आतंकी हमलों के घेरे में चीन

Updated at : 26 Nov 2018 4:40 AM (IST)
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आतंकी हमलों के घेरे में चीन

प्रो सतीश कुमार सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा singhsatis@gmail.com पाकिस्तान के सबसे बड़े नगर कराची स्थित चीनी वाणिज्य दूतावास में आतंकी हमला हुआ, जिसमें चीन के इंजीनियर मारे गये. इस हमले की जिम्मेदारी बलूच लिबरेशन फ्रंट आर्मी ने ली है. बलूच चीन द्वारा संचालित प्रोजेक्ट के घोर विरोधी हैं. जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह […]

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प्रो सतीश कुमार

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा

singhsatis@gmail.com

पाकिस्तान के सबसे बड़े नगर कराची स्थित चीनी वाणिज्य दूतावास में आतंकी हमला हुआ, जिसमें चीन के इंजीनियर मारे गये. इस हमले की जिम्मेदारी बलूच लिबरेशन फ्रंट आर्मी ने ली है. बलूच चीन द्वारा संचालित प्रोजेक्ट के घोर विरोधी हैं.

जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कहा था कि पाकिस्तान आतंकवाद की फैक्टरी बन गया है, तो चीन ने बीच-बचाव किया था और यह कहकर पाकिस्तान को क्लीन चिट दे दी थी कि पाकिस्तान बहादुरी के साथ आतंकवाद के विरोध में लड़ रहा है. भारत ने दो बार मसूद अजहर के विरुद्ध सिक्योरिटी काउंसिल में प्रस्ताव बढ़ाया था कि जैश-ए-मोहम्मद और मसूद अजहर को आतंकी घोषित किया जाये, लेकिन चीन ने भारत के इस प्रस्ताव का विरोध किया था. दुनिया के अन्य देश भारत के पक्ष में थे. आज जब आतंकी छींटे खुद पर पड़े हैं, तो चीन बौखलाया हुआ है.

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने इसे चीन के विरुद्ध साजिश माना है, जिससे चीन द्वारा पाकिस्तान में संचालित विभिन्न परियोजनाओं को रोक दिया जाये.

इसके अलावा, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के एक मदरसे में बम विस्फोट हुआ, जिसमें पांच से ज्यादा लोग मारे गये. बलूच और पख्तूनख्वा आदिवासी बहुल क्षेत्र हैं. यह इलाके अत्यंत ही पिछड़े हुए हैं. गरीबी बेतरतीब पसरी हुई है, विकास का नामो-निशान नहीं. केवल सैनिक छावनियां दिखायी देती हैं.

क्या कारण है कि पाकिस्तान में आतंक रुक नहीं पा रहा है? इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद, सबसे अहम वादा विकास करने और आतंकी संगठनों पर लगाम लगाने का ही था. फिर बात बन क्यों नहीं रही? इसके कारण पाकिस्तान की अवाम को मालूम हैं, दीवारों पर लिखी हुए हैं. बोयेंगे बबूल, तो आम कैसे फलेंगे. आतंक केवल आतंकी ही पैदा कर सकता है. चीन को यह बात मालूम होनी चाहिए थी.

ये घटनाएं केवल संकेत हैं. खुद पाकिस्तान के मंत्री ने कहा है कि पाकिस्तान को ऐसे कई अन्य हमलों के लिए तैयार रहना पड़ेगा. पाकिस्तान अपनी करतूतों की वजह से आतंकवाद का अड्डा बना हुआ है. अमेरिका की वार्षिक रिपोर्ट में चर्चा की गयी है कि अगर पाकिस्तान को इस दलदल से निकलना है, तो उसे भारत के साथ मित्रवत संबंध बनाने होंगे.

लेकिन इस बात की उम्मीद दिखती नहीं. हाल में, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की चीन यात्रा के दौरान भारत विरोधी जुमले पढ़े गये और पाकिस्तान-चीन संबंध को समुद्र से गहरा और माउंट एवरेस्ट से ऊंचा बताया गया.

चीन का ग्वादर पोर्ट और सीपेक (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) बलूचिस्तान में स्थित है. क्षेत्रफल की दृष्टि से यह सबसे बड़ा राज्य है, लेकिन पाकिस्तान की पांच फीसदी आबादी ही वहां रहती है.

इसके मुहाने पर ईरान और अफगानिस्तान की सीमा है. पाकिस्तान की सबसे बड़ी समुद्री सीमा भी इसी राज्य में है. आर्थिकी व सामाजिकता में यह इलाका अत्यंत पिछड़ा हुआ है. पाकिस्तान के सत्ताधारियों ने पंजाब को छोड़कर, किसी अन्य क्षेत्र का विकास नहीं होने दिया. इसलिए, बलूच और पख्तूनख्वा अपनी क्षेत्रीय पहचान से ज्यादा जुड़े हुए हैं.

उनमें पाकिस्तानी तत्व कम है, इसलिए राष्ट्रीयता का भी प्रश्न खतरे में है. बलूचों का इतिहास भी अलग रहा है. उनकी पहचान ईरान के वंशजों और पर्सियन संस्कृति से ज्यादा जुड़ी हुई थी, अंग्रेजी साम्राज्य में भी इनका आर्थिक-सामाजिक विकास नहीं हो पाया था.

वर्ष 2015 में, चीन द्वारा ओबोर योजना में पाकिस्तान को शामिल किया गया, जिसका ठिकाना बलूचिस्तान बना. यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है, जिसका लाभ पाकिस्तान के पंजाब सूबे को मिलता है. चीन की आर्थिक परियोजनाओं को सुरक्षित करने के लिए पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में सैनिक छावनियां बना डाली.

पहले से ही 1500 की फौज वहां पर चीन की सुरक्षा में तैनात है. इमरान खान की सरकार ने इस वर्ष फिर से तीन नयी सैनिक छावनियां बनाने की घोषणा कर दी. बलूचिस्तानी बिजली, पानी और शिक्षा की मांग कर रहे हैं, वहीं सेना की बंदूकें सुनायी दे रही हैं.

पाकिस्तान के नये प्रधानमंत्री की राजनीतिक हैसियत निरंतर गिरती जा रही है. सितंबर में जब आर्मी चीफ बाजवा ने सेना के महत्वपूर्ण अधिकारियों का तबादला किया, तो इमरान खान से सलाह-मशविरा भी नहीं किया. इमरान खान सऊदी अरब गये, तो उन्हें इस बात की उम्मीद थी कि ग्वादर पोर्ट निवेश में सऊदी पाकिस्तान का सहयोगी बन जायेगा. ऐसा नहीं हुआ.

इमरान चीन गये, तो बात वहां भी नहीं बनी. चीन निवेश के लिए रकम पाकिस्तानी कंपनी को नहीं देता, बल्कि सारी रकम चीन के खाते में जाती है. वहीं, पाकिस्तान की सेना मुस्तैद रहती है. चीन के मकड़जाल में पाकिस्तान फंसा हुआ है.

अमेरिका आइएमएफ को कर्ज देने की मनाही कर ही चुका है. पाकिस्तान भारत को दुश्मन की निगाहों से देखता है. इसलिए पाकिस्तान की हालत और खराब होगी, जिसका खामियाजा चीन भी उठायेगा. बलूचियों की नजर में सबसे बड़ी दुश्मन पाकिस्तानी सेना है.

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