औद्योगिक सब्सिडी के बेहतर विकल्प से चीन का मुकाबला

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काम करते वर्कर

Industrial Subsidies : भारत के पास पहले से ही व्यवसायों को समर्थन देने वाली कई नीतियां हैं, पहला कदम व्यापारिक सुरक्षा उपाय होना चाहिए-एंटी डंपिंग शुल्क, प्रतिकारी शुल्क, संरक्षणात्मक कार्रवाई तथा उन क्षेत्रों में आयात वृद्धि की करीबी निगरानी, जहां सब्सिडी से उत्पन्न बदलाव स्पष्ट दिखाई देते हैं.

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Industrial Subsidies : ओइसीडी यानी ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट की जून, 2026 की मैजिक डाटाबेस रिपोर्ट भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. वह बताती है कि औद्योगिक सब्सिडी अब वैश्विक प्रतिस्पर्धा की एक संरचनात्मक विशेषता बन चुकी है. चीन इसका बड़ा उदाहरण है. रिपोर्ट बताती है कि सब्सिडियां किसी देश के नीतिगत लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर सकती हैं, पर वे व्यापार और प्रतिस्पर्धा को उलट-पलट भी सकती हैं. यहां भारत के लिए व्यावहारिक प्रश्न यह है कि रक्षात्मक या प्रतिशोधात्मक रवैया अपनाये बगैर कंपनियों की रक्षा कैसे की जाये, उनकी नीतिगत स्वतंत्रता कैसे बनाये रखी जाये और उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता को किस तरह से मजबूत किया जाये.


इसका उचित उत्तर व्यापारिक सुरक्षा उपायों, घरेलू क्षमता निर्माण, अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण औद्योगिक नीति और मजबूत अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों का मिश्रण होगा. भारत के लिए इस रिपोर्ट का मुख्य निहितार्थ यह है कि चीनी उत्पादकों के साथ प्रतिस्पर्धा हमेशा समान रूप से समर्थित कंपनियों के बीच की प्रतिस्पर्धा नहीं होती. यदि विदेशी प्रतिस्पर्धियों को अधिक अनुदान, कर रियायतें या बाजार दर से कम लागत पर वित्तीय सहायता मिलती है, तो भारतीय कंपनियों को ऐसी लागत संरचना का सामना करना पड़ सकता है, जिसका मुकाबला केवल निजी प्रयासों से करना कठिन होगा. इसका नतीजा आयातित वस्तुओं की कीमतों के दबाव, घरेलू उत्पादकों के घटते लाभांश और रणनीतिक क्षेत्रों में निवेश के कम प्रोत्साहन के रूप में सामने आता है. इसका अर्थ यह नहीं कि भारत को हर विदेशी सब्सिडी की नकल करनी चाहिए.

इसका अर्थ यह है कि हमारी घरेलू नीतियां अपने उत्पादकों को विश्व बाजार में अनुचित असमानताओं के प्रति असुरक्षित न छोड़ें. इसलिए भविष्य-दृष्टि वाली औद्योगिक रणनीति का ध्यान केवल सब्सिडी की मात्रा को रुपये के आधार पर बराबर करने के बजाय लचीलापन, पैमाना और उत्पादकता बढ़ाने पर होना चाहिए.


भारत के पास पहले से ही व्यवसायों को समर्थन देने वाली कई नीतियां हैं, पहला कदम व्यापारिक सुरक्षा उपाय होना चाहिए-एंटी डंपिंग शुल्क, प्रतिकारी शुल्क, संरक्षणात्मक कार्रवाई तथा उन क्षेत्रों में आयात वृद्धि की करीबी निगरानी, जहां सब्सिडी से उत्पन्न बदलाव स्पष्ट दिखाई देते हैं. दूसरा क्षेत्र घरेलू प्रतिस्पर्धात्मकता का है. अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स, बिजली की विश्वसनीयता, कौशल विकास, परीक्षण सुविधाओं, मानकों और टेक्नोलॉजी अपनाने के लिए सरकार मदद बढ़ा सकती है. ये सभी उपाय अक्षमता को प्रोत्साहित किये बिना उत्पादन लागत कम करते हैं.

इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, इस्पात, नवीकरणीय ऊर्जा उपकरण और महत्वपूर्ण खनिज प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में स्थिर इनपुट पारिस्थितिकी तंत्र अक्सर बड़ी सब्सिडी से अधिक महत्वपूर्ण होता है. ऐसी नीतिगत रूपरेखा, जो संचालन संबंधी बाधाओं को कम करे, वह नकद अनुदान जितनी ही प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ा सकती है. तीसरा कदम अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण वित्तीय सहायता है. यदि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग किया जाये, तो उन्हें निर्यात क्षमता, तकनीकी उन्नयन, ऊर्जा दक्षता, स्थानीय मूल्य संवर्धन और अनुभव आधारित सीखने जैसे परिणामों से जोड़ा जाना चाहिए.


भारत की व्यावहारिक रणनीति पांच स्तंभों पर आधारित हो सकती है. पहला, एक सक्रिय सब्सिडी निगरानी प्रकोष्ठ का गठन हो, जो आयात प्रधान क्षेत्रों पर नजर रखे, संभावित विकृतियों की पहचान करे और व्यापारिक सुरक्षा उपायों के लिए प्रमाणिक दस्तावेज तैयार करे. जिन वस्तुओं का हम भारी मात्रा में आयात करते हैं, यदि उन्हें उनके मूल देश में सरकारी सब्सिडी मिल रही है, तो हमें तुरंत इस पर ध्यान देना चाहिए. दूसरे, भारत को ‘रणनीतिक रूप से प्रतिस्पर्धी’ उन क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जहां स्केल इकोनॉमी (बड़े पैमाने पर उत्पादन से होने वाले संभावित लाभों वाली अर्थव्यवस्था) और आपूर्ति शृंखला की मजबूती बड़ी महत्वपूर्ण है.

तीसरा, भारत को सार्वजनिक वित्त का उपयोग गैर-प्रतिस्पर्धी उत्पादन को बनाये रखने के बजाय लॉजिस्टिक्स, बिजली लागत, भूमि उपलब्धता और अनुपालन बोझ जैसी मूलभूत बाधाओं को कम करने के लिए करना चाहिए. चौथा, वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से जुड़े सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए ऋण गारंटी, निर्यात वित्त और तकनीकी उन्नयन सहायता का विस्तार किया जाना चाहिए. पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण, भारत को डब्ल्यूटीओ और अन्य मंचों पर उन देशों के साथ सक्रिय सहयोग बढ़ाना चाहिए, जो सब्सिडी की पारदर्शिता और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता को लेकर समान चिंता रखते हैं. ये उपाय प्रत्यक्ष सब्सिडी की दौड़ में शामिल होने की तुलना में अधिक उपयुक्त हैं, क्योंकि वे भारत की आधारभूत क्षमता को मजबूत करेंगे.


बेशक, चीन की घरेलू नीतियों को सीधे बदला नहीं जा सकता, पर व्यापक अंतरराष्ट्रीय वातावरण को पारदर्शिता, रिपोर्टिंग मानकों और सब्सिडी अनुशासन के लिए गठबंधन निर्माण के माध्यम से प्रभावित किया जा सकता है. भारत का हित इसमें है कि बहुपक्षीय मंचों पर अनुदानों, कर व्ययों, रियायती ऋणों और राज्य स्वामित्व वाले उद्यमों से जुड़ी सहायता के बेहतर प्रकटीकरण की मांग की जाये. साथ ही, भारत उन साझेदार देशों के साथ समन्वय गहरा कर सकता है, जो समान बाजार दबावों का सामना कर रहे हैं. हमारा उद्देश्य सबसे अधिक सब्सिडी देने वाली प्रणालियों की नकल करना नहीं है, बल्कि ऐसा टिकाऊ घरेलू उत्पादन आधार बनाना है, जो उत्पादकता, पैमाने और नवाचार के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर सके.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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अभिजीत मुखोपाध्याय

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By अभिजीत मुखोपाध्याय

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