भीतरी बगावत है पीओके से उठी आवाज, पढ़ें आनंद कुमार का आलेख
पीओके में विरोध प्रदर्शन के दौरान एक जगह जुटे लोग, फोटो- एक्स
PoK Protest: पाकिस्तान लंबे समय से स्वयं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरियों के अधिकारों का सबसे बड़ा समर्थक बताता रहा है, किंतु आज पीओके से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे बिल्कुल अलग कहानी कहती हैं. हजारों लोग सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे हैं, सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गयी है, इंटरनेट सेवाएं बंद की जा रही हैं, गिरफ्तारियां हो रही हैं और मानवाधिकार संगठनों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाये जा रहे हैं. पीओके का संकट शासन, पहचान और राजनीतिक वैधता की प्रतिस्पर्धी अवधारणाओं का संघर्ष है.
PoK Protest: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में चल रहा आंदोलन 1947 के बाद से इस क्षेत्र में पाकिस्तान के सामने खड़ी सबसे गंभीर राजनीतिक चुनौतियों में से एक है. पहली नजर में यह विवाद विधानसभा की 45 में से 12 सीटों के आरक्षण का मुद्दा प्रतीत होता है, जो उन शरणार्थियों के लिए सुरक्षित हैं, जो विभाजन के बाद भारतीय जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान चले गये थे, किंतु यह पूरा सच नहीं है. दरअसल, पीओके में जो कुछ हो रहा है, वह राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक उपेक्षा, क्षेत्रीय पहचान और पाकिस्तान की सैन्य-राजनीतिक व्यवस्था के अत्यधिक हस्तक्षेप के विरुद्ध वर्षों से जमा होते आ रहे असंतोष का विस्फोट है. यह केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि पाकिस्तान की उस व्यवस्था के विरुद्ध भीतर से उठी चुनौती है, जिसने लंबे समय से इस क्षेत्र को अपने सामरिक हितों के अनुरूप संचालित किया है.
वर्तमान आंदोलन की तात्कालिक वजह विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की मांग है. ये सीटें उन शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो भारतीय जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में बस गये थे. पाकिस्तान का तर्क है कि यह व्यवस्था कश्मीर के पूरे भूभाग पर उसके दावे को मजबूत करती है और विस्थापित कश्मीरियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रदान करती है. पर पीओके के स्थानीय निवासियों की दृष्टि में यह व्यवस्था लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन का प्रतीक बन चुकी है. उनका कहना है कि विधानसभा की लगभग एक-चौथाई सीटों पर ऐसे लोग क्यों चुने जायें, जो न इस क्षेत्र में रहते हैं, न ही यहां के लोगों की समस्याओं से उनका सीधा संबंध है.
पीओके के सर्वोच्च न्यायालय ने इन सीटों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त बताते हुए कहा है कि इन्हें समाप्त करने के लिए संवैधानिक संशोधन जरूरी होगा. पर स्पष्ट है कि यह केवल कानूनी प्रश्न नहीं, बल्कि एक गहरा राजनीतिक संकट है. मुजफ्फराबाद और रावलाकोट में हजारों लोगों का सड़कों पर उतरना, प्रतिबंधों और गिरफ्तारियों के बावजूद आंदोलन का जारी रहना इसका प्रमाण है कि यह मुद्दा आम जनता के मन में गहरी जगह बना चुका है.
इस आंदोलन के केंद्र में जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) है, जिसका गठन 2023 में हुआ था. आरंभ में यह संगठन बढ़ती बिजली दरों, गेहूं पर सब्सिडी और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन के रूप में उभरा था. पर धीरे-धीरे इस आंदोलन में राजनीतिक प्रश्न उठाये जाने लगे. अब यह संगठन राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संस्थागत सुधार और क्षेत्रीय स्वायत्तता की मांग कर रहा है. यह परिवर्तन दर्शाता है कि आर्थिक संकट ने लोगों को व्यवस्था की मूल संरचना पर प्रश्न उठाने के लिए प्रेरित किया है.
विडंबना यह है कि पाकिस्तान लंबे समय से स्वयं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरियों के अधिकारों का सबसे बड़ा समर्थक बताता रहा है. आत्मनिर्णय और लोकतांत्रिक अधिकारों की भाषा उसकी कश्मीर नीति का केंद्रीय तत्व रही है. किंतु आज पीओके से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे बिल्कुल अलग कहानी कहती हैं. हजारों लोग सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे हैं, सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गयी है, इंटरनेट सेवाएं बंद की जा रही हैं, गिरफ्तारियां हो रही हैं और मानवाधिकार संगठनों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाये जा रहे हैं. यह विरोधाभास नया नहीं है. पीओके की संवैधानिक स्थिति शुरू से ही अस्पष्ट रही है.
औपचारिक रूप से वहां अपना राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विधानसभा है, लेकिन रक्षा, विदेश नीति और अनेक महत्वपूर्ण मामलों पर नियंत्रण इस्लामाबाद का ही रहा है. समय के साथ लोगों में यह धारणा मजबूत हुई है कि उनकी संस्थाओं के पास वास्तविक अधिकार नहीं हैं और उनके भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय कहीं और लिये जाते हैं. यही असंतोष समय-समय पर आंदोलनों के रूप में सामने आता रहा है, पर इस बार उसका स्वरूप कहीं अधिक व्यापक है. इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू क्षेत्रीय पहचान का प्रश्न भी है. लंबे समय से यह देखा गया है कि पीओके के एक वर्ग में पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य अभिजात्य व्यवस्था के प्रति असंतोष रहा है.
सांस्कृतिक व भाषायी निकटता के बावजूद लोग खुद को अलग राजनीतिक पहचान के रूप में देखते हैं. मौजूदा आंदोलन इसका संकेत है कि बड़ी संख्या में लोग अपने राजनीतिक भविष्य के स्वतंत्र निर्धारक बनना चाहते हैं. आर्थिक मुद्दों ने इस चेतना को और मजबूत किया है. वर्ष 2023 और 2024 के आंदोलनों में बिजली की ऊंची दरें और सब्सिडी वाले गेहूं की कमी प्रमुख मुद्दे थे. तब लोगों ने सवाल उठाया था कि जिन क्षेत्रों में विशाल जलविद्युत परियोजनाएं हैं, जहां से पाकिस्तान को बिजली मिलती है, वहां के लोगों को ही महंगी बिजली क्यों खरीदनी पड़ती है? मंगला बांध जैसे परियोजनाओं के कारण हजारों लोग विस्थापित हुए, पर उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिला. इससे लोगों में यह भावना गहरी हुई कि विकास की कीमत उन्होंने चुकाई है, जबकि उसके लाभ कहीं और पहुंचे हैं.
इस आंदोलन पर पाकिस्तान सरकार की प्रतिक्रिया भी अपेक्षित ही रही है. जेएएसी पर आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंध लगाया गया, उसके नेताओं को गिरफ्तार किया गया और आंदोलन को राष्ट्रविरोधी बताया गया. पर अनुभव बताता है कि केवल दमन से राजनीतिक असंतोष समाप्त नहीं होता. बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और सिंध में भी सुरक्षा-केंद्रित नीतियां मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर सकी हैं. पीओके में भी बल प्रयोग शायद अस्थायी रूप से विरोध को दबा दे, पर उसके कारणों को समाप्त नहीं कर सकता.
पीओके का संकट पाकिस्तान के व्यापक आंतरिक संकट का हिस्सा है. देश के अनेक हिस्सों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संघीय ढांचे और शासन की वैधता पर प्रश्न उठ रहे हैं. आर्थिक कठिनाइयों, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सेना तथा नागरिक संस्थाओं के बीच तनाव ने एक अस्थिर वातावरण पैदा कर दिया है. ऐसे में पीओके का आंदोलन केवल एक क्षेत्रीय घटना नहीं रह जाता, बल्कि पाकिस्तान के राज्य-तंत्र और उसकी राजनीतिक संरचना पर एक व्यापक बहस का हिस्सा बन जाता है.
यह स्पष्ट है कि पीओके का संकट शासन, पहचान और राजनीतिक वैधता की प्रतिस्पर्धी अवधारणाओं का संघर्ष है. यह उन लोगों की आवाज है, जो अपने भविष्य पर अधिक अधिकार चाहते हैं और लंबे समय से चली आ रही व्यवस्थाओं को चुनौती दे रहे हैं. पीओके में उठी आवाज भीतर की बगावत है, जो पाकिस्तान की राजनीति पर दूरगामी असर डाल सकती है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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लेखक के बारे में
By आनंद कुमार
आनंद कुमार नई दिल्ली स्थित विश्लेषक हैं, जिनकी विशेषज्ञता रणनीतिक मामलों, सुरक्षा मुद्दों और दक्षिण एशियाई भू-राजनीति में है। उन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित थिंक टैंकों में कार्य किया है। वे चार पुस्तकों के लेखक और दो संपादित ग्रंथों के संपादक हैं। उनकी नवीनतम पुस्तक Strategic Rebalancing: China and US Engagement with South Asia है।
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