आप संसदीय दल का टूटना तय था

नितिन नबीन के साथ राघव चड्डा
AAP : जो पार्टी संगठन और सरकार में पारदर्शिता की बात करती थी, नीति निर्धारण में जन सहभागिता की बात करती थी, आलाकमान कल्चर का विरोध करती थी, हर स्तर पर लोकतंत्र की वकालत करती थी, वह पार्टी एक आदमी में सिमट कर रह गयी. उससे असहमति का अर्थ था सर्वनाश.
-आशुतोष-
AAP : यह तो होना ही था. हैरानी इस पर नहीं कि आप क्यों टूटी? हैरानी इस बात पर है कि इतनी देर से क्यों टूटी? आप संसदीय दल के दो टुकड़े होना, मेरे लिए वह खबर है, जिसका लंबे समय से मैं इंतजार कर रहा था. आप के सात राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़ी और भाजपा से जा जुड़े. इन सात में से तीन वे हैं, जो कभी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल की आंख और कान हुआ करते थे. उनके पास इतनी पावर थी कि पार्टी के बेहद वरिष्ठ लोग भी उनसे ईर्ष्या करते थे. केजरीवाल उनकी ही सुनते थे. पर उन्हीं लोगों ने बगावत की, जिन्हें पार्टी ने बनाया, संवारा और कम उम्र में पहचान दी. बाहर के लोगों को यह सुनकर हैरानी हो सकती है, लेकिन जो लोग पार्टी चलाने के केजरीवाल के तरीके से वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि एक दिन ऐसा होना ही था. दरअसल आप जिन उद्देश्यों के लिये बनी थी, उनसे वह भटकने लगी. जब वह दूसरी पार्टियों की तरह हो गयी और उनकी तरह बर्ताव करने लगी, तब यह होना स्वाभाविक ही था.
जब आप बनी और मुझ जैसे लोग इसमें शामिल हुए, तब यह नारा था, ‘हम राजनीति करने नहीं, राजनीति को बदलने आये हैं’. लेकिन जैसे-जैसे कारवां बढ़ता गया, सत्ता के खेल में जुड़ता गया, वैसे-वैसे यह नारा फीका पड़ता गया. जो परंपरागत राजनीति को बदलने आयी थी, वह खुद परंपरागत राजनीति का शिकार हो गयी. आज आप और दूसरे दलों में कोई फर्क नहीं बचा है. आम आदमी पार्टी लाखों-करोड़ों लोग का ख्वाब थी.
वह ख्वाब, जो इस देश को भ्रष्टाचार मुक्त देखना चाहता है, जो आम और खास में फर्क न करे, जिसके नेता आम आदमी की तरह रहें. अन्ना आंदोलन ने इस ख्वाब को पंख दिये. जैसे-जैसे आंदोलन बढ़ता गया, लाखों-करोड़ों लोगों को लगा कि अब देश को भ्रष्टाचारी सिस्टम से मुक्ति मिलेगी, आम आदमी के साथ न्याय होगा, फैसले उसकी सहमति से होंगे और देश में सही मायनों में लोकतंत्र होगा. यह ख्वाब नया नहीं था. यह वह ख्वाब था, जो गांधी, नेहरू और हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था. गांधी का ऐसा ही नारा था, जिसमें आखिरी पंक्ति में बैठे व्यक्ति के आंसू पोंछने की बात थी.
ये आदर्श आजादी के बाद कुछ साल चले, पर जल्दी ही सत्तालोलुप लोगों ने पूरे सिस्टम को हाईजैक कर लिया. अन्ना आंदोलन इस सिस्टम से निकलने की जद्दोजहद का नाम था. इस आंदोलन ने एक राजनीतिक दल का आकार लिया, तो लोगों को लगा कि उनके सपने सच होंगे. एक पार्टी का जन्म के डेढ़ साल में दिल्ली में सरकार बना लेना, दस साल में पंजाब में सत्ता में आ जाना और राष्ट्रीय पार्टी का खिताब हासिल कर लेना सामान्य नहीं था. लेकिन कहते हैं न कि सत्ता भ्रष्ट करती है और परम सत्ता पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है. वही आप के साथ हुआ. आप के नेताओं को सत्ता के स्वार्थ ने डंस लिया. क्रांति के साथी पार्टी छोड़ते गये और दल पर एक आदमी का कब्जा हो गया. जिसने पार्टी बनाने में सबसे अहम भूमिका निभाई थी, उसी ने पार्टी को निपटाना शुरू कर दिया.
जो पार्टी संगठन और सरकार में पारदर्शिता की बात करती थी, नीति निर्धारण में जन सहभागिता की बात करती थी, आलाकमान कल्चर का विरोध करती थी, हर स्तर पर लोकतंत्र की वकालत करती थी, वह पार्टी एक आदमी में सिमट कर रह गयी. उससे असहमति का अर्थ था सर्वनाश. यह अन्ना आंदोलन की ‘एंटी थीसिस’ थी. पार्टी में केजरीवाल के अलावा सब रोबोट हो गये. जिनमें जितना सॉफ्टवेयर डाला जाये, बस उतना ही काम करे और आगे के काम के लिये सॉफ्टवेयर अपडेट का इंतजार किया जाये. पार्टी में लोकतंत्र खत्म हुआ, तो स्वार्थी लोगों का जमावड़ा होने लगा. इनको समझ में आ गया कि नेता की परिक्रमा करो, विधायक, सांसद और मंत्री बनो.
लेकिन इसमें एक ट्विस्ट था. नेतृत्व के लिए उपयोगिता सबसे बड़ा मूल्य हो गयी. चूंकि नेतृत्व को मशीनों की जरूरत थी और हर मशीन की एक एक्सपायरी डेट होती है, लिहाजा हर नेता की, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, एक एक्सपायरी डेट तय हो गयी. और जब वह डेट आ गयी, तब वह नेता अनुपयोगी हो गया. इसी ‘यूज एंड थ्रो’ पॉलिटिक्स का नतीजा है कि राघव चड्डा, संदीप पाठक और स्वाति मालीवाल जैसे लोग, जो कभी पार्टी में बेहद शक्तिशाली थे, एक्सपायरी डेट के बाद पैदल हो गये. जिनकी नेता के घर में फ्री एंट्री थी और जो हर मीटिंग की शोभा थे, वे फोन कॉल को तरस गये. जब कभी पार्टी एक व्यक्ति में समाहित हो जाती है, तब ऐसा ही होता है. दुनिया में इसके सैकड़ों उदाहरण हैं और भारत में भी. और जब पावरफुल नेता अपनी ही पार्टी में सड़क पर आ जाता है, तब उसके पास दो विकल्प होते हैं. या तो अपमानित होता रहे या पार्टी छोड़ दे.
नेतृत्व को समझना चाहिए कि पार्टी एक जीवित संस्था होती है, जिसकी संवेदना का एक अलग संसार होता है. व्यक्ति मशीन नहीं हो सकता. उसका भी एक ‘स्व’ होता है. जब उसके ‘स्व’ पर चोट पहुचंती है, तब वह रिएक्ट करता है. और जो राजनीति में कैरियर बनाने आये हैं, वे नये अवसर खोजेंगे, पार्टी छोड़ेंगे और पार्टी टूटेगी भी. अब तक ढेरों लोगों ने पार्टी छोड़ी है. पर अब पानी नाक के ऊपर बहने लगा है, लिहाजा पार्टी टूटने की नौबत आ गयी है. जो आदर्शवादी थे, उन्होंने नया रास्ता चुन लिया. लेकिन जो कैरियरवादी थे, वे भाजपा में शामिल हो गये.
मेरा कहने का यह अर्थ नहीं है कि पार्टी में अब अच्छे लोग नहीं बचे हैं. अब भी निःस्वार्थ भाव से काम करने वाले लोग हैं. ऐसे लोग हैं, जिन्हें अब भी लगता है कि पार्टी देश बदल सकती है. वे बिना कुछ मांगे निष्काम भाव से उस ख्वाब को पूरा करने की चाह में खुद को खपा रहे हैं. ऐसे लोगों की कद्र पार्टी को करनी होगी, तभी पार्टी आगे बढ़ पायेगी. पार्टी को अगर आगे बढ़ना है, तो एक बार फिर उसे व्यक्तियों की कद्र करनी होगी, असहमति की आवाज सुनने की आदत डालनी होगी, पार्टी में लोकतंत्र लाना होगा, इसे व्यक्ति से निकाल कर संगठन पर केंद्रित करना होगा, नयी रणनीति बनानी होगी. क्रांतियां इतनी आसानी से नहीं मरतीं. वे बलिदान मांगती हैं. क्या केजरीवाल खुद को बदलने के लिए तैयार हैं?
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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