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भारत के दैदीप्यमान, जाज्वल्यमान रत्न थे महामना मदनमोहन मालवीय

Updated at : 25 Dec 2020 12:12 PM (IST)
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भारत के दैदीप्यमान, जाज्वल्यमान रत्न थे महामना मदनमोहन मालवीय

भारतीय राष्ट्रीय इतिहास में महामना मदन मोहन मालवीय सदृश विराट पुरुष की कल्पना करना भी आज के समय में कठिन लगता है. इसलिए कठिन लगता है कि न केवल वे कट्टर और बेहद निष्ठावान हिन्दू धार्मिक नेता थे जिन्होंने न केवल हिन्दू महासभा की स्थापना की बल्कि उस समय वे चार बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए.

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तरुण विजय

पूर्व राज्यसभा सांसद, भाजपा

भारतीय राष्ट्रीय इतिहास में महामना मदन मोहन मालवीय सदृश विराट पुरुष की कल्पना करना भी आज के समय में कठिन लगता है. इसलिए कठिन लगता है कि न केवल वे कट्टर और बेहद निष्ठावान हिन्दू धार्मिक नेता थे जिन्होंने न केवल हिन्दू महासभा की स्थापना की बल्कि उस समय वे चार बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. यह वह समय था कि जब महात्मा गाँधी का सर्वत्र एक प्रभुत्व और वैचारिक प्रभाव दृष्टिगोचार होता था लेकिन उस समय महामना मदन मोहन मालवीय का विराट व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि महात्मा गाँधी उन्हें अपना बड़ा भाई कहते थे. और भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के चार बार अध्‍यक्ष चुने जाने के बाद वे देश में हिन्‍दू धर्म की मूल आस्‍था को मजबूत करने के लिए इतने कटिबद्ध थे कि उन्‍हें लगा कि यदि राजनीति में, सार्वजनिक जीवन में तथा सार्वजनिक व्‍यवहार और संवाद में हिन्‍दुत्‍व के प्रति आग्रह प्रबल नहीं होगा तो आजादी कुछ कम अर्थवान बनेगी और उन्‍होंने हिन्‍दू महासभा की स्‍थापना की.

हिन्‍दू महासभा की स्‍थापना के बाद भी उनके प्रति किसी का राई रत्ती मात्र कुछ मत बदला नहीं बल्कि, उनके प्रति सम्मान और विशवास पहले से और अधिक बढ़ा. महामना मदनमोहन मालवीय ने देश में हिन्दू धर्म के प्रति ईसाइयत और अंग्रेजियत की चुनौतियों को समझा था. वे देख रहे थे कि किस प्रकार अंग्रेजों के शासन के साये में चर्च की ताकतें विदेशी धन और विदेशी मन से हिन्दू समाज को तोड़ने और उसे विभक्त करने पर तुली हैं तथा वे धर्मांतरण के माध्यम से हिन्दुओं को विभक्त करने का प्रयास कर रही हैं. धन-बल, भुज-बल और अंग्रेजों के शासन- बल का पूरा उपयोग करते हुए ईसाई पादरी हिन्दुओं पर आक्रमण करते थे. यह सब देखकर उन्हें बहुत दुःख हुआ और उन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का निर्णय लिया.

महामना मदनमोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे एक ही उद्देश्य रखा था कि भारतीय समाज में यदि हिन्दू धर्म के प्रति आस्था को प्रबल नहीं किया गया और हिन्दुओं में धर्मांतरण तथा हिन्दुओं के प्रति अंग्रेजी शासन द्वारा फैलाई जा रही भ्रांतियों जैसे हिन्दू लोग असभ्य होते हैं, पोंगे होते हैं, हिन्दू मांएं अपने बच्चों को पैदा होते ही मगरमच्छ को खिला देती हैं, वे रस्सियों पर करतब दिखाने वाले लोग हैं, वे बीन बजाकर सांप को नचाने वाले लोग हैं, अतः इन्हें सभ्य बनाने के लिए इन्हें पश्चिमी ईसाई शिक्षा और ईसाईकरण की ओर मोड़ा जाय तथा जो मुसलमानों का जिहादी मानस को नहीं रोका गया और उसके सामने हिन्दू धर्म तथा हिन्दू शब्द का सम्मान बढ़ाने के लिए अक्षुण्ण रखने के लिए उसके प्रति सदियों से जो एक सभ्यता और संस्कृति का प्रवाह चला आ रहा था.

उस सनातन धर्मीय प्रवाह को जन जन के मन में प्रतिष्ठित करने के लिए उन्होंने एक विशवस्तरीय विश्वविद्यालय स्थापित करने का विचार किया और इस विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे एक ही उद्देश्य था की हिन्दू छात्रों में ज्ञान विज्ञान तकनीकी और नवीन भविष्य को रचने के लिए आवश्यक शिक्षा उन तक पहुँचनी चाहिए वे पश्चिम के विरोधी नहीं थे वे अंग्रेजों की भाषा के विरोधी नहीं थे वे पश्चिम में ज्ञान विज्ञान का जो एक विकास चल रहा था उसको आत्मसात करने के पक्षधर थे उनके मन में किसी के प्रति भी कोई अस्पृश्यता का भाव नहीं था लेकिन वे सबसे पहले भारत-भारती और अपने हिन्दू धर्म की प्रतिष्ठा को मजबूत बनाना चाहते थे इसके लिए अनेक रोचक कहानियाँ प्रचलित हैं.

महामना मदनमोहन मालवीय की कीर्ति और यश के सन्दर्भ में तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनकी आधुनिक प्रगितिशील विचारधारा को जब कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने जाना, तो वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मालवीय जी को महामना कहकर पुकारा. तब से ही मदन मोहन मालवीय जी महामना के नाम से जाने गए अर्थात जिनका मन बड़ा है, महान है. यही उनके जीवन व व्यवहार से प्रतीत हुआ. एक बार वे साँसाराम, बिहार गए थे और वहाँ उनके सम्मान में एक कार्यक्रम रखा गया था, जहाँ एक किशोर बालक ने संस्कृत में बहुत सुन्दर गीत गाया.

मदन मोहन मालवीय जी इससे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उस बालक को अपने पास बुलाया और पूछा कि, ” बेटा ! तुमने इतनी सुन्दर संस्कृत कहाँ से सीखी और तुम्हारा नाम क्या है?” उस किशोर ने पहले महामना को प्रणाम किया और फिर सकुचाते हुए कहा कि,”मेरा नाम जगजीवन राम है. ” महामना ने उस बालक को गले लगा लिया, उसके बारे में सारी जानकारी ली, उस बालक के माता-पिता और उनकी पृष्ठभूमि के बारे में जाना और कहा कि, “तुम मेरे साथ चलो और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में तुम्हारी सम्पूर्ण शिक्षा का वहन मैं करूंगा.” महामना मदन मोहन मालवीय पहले व्यक्ति थे जिन्होंने जगजीवन राम को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ाया. समस्त छुआछूत और अस्पृश्यता के विरुद्ध खड़े हुए. सबके साथ समरसता का व्यवहार किया.

वही जगजीवन राम आगे चलकर हिन्दू धर्म में व्याप्त अस्पृश्यता, छुआछूत और वैचारिक मतभेद के खिलाफ हिन्दू धर्म के बड़े आदर्श पुरुष के रूप में खड़े हुए. उन्होंने अनेक प्रकार के अन्याय और जातिगत भेदभावों को झेलने के बावजूद भी हिन्दू धर्म को छोड़ने की बात नहीं की. यह महामना के ही संस्कार थे. वे एक आदर्श हिन्दू , एक विराट हिन्दू के रूप में अटल खड़े रहे और यही कारण था कि मैंने राज्य सभा में बाबू जगजीवन राम को भारत-रत्न देने का प्रस्ताव रखा था.

मुझे विशवास है कि महामना के शिष्य बाबू जगजीवन राम जिन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त अस्पृश्यता और छुआछूत के विरुद्ध एक सफल लड़ाई लड़ी. भारत के उप प्रधानमंत्री रहे, 1971 की लड़ाई के समय वे भारत के रक्षामंत्री थे. साथ ही, आपात्काल के समय सिटीजन्स फॉर डेमोक्रेसी बनाकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को और बल दिया. यह सब महामना के शिष्यत्व के कारण ही संभव हो पाया था.

महामना का स्वभाव और उद्देश्य विश्व में समर्थ, सुशिक्षित, सशक्त, सुसंस्कृत और हिन्दू सभ्यता के प्रति स्वाभिमान रखने वाला राष्ट्र बनाने का था. उन्हें भारत-रत्न से अलंकृत कर वास्तव में नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत-रत्न को ही अलंकृत किया है. भारत के दैदीप्यमान, जाज्वल्यमान रत्न थे, महामना मदनमोहन मालवीय.

Posted by; Pritish Sahay

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तरुण विजय

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By तरुण विजय

तरुण विजय is a contributor at Prabhat Khabar.

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