स्मृति शेष : भारतीय समाज के अध्ययन की भाषा सिखा गये आंद्रे बेते

आंद्रे बेते
Andre Beteille : श्रीनिवास हमें गांवों की नृवंशशास्त्रीय दुनिया में ले जाते थे. वह सिखाते थे कि समाज को उसके अनुभवों, उसकी स्मृतियों और उसकी दिनचर्या के बीच कैसे सुना जाये. वहीं आंद्रे बेते हमें इसके और आगे ले जाते थे.
Andre Beteille : इतिहासकार रामचंद्र गुहा की एक्स पर एक संक्षिप्त पोस्ट से पता चला कि आंद्रे बेते नहीं रहे. भाषा संयत थी, लगभग निर्विकार, लेकिन आशय अंतिम था. देश के सबसे प्रभावशाली समाजशास्त्रियों में से एक का जाना. आंद्रे बेते के न रहने की खबर जिस तरह आयी, वही उनके स्वभाव के अनुकूल थी. वह दिखावे से दूर रहने वाले बौद्धिक और शोर-शराबे से सावधान रहने वाले विद्वान थे. बिना स्वयं को केंद्र में रखे उनका काम दशकों तक चुपचाप चलता रहा और भारतीय समाज को समझने के तरीकों को गढ़ता रहा.
भारतीय विश्वविद्यालयों में सामाजिक विज्ञान पढ़ने वाले हम जैसे छात्रों के लिए आंद्रे बेते कोई दूरस्थ अकादमिक व्यक्तित्व नहीं थे. वह हमारी बौद्धिक संरचना का हिस्सा थे. वर्ष 2002 में बीएचयू के सामाजिक विज्ञान संकाय के प्रांगण में जब मैं भारतीय समाज को समझने की शुरुआती कोशिशों में था, तभी पहली बार आंद्रे बेते के लेखन से मेरा परिचय हुआ. एमएन श्रीनिवास जैसे दिग्गजों के साथ बेते की पुस्तकें जल्द ही मेरी बौद्धिक यात्रा का स्थायी पड़ाव बन गयीं.
श्रीनिवास हमें गांवों की नृवंशशास्त्रीय दुनिया में ले जाते थे. वह सिखाते थे कि समाज को उसके अनुभवों, उसकी स्मृतियों और उसकी दिनचर्या के बीच कैसे सुना जाये. वहीं आंद्रे बेते हमें इसके और आगे ले जाते थे. वह कहते थे कि समाज को केवल देखा ही नहीं, सोचा भी जाना चाहिए. एक अनुशासित नैतिक दृष्टि के साथ वह असमानता, सत्ता और सामाजिक परिवर्तन को गढ़ने वाली संरचनाओं पर ध्यान देना सिखाते थे. अगर श्रीनिवास स्मृति और व्यवहार को केंद्र में रखते थे, तो आंद्रे बेते संरचना और तुलना को. सरल शब्दों में कहें, तो दोनों दिग्गज मिलकर एक पूरी पीढ़ी को भारतीय समाज के अध्ययन की भाषा सिखा गये.
आंद्रे बेते उस पीढ़ी के विद्वान थे, जिनके सामने आजादी के बाद भारत को समझने की चुनौती थी. औपनिवेशिक ज्ञान-श्रेणियां अप्रासंगिक हो चुकी थीं, पर लोकतंत्र ने पुरानी असमानताओं को समाप्त नहीं किया था. बेते का अकादमिक जीवन मुख्यतः दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से जुड़ा रहा. उन्होंने ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और शिकागो विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में भी अध्यापन किया. इसके बावजूद उनका काम भारतीय यथार्थ से गहरे जुड़ा रहा.
उनकी प्रारंभिक और अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक ‘कास्ट, क्लास एंड पावर’ तमिलनाडु के एक गांव में किये गये क्षेत्र अध्ययन पर आधारित थी. इसमें बेते ने स्पष्ट किया कि जाति को वर्ग और सत्ता से अलग कर नहीं समझा जा सकता. ‘स्टडीज इन एग्रेरियन सोशल स्ट्रक्चर’, ‘इनइक्वैलिटी एंड सोशल चेंज’, ‘सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स इन इंडिया’ और ‘एंटीनॉमीज ऑफ सोसाइटी’ में आंद्रे बेते बार-बार असमानता के प्रश्न पर लौटते हैं. उनका आग्रह था कि सामाजिक श्रेणियां शिक्षा, भूमि, राजनीति और आधुनिक संस्थाओं से निरंतर बदलती रहती हैं. जाति, वर्ग व सत्ता को साथ देखने की उनकी पद्धति ने भारतीय समाजशास्त्र को नयी दिशा दी.
बेते सांस्कृतिक रोमानीकरण और वैचारिक हठधर्मिता से सतर्क रहते थे. उनके लिए आलोचना का आधार समझ था, और सुधार की शुरुआत अध्ययन से होती थी. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के कुलपति प्रोफेसर बद्री नारायण के मुताबिक, ‘आंद्रे बेते हमें सिखाते हैं कि समाजशास्त्र त्वरित फैसलों का अनुशासन नहीं है. यह विचार, भाषा और प्रमाण का अनुशासन है.’ यह अनुशासन उनके सार्वजनिक लेखन में भी दिखाई देता है. ‘क्रॉनिकल्स ऑफ आवर टाइम’ जैसे संग्रहों में संकलित किये गये उनके निबंध आरक्षण, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र जैसे विषयों पर बिना सरलीकरण के विचार करते हैं. वह मानते थे कि विचार इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे संस्थाओं और जीवन को आकार देते हैं, और लापरवाह सोच के सामाजिक परिणाम होते हैं.
पद्मभूषण और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों के बावजूद बेते ने बौद्धिक विनम्रता और अनुशासन को कभी नहीं छोड़ा. आज आंद्रे बेते को केवल इसलिए नहीं याद किया जाना चाहिए कि उन्होंने भारतीय समाजशास्त्र को नया रूप दिया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने दिखाया कि स्पष्टता और जटिलता एक साथ संभव हैं, कि संयम समाज को गंभीरता से लेने का तरीका है. मेरे जैसे छात्रों के लिए उनका प्रभाव कक्षाओं और परीक्षाओं से कहीं आगे तक जाता है. उन्होंने सोचने की ऐसी आदतें दीं, जो असमान समाज को समझने के लिए आज भी अपरिहार्य हैं. उनका जाना भारतीय बौद्धिक जीवन के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत है. पर असमानता, सत्ता और लोकतंत्र पर उनके प्रश्न अब भी हमारे सामने हैं. और जिन तरीकों पर वह जोर देते रहे, उनकी आवश्यकता शायद आज पहले से अधिक है. इस अर्थ में, आंद्रे बेते आज भी बोलते हैं. चुपचाप, लेकिन लगातार, उस सोच के अनुशासन के जरिये, जिसे उन्होंने हमारे लिए छोड़ा है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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