खेती की मुश्किलें बढ़ा सकता है अल नीनो

खेती की मुश्किलें
el nino effect : अल नीनो, जो वर्तमान में अपनी प्रारंभिक अवस्था में है, मॉनसून के शुरुआती दौर में विकसित होकर अगस्त और सितंबर के दौरान और मजबूत होगा. हालांकि, जून में मॉनसून की शुरुआत 101 प्रतिशत दीर्घावधि औसत (एलपीए) के साथ सामान्य रह सकती है, पर जुलाई (95 प्रतिशत) से स्थिति बिगड़नी शुरू होगी.
el nino effect : खजुराहो- 45 डिग्री, भटिंडा- 43 डिग्री, कानपुर- 45 डिग्री, दिल्ली एनसीआर- 43 डिग्री! अप्रैल के चौथे सप्ताह में मौसम का यह मिजाज देख डर लगता है कि आने वाले दो महीने, न जाने सूरज कैसी आग बरसायेगा. भारत में बढ़ती तपिश और जानलेवा होती लू के पीछे छिपे जलवायु परिवर्तन के गहरे संकट को अल नीनो के रुख ने और घातक बना दिया है. मौसम विज्ञान के नवीनतम आंकड़े भविष्य की जिस भयावहता को रेखांकित कर रहे हैं, उसकी बानगी अप्रैल के दूसरे सप्ताह से देखने को मिल गयी. दुनिया के सबसे गर्म शहरों की सूची में भारतीय शहरों का दबदबा एक गंभीर पर्यावरणीय चेतावनी है. यह महज एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि वायुमंडल में बनते ‘हीट डोम’ और कंकरीट के फैलते जंगलों का नतीजा है, जिसने शहरों को ‘अर्बन हीट आइलैंड’ में बदल दिया है.
स्काइमेट वेदर की अप्रैल, 2026 की रिपोर्ट इस स्थिति को और अधिक चिंताजनक बनाती है, जिसके अनुसार इस वर्ष भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के सामान्य से कम रहने का अनुमान है. यह भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है. अल नीनो, जो वर्तमान में अपनी प्रारंभिक अवस्था में है, मॉनसून के शुरुआती दौर में विकसित होकर अगस्त और सितंबर के दौरान और मजबूत होगा. हालांकि, जून में मॉनसून की शुरुआत 101 प्रतिशत दीर्घावधि औसत (एलपीए) के साथ सामान्य रह सकती है, पर जुलाई (95 प्रतिशत) से स्थिति बिगड़नी शुरू होगी. इसका सर्वाधिक खतरा मध्य भारत के वर्षा आधारित क्षेत्रों और उत्तर-पश्चिम भारत के राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा और राजस्थान पर मंडरा रहा है.
इस वर्ष मॉनसून पर अल नीनो का साया मंडराता दिख रहा है, जिसके चलते कुल वर्षा लंबी अवधि के औसत, यानी एलपीए का केवल 94 प्रतिशत रहने का अनुमान है. प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है और इसके मई से जुलाई के बीच सक्रिय होने की प्रबल आशंका है, जो ऐतिहासिक रूप से भारतीय मॉनसून को कमजोर करने के लिए जिम्मेदार मानी जाती है. हालांकि, मॉनसून की शुरुआत जून के महीने में सामान्य रह सकती है, लेकिन जैसे-जैसे सीजन आगे बढ़ेगा, अल नीनो का प्रभाव गहराता जायेगा. विशेष रूप से अगस्त और सितंबर के महीनों में वर्षा के स्तर में भारी गिरावट आने की आशंका है, जो रबी और खरीफ दोनों फसलों के लिए संकट पैदा कर सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि गर्मी की इस बढ़ती आवृत्ति का सीधा संबंध वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि से है. वर्ष 1981 से 2020 के बीच भारत का औसत तापमान लगभग एक डिग्री बढ़ चुका है. भारत में शहरीकरण बढ़ रहा है. तभी पहले जिस लू का प्रभाव केवल गंगा के मैदानी इलाकों तक सीमित था, अब उसका दायरा बढ़कर 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर तक फैल गया है. शहर, यानी आलीशान भवन और कंकरीट व डामर की सड़कें, ये प्राकृतिक मिट्टी की तुलना में कई गुना अधिक गर्मी अवशोषित करती हैं. रात के समय जब ग्रामीण क्षेत्र ठंडे होने लगते हैं, तब शहरों की ये इमारतें अपनी जमा की हुई गर्मी छोड़ती हैं. इसे ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’ कहा जाता है, जिससे शहरों का तापमान आसपास के गांवों से पांच से सात डिग्री सेल्सियस तक अधिक बना रहता है.
यहां अल नीनो और ला नीना के बारे में भी समझना होगा कि ये हैं क्या? अल नीनो मध्य और पूर्व-मध्य भूमध्यरेखीय समुद्री सतह के तापमान में नियमित अंतराल के बाद होने वाली वृद्धि है, जबकि ला नीना इसके विपरीत तापमान कम होने की मौसमी घटना है. दक्षिणी अमेरिका से भारत तक के मौसम में बदलाव के सबसे बड़े कारण अल नीनो और ला नीना प्रभाव ही होते हैं. अल नीनो का संबंध भारत व ऑस्ट्रेलिया में गर्मी व सूखे से है, वहीं ला नीना अच्छे मॉनसून का वाहक है. इसे भारत के लिए वरदान कहा जा सकता है. भले भारत में इसका असर हो, पर अल नीनो और ला नीना घटनाएं पेरू के तट (पूर्वी प्रशांत) और ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट (पश्चिमी प्रशांत) पर घटित होती हैं. हवा की गति इन प्रभावों को दूर तक ले जाती है.
सामान्य परिस्थिति में भूमध्यरेखीय हवाएं पूर्व से पश्चिम (पछुआ) की ओर बहती हैं और गर्म हो चुके समुद्री जल को ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी समुद्री तट की ओर बहा ले जाती हैं. गर्म पानी से भाप बनता है और उससे बादल बनते हैं. परिणामस्वरूप, पूर्वी तट के आसपास अच्छी बरसात होती है. वहीं अल नीनो परिस्थिति में पछुआ हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं व समुद्र का गर्म पानी लौटकर पेरू के तटों पर एकत्र हो जाता है. इस तरह समुद्र का जल स्तर 90 सेंटीमीटर तक ऊंचा हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप वाष्पीकरण होता है व इससे बरसात वाले बादल निर्मित होते हैं. इससे पेरू में तो भारी बरसात होती है, लेकिन मॉनसूनी हवाओं पर इसके विपरीत प्रभाव के चलते ऑस्ट्रेलिया से भारत तक सूखा हो जाता है. इस अंधकारमय परिदृश्य के बीच एकमात्र उम्मीद ‘इंडियन ओशन डिपोल’ (आइओडी) से है. विशेषज्ञों का मानना है कि मॉनसून के अंत तक एक ‘पॉजिटिव आइओडी’ विकसित हो सकता है, जो अल नीनो के नकारात्मक प्रभावों को कुछ हद तक कम करने में सहायक हो सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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