आबादी में बदलाव का असर राष्ट्रीय सुरक्षा पर
डेमोग्राफिक चेंज
Demographic change : देश में जनसांख्यिकीय संक्रमण का एक महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में जनसंख्या वृद्धि की असमानता है. जहां दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर के निकट पहुंच चुकी है, वहीं कई उत्तरी व पूर्वी राज्यों में प्रजनन दर अब भी अपेक्षाकृत अधिक है.
Demographic change : भारत महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय बदलाव से गुजर रहा है, जो देश के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक परिदृश्य को पुनः आकार दे रहा है. ये परिवर्तन केवल सांख्यिकीय नहीं होते, बल्कि शासन, विकास योजना, राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, सामाजिक सद्भाव तथा राष्ट्र की भावी दिशा पर गहरा असर डालते हैं. ऐसे में, जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का अध्ययन करने हेतु सरकार द्वारा समिति गठित करने का निर्णय समयोचित है. देश की जनसांख्यिकीय गतिशीलता असमान प्रजनन दर में गिरावट, व्यापक प्रवासन, तीव्र नगरीकरण, कुछ क्षेत्रों में धार्मिक संरचना में बदलाव, आबादी के वृद्ध होने तथा राज्यों के बीच सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के कारण जटिल होती जा रही है. इन बदलावों का विश्लेषण साक्ष्य आधारित नीतिगत दृष्टिकोण से होना चाहिए.
देश में जनसांख्यिकीय संक्रमण का एक महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में जनसंख्या वृद्धि की असमानता है. जहां दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर के निकट पहुंच चुकी है, वहीं कई उत्तरी व पूर्वी राज्यों में प्रजनन दर अब भी अपेक्षाकृत अधिक है. यह असमान बदलाव संसाधनों के वितरण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, रोजगार अवसरों तथा अवसंरचना की मांग में असंतुलन उत्पन्न करता है. तीव्र जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों पर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, आवास तथा रोजगार सृजन का दबाव बढ़ता है, जबकि वृद्ध होती आबादी वाले राज्यों को श्रमबल की कमी तथा बढ़ती आश्रित आबादी का सामना करना पड़ सकता है. प्रवासन आबादी में परिवर्तन का एक अन्य प्रमुख कारक है. ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों तथा गरीब से विकसित राज्यों की ओर आंतरिक प्रवासन तेजी से बढ़ा है.
आर्थिक अवसरों, औद्योगीकरण व शहरी आकांक्षाओं के कारण शहरों का विस्तार हो रहा है. किंतु अव्यवस्थित नगरीकरण से भीड़भाड़, नागरिक सुविधाओं पर दबाव, अनौपचारिक बस्तियों का विस्तार, बेरोजगारी तथा सामाजिक तनाव बढ़ सकते हैं. महानगरीय क्षेत्रों में आबादी का दबाव आवास, स्वच्छता, परिवहन व कानून-व्यवस्था की चुनौतियां बढ़ाता है. संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में सीमा-पार प्रवासन भी रणनीतिक व प्रशासनिक चिंताओं को जन्म देता है. सीमावर्ती राज्य अक्सर छिद्रयुक्त सीमाओं, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों तथा पड़ोसी देशों के साथ सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के कारण अधिक संवेदनशील होते हैं. अनियंत्रित प्रवासन पहचान, दस्तावेजीकरण, कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच तथा चुनावी प्रक्रियाओं से संबंधित चिंता पैदा कर सकता है. इसलिए सीमावर्ती क्षेत्रों के जनसांख्यिकीय पैटर्न का राष्ट्रीय सुरक्षा, संसाधन प्रबंधन तथा सामाजिक एकता के दृष्टिकोण से सावधानीपूर्वक अध्ययन होना चाहिए.
आबादी में बदलाव का राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव पड़ता है. पर्याप्त रोजगार अवसरों के बिना बड़ी युवा आबादी निराशा, सामाजिक अशांति तथा अपराध, उग्रवाद या असामाजिक गतिविधियों की ओर झुक सकती है. इसलिए चुनौती यह है कि शिक्षा, कौशल विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा रोजगार सृजन में निवेश के माध्यम से जनसांख्यिकीय क्षमता को मानव पूंजी में परिवर्तित किया जाये. कानून-व्यवस्था की स्थिति भी जनसांख्यिकीय गतिशीलता से प्रभावित होती है. तीव्र शहरी विस्तार, प्रवासन, बेरोजगारी तथा सामाजिक-आर्थिक असमानताएं स्थानीय तनाव, सामुदायिक ध्रुवीकरण, संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा तथा पहचान आधारित संघर्षों को जन्म दे सकती हैं. जहां शासन व्यवस्था बढ़ती आबादी के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती, वहां प्रशासनिक दबाव बढ़ जाता है. इसलिए जनसांख्यिकीय योजना को प्रशासनिक सुधारों तथा संस्थागत सुदृढ़ीकरण से जोड़ना चाहिए.
सामाजिक संतुलन और सद्भाव भी इसके महत्वपूर्ण आयाम हैं. भारत एक विविधतापूर्ण समाज है. किसी क्षेत्र विशेष में अचानक होने वाले जनसांख्यिकीय परिवर्तन समुदायों में असुरक्षा की भावना पैदा कर सकते हैं. यदि विकास असमान बना रहे या समुदाय स्वयं को विकास प्रक्रिया से अलग महसूस करें, तो सामाजिक एकता कमजोर हो सकती है. इसलिए संतुलित क्षेत्रीय विकास, समावेशी शासन तथा सामाजिक एकीकरण की नीतियां राष्ट्रीय एकता और सद्भाव बनाये रखने के लिए जरूरी हैं. एक अन्य चुनौती आबादी का वृद्ध होना है. घटती प्रजनन दर और बढ़ती जीवन प्रत्याशा के कारण वृद्ध आबादी का अनुपात बढ़ रहा है. आने वाले दशकों में इसका स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन व्यवस्था, वृद्धजन देखभाल तथा सामाजिक सहायता प्रणालियों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा. नीति-निर्माताओं को बड़ी युवा आबादी का प्रबंधन तथा वृद्ध समाज की जरूरतों की पूर्ति की दोहरी चुनौती के लिए तैयार रहना होगा.
पर्यावरणीय दबाव भी जनसांख्यिकीय परिवर्तन से जुड़ा हुआ है. पारिस्थितिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में आबादी का अत्यधिक संकेंद्रण प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा सकता है. जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला प्रवासन शहरी और तटीय क्षेत्रों में आबादी संबंधी दबाव तीव्र कर सकता है. इसलिए सतत विकास योजना में आबादी की वास्तविकताओं को शामिल करना जरूरी है. जनसांख्यिकीय विश्लेषण का उद्देश्य वैज्ञानिक रूप से प्रवृत्तियों को समझना और ऐसी नीतियां बनाना होना चाहिए, जो समावेशी विकास, सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय प्रगति को बढ़ावा दें.
सरकार द्वारा गठित समिति विश्वसनीय आंकड़े जुटाने, क्षेत्रीय आबादी पैटर्न की पहचान, प्रवासन प्रवृत्तियों का आकलन, सीमावर्ती क्षेत्रों की संवेदनशीलताओं का अध्ययन करने व दीर्घकालिक नीतिगत सुझाव देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. इसे जनसंख्या आंकड़ा प्रणालियों को मजबूत करने, मानव विकास को बढ़ावा देने, रोजगार अवसरों में सुधार, संतुलित क्षेत्रीय विकास तथा संवेदनशील क्षेत्रों में प्रभावी शासन सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. भारत आज एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय मोड़ पर खड़ा है. आने वाले दशक यह निर्धारित करेंगे कि देश अपनी जनसांख्यिकीय क्षमता का सफलतापूर्वक उपयोग कर पाता है या अनियंत्रित जनसांख्यिकीय परिवर्तनों से उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक व सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करता है. जनसांख्यिकीय परिवर्तन नि:संदेह एक प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दा है, जिसका सुरक्षा, शासन, कानून-व्यवस्था, सामाजिक सद्भाव तथा क्षेत्रीय स्थिरता पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है. वर्तमान समय की जरूरत घबराहट नहीं, बल्कि तैयारी है. भारत के जनसांख्यिकीय भविष्य को सुदृढ़ नीतियों, मानव पूंजी में निवेश, सामाजिक समावेशन तथा मजबूत संस्थागत तंत्रों के माध्यम से दिशा दी जानी चाहिए, ताकि जनसांख्यिकीय परिवर्तन अस्थिरता का कारण बनने के बजाय राष्ट्रीय शक्ति का अवसर बन सके. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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