पास होना ही तो सबकुछ नहीं..

Published at :29 May 2014 5:13 AM (IST)
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पास होना ही तो सबकुछ नहीं..

।। अखिलेश्वर पांडेय।। (प्रभात खबर, जमशेदपुर) इन दिनों स्कूल-कॉलेज के रिजल्ट का सीजन चल रहा है. पूरे देश में विभिन्न बोर्डो के रिजल्ट एक-एक कर प्रकाशित हो रहे हैं. कहीं खुशी तो कहीं गम का आलम है. एक दौर था जब परीक्षा में पास या फेल होने की ही बात होती थी. पर यह दौर […]

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।। अखिलेश्वर पांडेय।।

(प्रभात खबर, जमशेदपुर)

इन दिनों स्कूल-कॉलेज के रिजल्ट का सीजन चल रहा है. पूरे देश में विभिन्न बोर्डो के रिजल्ट एक-एक कर प्रकाशित हो रहे हैं. कहीं खुशी तो कहीं गम का आलम है. एक दौर था जब परीक्षा में पास या फेल होने की ही बात होती थी. पर यह दौर 90 फीसदी के आगे जाने की होड़ का है. बॉलीवुड में‘मिस्टर परफेक्शनिस्ट’ के नाम से मशहूर अभिनेता आमिर खान ने अपनी बेटी इरा के आईसीएससी बोर्ड परीखा में 89 फीसदी अंक मिलने पर सोशल साइट के माध्यम से अपनी खुशी का इजहार किया है. आम तौर पर अपने निजी और पारिवारिक मसलों पर चर्चा न करनेवाले आमिर खान अपनी इस पारिवारिक खुशी को छुपा नहीं पाये. ऐसा हर मां-बाप के साथ होता है. अपनी सफलता से अधिक हर मां-बाप अपनी बच्चों की सफलता से खुश होता है. चाहे वह परीक्षा में अच्छे नंबर लाने की बात हो या छोटा-मोटा कोई अवार्ड मिलना ही क्यों न हो.

इस बीच, जमशेदपुर में सीबीएसई बोर्ड का 12वीं का रिजल्ट आने से एक दिन पूर्व श्रेया नाम की एक लड़की ने आत्महत्या कर ली. अपनी मां और छोटे भाई के नाम लिखे सुसाइड नोट में श्रेया ने अपनी जिन कोमल भावनाओं का जिक्र किया उसे पढ़ कर किसी की भी आंखों में आंसू आ जायेंगे. उसने सुसाइड नोट में इस बात को रेखांकित किया कि चूंकि उसे पता है कि उसके पेपर ठीक नहीं हुए हैं और उसका रिजल्ट बहुत खराब आने वाला है. वह अपने मां-बाप की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पायी, उनकी उम्मीदों को पूरा नहीं कर पायी, इसलिए उसे जीने का कोई हक नहीं है. संयोग देखिये आत्महत्या करने के दूसरे ही दिन जब पूरा घर शोक में डूबा था तभी पता चला कि श्रेया का रिजल्ट आ गया और वह पास हो गयी है

अब सोचिए! उसके घरवालों, उसके मां-बाप के ऊपर क्या बीत रही होगी. आखिर क्यों श्रेया ने उम्मीद का दामन छोड़ दिया? क्यों वह अपने अभिभावकों से अपने मन की बात नहीं कह पायी? आखिर वह क्यों नहीं बता पायी कि उसका पेपर उसके मन मुताबिक नहीं हुआ है? और अगर ऐसा था ही तो क्या हुआ? क्या जिंदगी के सारे रास्ते बंद हो गये थे? युवा मन में इतनी निराशा, इतनी हताशा, इतना पछतावा आखिर क्यों?

यह मसला, जरा गंभीर है. यह घटना एक सबक है हर मां-बाप और छात्र-छात्र के लिए. इस पर हर किसी को आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए. क्या किसी परीक्षा का परिणाम किसी की जिंदगी से बड़ा हो सकता है? क्या जिंदगी की सबसे अहम बात किसी परीक्षा को पास करना है? क्या सच में हर मां-बाप अपने बच्चों पर, खास कर पढ़ाई और कैरियर को लेकर, अपनी अपेक्षाएं थोप देते हैं? क्या अधिकतर मां-बाप और उनके बच्चों में आपसी संवाद खत्म या कम से कमतर होता जा रहा है? जरा सोचिए..

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