भीतर का बच्चा जीवित रहे
Author Prabhat khabar digital desk
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कविता विकास लेखिका [email protected] अनुशासन में आदमी जब ऊबने लगता है, तब वह स्वतंत्रता की खोज में भागता है. कभी-कभी अपने तरीके से जीवन जीने का मन करता है, जिसमें थोड़ी स्वतंत्रता हो और ढेर सारी मनमानी हो. बीमारियों से ग्रस्त आदमी भी कभी-कभी खाने-पीने में थोड़ी छूट चाहता है.सच तो यह है कि हर […]
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कविता विकास
लेखिका
अनुशासन में आदमी जब ऊबने लगता है, तब वह स्वतंत्रता की खोज में भागता है. कभी-कभी अपने तरीके से जीवन जीने का मन करता है, जिसमें थोड़ी स्वतंत्रता हो और ढेर सारी मनमानी हो. बीमारियों से ग्रस्त आदमी भी कभी-कभी खाने-पीने में थोड़ी छूट चाहता है.सच तो यह है कि हर जीवित प्राणी आजादी चाहता है. पिछले दिनों एक मेले में एक बुजुर्ग दंपती को मैंने चटखारे लेते हुए चाट खाते देखा. कभी दही कभी खट्टी चटनी मांग-मांगकर खा रहे बुजुर्ग पुरुष को इन दोनों चीजों से परहेज करने को कहा गया था. पर उनके चेहरे पर अपूर्व तृप्ति थी.
सारे बंधन टूट गये थे. उन्हें भी इस बात की फिक्र रही होगी कि वे इतना ही खाएं, जो नुकसान न करे. ऐसा ही तृप्त भाव वृद्धाश्रम से आयी एक वृद्ध महिला के भी चेहरे पर देखा, जिन्हें सन-ग्लास का बहुत शौक था. उन्होंने एक सन-ग्लास पहनकर खूब फोटो खिंचवाये.जीवन बेफिक्री से जीने के दिन भले ही कम हो गये हों, पर जब मौका मिले, अपने अंदर के बच्चे को जीवित कर लीजिए. परेशान तो हर कोई है.
कोई बीमारी की वजह से, कोई पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन को लेकर, तो कोई दफ्तर के तनाव को झेलते हुए. इन सब के बीच भी मजा-मस्ती के क्षण को कभी नहीं गंवाएं. विद्यालयों में बच्चे गेम्स पीरियड में जीभर कर शोर मचाते हैं. उस समय की स्वतंत्रता उन्हें बाकी समय क्लास में शांति बनाये रखने में मदद करती है. उनकी एकाग्रता भी बढ़ती है. इसलिए अनुशासन में ढिलाई भी जरूरी है.
कुछ दिन पहले मुझे मायके जाने का मौका मिला. खाली पड़े उस मकान में गजब का सुकून था. कमरे, आंगन, यहां तक कि दीवारों को भी देखते ही बचपन की अनेक स्मृतियां ताजा हो गयीं. इन स्मृतियों ने मुझे खूब गुदगुदाया. अकेले ही कभी मैं हंस पड़ती, तो कभी रो पड़ती. पारिवारिक बोझ के बीच बचपन कब हाथ से निकल गया, पता ही नहीं चला. सुखद यादों में जीने के लिए जिस तन्हाई की जरूरत थी, वह इसी अकेलेपन में मिली.
हमारी संवेदनाएं जीवित रहें, इसलिए आवश्यक है व्यस्तताओं के बीच भी कुछ पल केवल अपने लिए अपने साथ जीएं. सबके शौक अलग-अलग होते हैं, अपने साथ जीने का मतलब अपने शौक के साथ समय बिताना होता है.
ऐसे समय में आप पेंटिंग करें, गाना गायें या कविता लिखें, सुडोकु हल करें या फिर जो भी आपकी हॉबी रही हो, उसमें ध्यान लगाएं. बीती जिंदगी का स्वार्थ से परे खालीपन में अवलोकन करें, तो पता चलेगा आपने कहां छल-कपट से जीत हासिल की और कहां ईमानदारी से. अगर अपने छल पर पछतावा होता है, तो अवश्य ही उसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी.
यह प्रेरणा उम्र के साथ स्वतः ही उत्पन्न होती है, जो मनुष्य को अनुभवी बनाती है. कहते हैं न, वीणा के तार को न कसकर बांधना चाहिए और न ही ढीला ही, दोनों अवस्था में सुर नहीं सधेंगे. जिंदगी भी वीणा के तार की ही तरह है. समयबद्धता के साथ अनुशासन और आजादी दोनों के तालमेल से ही जिंदगी में सुखद परिणाम आयेंगे.
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