किताब का प्रमोशन और लेखक

Updated at : 15 Jan 2020 12:18 AM (IST)
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किताब का प्रमोशन और लेखक

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार kshamasharma1@gmail.com दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला खत्म हो गया. मेले में किताबों का लोकार्पण बड़ी संख्या में किया जाता है. सोशल मीडिया पर धूम रहती है. पहले लेखक का काम होता था लिखना और प्रकाशक का काम पुस्तक बेचना और पुस्तक समीक्षा के लिए पुस्तक भेजना. लेकिन, इन दिनों बहुत कम […]

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क्षमा शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

kshamasharma1@gmail.com

दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला खत्म हो गया. मेले में किताबों का लोकार्पण बड़ी संख्या में किया जाता है. सोशल मीडिया पर धूम रहती है. पहले लेखक का काम होता था लिखना और प्रकाशक का काम पुस्तक बेचना और पुस्तक समीक्षा के लिए पुस्तक भेजना. लेकिन, इन दिनों बहुत कम प्रकाशक समीक्षा के लिए पुस्तक भेजते हैं.

वे तभी भेजना पसंद करते हैं, जब पता हो कि वहां समीक्षा होगी ही. और इसके लिए वे चाहते हैं कि लेखक ही प्रयास करे. हिंदी फिल्मों की तरह किताबों के प्रमोशन का दौर भी आ गया है. प्रकाशक चाहते हैं कि लेखक ही अपनी किताबों का प्रमोशन करें. उन्हें पाठकों के बीच खुद ले जायें, साहित्य महोत्सवों में अपनी पुस्तकों का जिक्र करायें. उन पर फिल्में बनवायें, नाटक करायें आदि.

मजेदार यह है कि प्रकाशक लेखक को राॅयल्टी देने की बात भी दिल से नहीं करते. एक जमाने में जो किताबें प्रकाशकों के कंधे पर लदी हुई थीं, वे अब लेखकों के कंधों पर आ लदी हैं. बिल्कुल उसी तरह जैसे कि ऑनलाइन वेबसाइट्स अपने पत्रकारों से उम्मीद करती हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा लाइक्स का इंतजाम भी करायें.

मजेदार तो यह भी है कि जो हिंदी लेखक रात-दिन बाजार की शक्तियों को साहित्य की गिरावट और मिलावट के लिए जिम्मेदार मानता है, वह प्रकाशक के मुनाफे के लिए खुशी-खुशी बाजार की चपेट में आ जाता है. आखिर किताब का प्रमोशन बाजार के लिए ही होता है, किसी परोपकार के लिए नहीं. और इसके लिए लेखकों से सेलिब्रिटी जुटाने से लेकर अपनी पुस्तक की तरह-तरह से चर्चा कराना शामिल होता है.

प्रकाशक कहते हैं कि इस तरह के प्रमोशन से लेखकों के एक साल में ही कई-कई संस्करण आ जाते हैं. यह देखना भी दिलचस्प है कि जहां ग्यारह सौ प्रतियों का एक संस्करण छपता था, वहां अब यह तीन सौ प्रतियों का ही रह गया है. और यह कई साल पहले की बात है. हो सकता है कि अब संख्या और भी कम हो गयी हो.

इन दिनों किताब की गुणवत्ता के लिए उसमें छपी रचनाओं का अच्छा होना जरूरी नहीं है, बल्कि जरूरी यह है कि उसकी चर्चा कितनी हुई. किस अलां-फलां ने उसका नाम लिया. एक ही साल में उस पर कितने पुरस्कार बटोरे गये. अपनी किताब की खुद तारीफ करने का रोग भी बहुत बढ़ा है. क्योंकि महसूस होता है कि क्या पता कोई और तारीफ करे न करे, तो क्यों न खुद ही कर लें.

बहुत से प्रकाशक लेखकों की राॅयल्टी बढ़ाना तो दूर, कुछ नहीं देते. एक अरसा पहले प्रकाशक संघ से जुड़ी एक महिला ने मुझसे कहा था कि लेखकों को दस प्रतिशत राॅयल्टी देनी पड़ती है. इससे प्रकाशकों को भारी घाटा होता है. इसलिए इसे घटाकर पांच प्रतिशत कर देना चाहिए. देखनेवाली बात यह है कि कितने प्रकाशक हैं, जो मात्र दस या पांच प्रतिशत की राॅयल्टी अपने लेखकों को देते हैं.

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