रामकृष्ण परमहंस ने शुरू की थी यहां ‘डाब-चिंगड़ी’ भोग परंपरा, कोलकाता के इस कालीबाड़ी में चढ़ता है नॉनवेज प्रसाद

Author Ashish Jha
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कालीबाड़ी में पूजा करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

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Kali Mandir: भारत के पूर्वी राज्यों की संस्कृति, कला, खान-पान और शाक्त परंपरा में देवी काली की खास मान्यता है. खासकर पश्चिम बंगाल के लोगों की आस्था दक्षिणेश्वर काली मंदिर, काली घाट मंदिर और तारापीठ जैसे काली मंदिर में हैं. इसके साथ ही यहां एक और प्रसिद्ध काली पीठ है, जिसे स्थानीय लोग ठनठनिया काली पीठ कहते हैं. इस कालीबाड़ी का गहरा रिश्ता रामकृ्ष्ण परमहंस से हैं.

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Kali Mandir: कोलकाता के ठनठनिया कालीबाड़ी में मां काली की पूजा ‘सिद्धेश्वरी’ रूप में की जाती है. इस कालीबाड़ी का निर्माण 1703 में हुआ था. माना जाता है कि यहां कि भगवती कालीबाड़ी के निर्माण से बहुत पहले से यहां ‘जागृत’ थी. इस मंदिर की पूजा पूरी तरह शाक्त विधि से होता है. यहां मां काली को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद पूरी तरह आमिष (नॉन-वेज) होता है. यहां आज भी आमिष भोग चढ़ाने की परंपरा है. कोलकाता की सांस्कृतिक पहचान में इस मंदिर की अहम भूमिका मानी जाती है.

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ऐसे पड़ा ठनठनिया काली बाड़ी का नाम

कभी इस इलाके में घने जंगल के बीच काली मंदिर की घंटियों की आवाज गूंजती थी. उसी “ठन-ठन” ध्वनि से इस इलाके का नाम ठनठनिया पड़ा. ठनठनिया काली बाड़ी में मां की मूर्ति मिट्टी की है और हर साल इसका पुनः संस्कार किया जाता है. सिद्धेश्वरी देवी चतुर्भुजा और गहरे काले वर्ण की हैं. उनके बाएं हाथों में खड़्ग और नरकपाल सुशोभित हैं, जबकि दाहिने हाथों में अभय और वरद मुद्रा होती है. देवी को सोने के आभूषणों के साथ-साथ मुख्य रूप से चांदी के गहनों से सजाया जाता है.

मंदिर से जुड़ीं हैं कई मान्यताएं

मंदिर के इतिहास के संबंध में कहा जाता है कि कभी सुतानुटी गांव के पास बहने वाली भागीरथी नदी के किनारे घने जंगलों से घिरे एक श्मशान में उदनारायण ब्रह्मचारी नामक एक तांत्रिक को 1703 में मां काली की सिद्धेश्वरी रूप की मूर्ति प्राप्त हुई थी. 1860 में शंकर घोष नाम के व्यक्ति ने वर्तमान मंदिर और पुष्पेश्वर शिव का आठचाला मंदिर बनवाया. तभी से यहां नियमित पूजा की परंपरा शुरू हुई. शंकर घोष ने खुद पूजा की जिम्मेदारी संभाली और उनके वंशज आज भी इस मंदिर के सेवायत हैं.

परमहंस ने गाया है यहां भजन

कहा जाता है कि कामारपुकुर से आकर गदाधर चट्टोपाध्याय (रामकृष्ण देव) कुछ समय के लिए पास के झामापुकुर में रहते थे. किशोर गदाधर के कंठ से मां ने भजन सुने थे. दक्षिणेश्वर जाकर गदाधर जब रामकृष्ण परमहंस बने, तब भी वे कई बार ठनठनिया काली के दर्शन करने आए थे. रामकृष्ण देव अपने भक्तों से कहा करते थे कि ठनठनिया की काली बहुत जागृत हैं.

परमहंस ने शुरू की थी डाब-चिंगड़ी भोग की परंपरा

उन्होंने ब्रह्मानंद केशव चंद्र सेन के स्वास्थ्य लाभ के लिए यहां नारियल-चीनी और झींगा का नैवेद्य चढ़ाकर पूजा भी की थी. जब परमहंस देव श्यामपुकुर में बीमार थे, तब उनके भक्तों ने उनके स्वास्थ्य की कामना से इस मंदिर में मां को ‘डाब-चिंगड़ी’ (नारियल और झींगा) का भोग अर्पित किया था.

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पीएम मोदी ने भी की है पूजा

इस काली बाड़ी से कई रोचक कथाएं जुड़ी हुई हैं. मान्यता है कि इस कालीबाड़ी से भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटते. हर अमावस्या को यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, हालांकि पूरे साल ही श्रद्धालु मंदिर में आते रहते हैं. माना जाता है कि यहां मां के दरबार में हर मनोकामना पूरी होती है, इसलिए उनका नाम सिद्धेश्वरी पड़ा. पिछले दिनों चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां आ कर मां की पूजा की थी.

ऐसे पहुंचे कालीबाड़ी

ठनठनिया काली बाड़ी उत्तर कोलकाता में कॉलेज स्ट्रीट मोड़ के पास है. यह कालीबाड़ी विधान सरणी पर स्थित है. ठनठनिया काली बाड़ी सप्ताह के सातों दिन खुला रहता है. श्रद्धालु किसी भी दिन सुबह 6 बजे से 11 बजे तक और दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक मंदिर में दर्शन कर सकते हैं.

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