव-परितंत्र की पुर्नबहाली के लिए संचालित दुनिया के दस सर्वश्रेष्ठ अभियानों की सूची में शामिल किया गया है. इस अभियान की सफलता को देखते हुए हाल ही में भारत सरकार के जलशक्ति मंत्रालय के अंतर्गत एनआरसीडी (नेशनल रिवर कन्जर्वेशन डायरेक्टोरेट) और 12 तकनीकी शिक्षण संस्थाओं (आइआइटी, एनआइटी और नीरी) के बीच छह नदियों (नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी और पेरियार) के बेसिन प्रबंधन की योजनाएं तैयार करने के लिए अनुबंध हुआ है. एक समय था, जब भारत की जीवनरेखा गंगा नदी को विश्व की पांचवी सर्वाधिक प्रदूषित नदी घोषित कर दिया गया था. नदी का जैव-परितंत्र गंभीर खतरे में था. करीब चार दशक की लंबी यात्रा में समन्वित प्रयासों की सतत श्रृंखला के परिणामस्वरूप गंगा नदी को नयी प्राण ऊर्जा मिली. इस संदर्भ में गंगा की यात्रा पर एक नजर डालना प्रासंगिक होगा.
वर्ष 1985 में केंद्र सरकार द्वारा गंगा एक्शन प्लान की घोषणा की गयी थी. इस योजना का प्रथम चरण 1986 से 2000 तक चला तथा 2001 से इसके दूसरे चरण का प्रारंभ हुआ. इन दोनों चरणों के पूर्ण होने पर गंगा की सफाई और बेहतरी को लेकर अपेक्षा के अनुरूप परिणाम प्राप्त नहीं हो सके. वर्ष 2014 में कार्यभार संभालने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा नदी के संरक्षण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल किया तथा इस काम को मिशन के रूप में अंजाम देने की घोषणा की. नमामि गंगे मिशन की तीन विशेषताएं हैं. इन विशेषताओं के कारण यह मिशन कई चुनौतियों के बावजूद अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर चलते रहने का संकल्प ले चुका है. ऐसा इसलिए कि किसी भी मिशन को सफल बनाने के लिए जो मूलभूत तत्व आवश्यक होते हैं, वे सब इस मिशन के लिए उपलब्ध कराये गये हैं. दूसरी विशेषता है मिशन के उद्देश्य की स्पष्टता और इसका संयुक्त राष्ट्र विकास लक्ष्य के साम्य. तीसरी विशेषता है प्रशासनिक और अकादमिक संस्थाओं का परस्पर सामंजस्य.
वर्ष 2015 में सात भारतीय प्रोद्यौगिकी संस्थानों (आइआइटी) के संघ ने सरकार को गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान का त्रिस्तरीय प्रारूप सौंपा था. इस प्लान को देखने के बाद यह निर्धारित किया गया कि आइआइटी संघ का दायित्व महज योजना बनाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इस योजना के सतत क्रियान्वयन और आकलन के लिए भी उसके सहयोग की आवश्यकता होगी. मिशन के अकादमिक विंग को सशक्त बनाने के लिए आइआइटी कानपुर के नेतृत्व में सेंटर फॉर गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट एंड स्टडीज (सी-गंगा) का गठन किया गया. सी-गंगा ने नदियों के मानचित्र बनाने जैसे भौगोलिक कार्य से लेकर अंतिम संस्कार की विधि में परिवर्तन जैसे भावनात्मक विषयों पर भी काम किया है. नमामि गंगे मिशन के पांच मुख्य आधार हैं- राजनीतिक इच्छाशक्ति, सार्वजनिक व्यय, सहभागिता, हिस्सेदारी, भागीदारी और समझाना-बुझाना. राजनीतिक इच्छाशक्ति के बगैर किसी व्यापक मिशन पर काम करना और आवश्यक संसाधनों को जुटाना संभव नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी ने इस मिशन में व्यक्तिगत स्तर पर रुचि ली और वे मिशन की प्रगति के बारे में निरंतर जानकारी लेते रहे. इससे मिशन को आगे बढ़ाने में प्रेरणा और सहयोग प्राप्त हुआ. इतने बड़े मिशन पर काम करने के लिए बड़े बजट की आवश्यकता थी, जो समय-समय पर सरकार ने आवंटित किया, जिसके कारण मिशन का कार्य कभी बाधित नहीं हुआ. न केवल नमामि गंगे मिशन, बल्कि समांतर रूप से चल रहे जल संबंधी कार्यक्रमों, जैसे जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत अभियान, अमृत आदि, के सुचारू संचालन के लिए भी पर्याप्त बजट आवंटित किया गया, जिसका समग्र प्रभाव गंगा बेसिन और अंतत: गंगा नदी पर नजर आया.
नमामि गंगे मिशन के अंतर्गत विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ साझेदारियां हुईं और तकनीकी आदान-प्रदान हुआ. मिशन के विशेषज्ञों की टीम ने ऑस्ट्रेलिया की मरे-डॉर्लिंग, इंग्लैंड की टेम्स और यूरोप की राईन नदी के बेसिन प्रबंधन के बारे में जाना-समझा, लेकिन उसे हू-ब-हू अपनाने के बजाय भारत के स्थानीय परिवेश के अनुसार उचित विधियों का इस्तेमाल किया गया. इस योजना में जन-भागीदारी को बढ़ाने के लिए गंगा उत्सव, गंगा टास्क फोर्स, गंगा प्रहरी और गंगा मित्र जैसे अभियान भी संचालित किये गये. इस अभियान में नदी के जल की गुणवत्ता के रासायनिक मानदंडों, जैसे बीओडी, सीओडी, कॉलिफॉर्म आदि को सिर्फ बीमारी के लक्षण के रूप में देखा गया, परंतु लक्ष्य नदी के जैव-पारिस्थितिक तंत्र की पुर्नबहाली को रखा गया. वर्ष 2019 में राष्ट्रीय गंगा परिषद की पहली बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने अर्थ गंगा की संकल्पना प्रस्तुत की. परियोजना का सिद्धांत व्यवहार में साकार होता तब नजर आया, जब प्रयागराज में आयोजित अर्धकुंभ मेले में अपेक्षित पर्यटक संख्या से तीन गुना अधिक पर्यटक पहुंचे. कुंभ की महत्ता को स्वयं प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत प्रयासों से विदेशों तक पहुंचाया और कई विदेशी हस्तियों को इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित किया. कई शहरों में रिवर फ्रंट डेवलपमेंट, रिवर-पीपल कनेक्ट जैसी गतिविधियों से पर्यटन की संभावनाएं बढ़ीं.
नदी एक तंत्र हैं, जिसके आधार पर नदी अपनी प्राकृतिक प्रक्रियाओं पूर्ण करते हुए सतत अपनी अमूल्य सेवाएं (इकोलॉजिकल सर्विसेज) प्रदान करती रहती है. अब मिशन नदियों को उनका खोया हुआ सामर्थ्य दोबारा लौटाने की दिशा में कार्यरत है. समर्थ गंगा अभियान के पांच स्तंभ हैं- निर्मल गंगा, अविरल गंगा, अर्थ गंगा, ज्ञान गंगा और जन गंगा. छह विशाल नदियों के बेसिन प्रबंधन के लिए 12 तकनीकी संस्थाओं को अनुबंध पत्र सौंपने के समारोह में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इस काम को उपनिषद के सूत्र ‘एकोहम बहुस्याम’ (एक से अनेक की ओर) से संदर्भित किया. उन्होंने कहा कि नये केंद्रों की स्थापना स्वागतयोग्य हैं और उम्मीद जतायी कि ऐसे प्रयास देश को जलसमृद्ध बनायेंगे. देश में संचालित नदी पुनर्जीवन अभियान में प्रशासनिक और अकादमिक सामंजस्य के चलते नदी विज्ञान रूपी ज्ञान की नयी शाखा उभर रही है. यह कहना निराधार नहीं होगा कि नदी विज्ञान और प्रबंधन के क्षेत्र में भविष्य में भारत विश्व को नेतृत्व देने में अपना दायित्व निभायेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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