चुनावी मुकाबला कठिन है पश्चिम बंगाल में

Updated at : 24 Mar 2026 11:39 AM (IST)
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Mamata Banerjee

ममता बनर्जी

West Bengal Elections : वर्ष 2021 की तुलना में इस चुनाव में उसका रणकौशल पूरी तरह अलग है. पश्चिम बंगाल का चुनावी नतीजा क्या होगा, यह बताना मेरा काम नहीं, मैं ज्योतिषी नहीं हूं. लेकिन राजनीतिक विश्लेषण के आधार पर यह कह सकता हूं कि ममता बनर्जी इस बार भीषण राजनीतिक दबाव में है.

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West Bengal Elections : चालीस साल के ज्यादा समय से पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति को मैं बहुत नजदीक से देख रहा हूं. लेकिन कभी मैंने ऐसा चुनाव नहीं देखा, जैसा इस बार दिख रहा है. पश्चिम बंगाल की सत्ता में ममता बनर्जी की सरकार के 15 साल पूरे हो रहे हैं. हर शासक दल के लिए एंटी इनकंबेंसी स्वाभाविक है. अलबत्ता पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा ने इस बार जो आक्रामक रणनीति अपनायी है, वह अभूतपूर्व है.

वर्ष 2021 की तुलना में इस चुनाव में उसका रणकौशल पूरी तरह अलग है. पश्चिम बंगाल का चुनावी नतीजा क्या होगा, यह बताना मेरा काम नहीं, मैं ज्योतिषी नहीं हूं. लेकिन राजनीतिक विश्लेषण के आधार पर यह कह सकता हूं कि ममता बनर्जी इस बार भीषण राजनीतिक दबाव में है. भाजपा की आक्रामक रणनीति को वह साजिश बता रही हैं, जबकि भाजपा साम, दाम, दंड, भेद की कौटिल्य नीति कहकर अपनी रणनीति का औचित्य ठहरा रही है.


पश्चिम बंगाल के बांग्ला मीडिया से लंबे समय से जुड़े होने के बावजूद मैं हमेशा दिल्ली में ही रहा और एक पत्रकार के तौर पर मेरा प्रमुख बीट भाजपा रहा. वाजपेयी-आडवाणी से लेकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक दिल्ली में भाजपा के रूपांतरण का मैं गवाह हूं. पश्चिम बंगाल के आम लोग ही नहीं, राजनेता भी कहते हैं कि भाजपा बंगाली अस्मिता, बांग्ला डीएनए को नहीं समझती. राष्ट्रीय स्तर पर वह हिंदुत्व की जो राजनीति करती है, वही मॉडल वह पश्चिम बंगाल में भी अपना रही है.

बंगाल में ध्रुवीकरण के जरिये लाभ उठाने की कोशिश उसकी इसी सोच के बारे में बताती है. पश्चिम बंगाल के राजनेता यह भी मानते हैं कि बंगाल की अस्मिता को न समझ पाने के कारण ही भाजपा अभी तक वहां विफल रही है. एक हद तक यह सही भी है. पश्चिम बंगाल में जीत के लिए भाजपा को पैन इंडियन मॉडल के बजाय बांग्ला मॉडल अपनाना चाहिए. लेकिन अपने सतत परिश्रम के बल पर भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर आज जो ताकत हासिल की है, उसे भी समझना होगा.

भाजपा एक ऐसी पार्टी है, जो हारने के बाद भी लगातार काम करती है. ऐसा मैंने पहले भी देखा था, आज भी देख रहा हूं. फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि नरेंद्र मोदी आखिरकार अटल-आडवाणी युग के ही प्रोडक्ट हैं. पश्चिम बंगाल में 2021 और 2024 में अपनी विफलता से भाजपा ने बहुत कुछ सीखा है. इसी कारण इस बार के चुनाव में भाजपा की जीत की संभावना ज्यादा है.


आज पश्चिम बंगाल में भाजपा के 77 विधायक हैं. राज्य में कांग्रेस की जगह तृणमूल ने ले ली है, कांग्रेस का वोट बैंक वहां महज पांच फीसदी है. वाम मोर्चा वहां उभर नहीं पा रहा. पिछली बार लेफ्ट का वोट बैंक भाजपा के पास चला गया. क्योंकि माकपा को लग रहा था कि ‘पहले राम, फिर वाम’. लेकिन इस बार लेफ्ट की रणनीति बदल रही है. युवा पीढ़ी और सोशल मीडिया पर जोर देकर वह खुद को रिवाइव करना चाह रही है. विधानसभा में लेफ्ट भी शून्य है और कांग्रेस भी. लेकिन इस बार के चुनाव में दोनों अपना प्रदर्शन सुधार सकते हैं. इस बार भाजपा ने ‘जय श्रीराम’ के नारे को नेपथ्य में रखा है और परिवर्तन को सामने रखकर काम कर रही है.

मोदी-शाह ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी पर व्यक्तिगत हमले भी नहीं कर रहे. इसके बजाय भाजपा ममता बनर्जी के कथित कुशासन, लोगों के क्षोभ और जन सुविधाओं के अभाव को आधार बनाकर आक्रामक अभियान चला रही है. वह कह रही है कि पश्चिम बंगाल में पुनर्जागरण फैला था, अतीत के उसी गौरव को वापस लाना है. उत्तर और दक्षिण बंगाल के राजनीतिक घटनाक्रम से भी भाजपा को बल मिला है. उत्तर बंगाल में तृणमूल से निकले हुमायूं कबीर ने नयी पार्टी बनायी है, हालांकि पार्टी ज्यादा सीटों पर चुनाव नहीं लड़ रही. ऐसे ही, दक्षिण बंगाल में अब्बास सिद्दीकी के नेतृत्व में इंडियन सेक्युलर फ्रंट चुनाव लड़ रहा है. इन दोनों ही पार्टियों द्वारा ममता बनर्जी के वोट बैंक में सेंध लगाने की पूरी आशंका है.

चुनाव में एसआइआर एक बड़ी रणनीति है. अगर इसके जरिये घुसपैठियों, मुस्लिम मतदाताओं तथा तृणमूल मतदाताओं की बड़ी संख्या बाहर हुई, तो ममता बनर्जी को मुश्किल होगी. इस बार नौकरशाही में व्यापक फेरबदल से भी हड़कंप है. अधिकारियों को लग रहा है कि अगर भाजपा सत्ता में आ गयी, तो उनका करियर बर्बाद हो जायेगा. अधिकारियों का स्थानांतरण तो पूर्व चुनाव आयुक्त दिवंगत टीएन शेषन ने भी किया था. लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने व्यापक कदम उठाये हैं. ऐसे ही, राज्यपाल बदलकर भाजपा ने बदली हुई रणनीति का परिचय दिया है. जगदीप धनखड़ और आनंद बोस जैसे पहले के राज्यपाल बोलते ज्यादा थे. लेकिन खुफिया विभाग से आये नये राज्यपाल आरएन रवि कम बोलते हैं, लेकिन तमाम चीजों का आकलन कर रहे हैं. मतदान के दौरान अर्धसैनिक बलों की तैनाती कहां होगी, इस बारे में चुनाव आयोग और प्रशासन को मिलाकर एक कमेटी गठित हुई है, जो एक बड़ी रणनीति है.


इन सबके बावजूद तथ्य यह है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सांगठनिक क्षमता कमजोर है. ममता बनर्जी की जो सांगठनिक क्षमता हर जिले में दिखती है, वह भाजपा के पास नहीं है. चूंकि पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्ता में नहीं रही है, इस कारण उसकी प्रशासनिक योग्यता-क्षमता के बारे में भी बंगाल के लोग आश्वस्त नहीं हैं. लिहाजा, प्रधानमंत्री मोदी परिवर्तन के नारे और मोदी की गारंटी के साथ बार-बार पश्चिम बंगाल में जा तो रहे हैं, लेकिन उनका संदेश पश्चिम बंगाल के घर-घर में नहीं पहंच पाया है. इस लिहाज से भाजपा का यह अभियान अभी अधूरा ही है. दूसरी तरफ सत्ता में होने के बावजूद ममता बनर्जी विपक्षी नेता की तरह व्यवहार कर रही हैं और मोदी-अमित शाह के खिलाफ लड़ाई लड़ रही हैं. यानी केंद्र बनाम राज्य की लड़ाई की छवि बन रही है.

वर्ष 2021 में ममता बनर्जी की यह रणनीति कारगर साबित हुई थी. पिछले चुनाव की तरह इस बार भी चुनाव आयोग को सामने रखकर हिंदुत्ववाद के सामने बंगाली अस्मिता की रणनीति ममता दीदी बुन रही हैं. इस बार बंगाल की जनता क्या करेगी, क्या वह ममता बनर्जी को और भी ज्यादा वोट देकर सत्ता में लायेगी या खामोशी से भाजपा को मौका देगी, यह देखने के लिए हमें और कुछ दिनों तक इंतजार करना पड़ेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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जयंत घोषाल

लेखक के बारे में

By जयंत घोषाल

जयंत घोषाल is a contributor at Prabhat Khabar.

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