जो हुआ सो हुआ मातम क्या मनाना!

।। राजीव चौबे।। (प्रभात खबर, रांची) 16वीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों के परिणाम आ चुके हैं और इसके साथ ही पिछले दो-तीन महीनों से दिल्ली की सत्ता हथियाने की दौड़, रैलियों और रोड शो का दौर भी खत्म हो चुका है. इस दौड़ में शामिल प्रतिभागी और दर्शक अब राहत की सांस ले रहे […]
।। राजीव चौबे।।
(प्रभात खबर, रांची)
16वीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों के परिणाम आ चुके हैं और इसके साथ ही पिछले दो-तीन महीनों से दिल्ली की सत्ता हथियाने की दौड़, रैलियों और रोड शो का दौर भी खत्म हो चुका है. इस दौड़ में शामिल प्रतिभागी और दर्शक अब राहत की सांस ले रहे हैं. इस बार नरेंद्र मोदी ने पूरी तरह से मैदान मार लिया है और बाकी दलों के नेता मन मसोस कर रह गये हैं.
उन्हें न खाना अच्छा लग रहा है और न पीना. दिन-रात वे इसी उधेड़-बुन में लगे हुए हैं कि नमो की लहर में उनकी जमानत जब्त होनेवाली जो स्थिति हुई है, उसके बाद अपनी पार्टी, कार्यकर्ताओं, समर्थकों और जनता को कौन सा मुंह दिखायें. इस बीच राजनीतिक गलियारों में इस्तीफों और समीक्षाओं का दौर जारी है. खैर, यह तो हुई नेताओं की बात अब जरा जनता जनार्दन के भी हाल पर गौर कर लें.
अब नरेंद्र मोदी की जीत का श्रेय उनके वाक् कौशल को जाता है या उनके नमो ब्रांड को, अरबों रुपयों के विज्ञापन को या मीडिया में उनके महिमामंडन को, यह बाद की बात है. इन सबसे बड़ी बात है कि नरेंद्र मोदी अब इस देश के प्रधानमंत्री लगभग बन चुके हैं. लेकिन यह सब उनके विरोधियों को पच नहीं रहा है. औरों का तो पता नहीं, लेकिन मेरे आस-पास अधिकांश ऑफबीट टाइप के इंटेलेक्चुअल चुनावों से पहले, चुनावों के दौरान और चुनाव परिणाम आ जाने तक मोदी की बुराई ही करते दिखे. चुनावों के दौरान मीडिया में मोदी लहर की बात तो चल ही रही थी, लेकिन इन महानुभावों के श्रीमुख से मोदी की बुराई और उसके पक्ष में उनकी थेथरोलॉजी से मोदी की जीत के प्रति मैं भी सशंकित था.
अब जबकि नरेंद्र मोदी भारी बहुमत से जीत चुके हैं तो ये लोग उनकी जीत का श्रेय उन्हें नहीं बल्कि उनकी हजार करोड़ी ब्रांडिंग को दे रहे हैं. वैसे सच भी है कि पैसा बोलता है. शायद तभी तो कांग्रेस के नेता भी कहने लगे हैं कि हम यह चुनाव इसलिए हारे क्योंकि हमारे पास पैसे कम पड़ गये. दरअसल दोष इनका भी नहीं है. आजकल लोग खुद को कुछ अलग साबित करने के लिए क्या कुछ नहीं करते! फिल्म घिसी-पिटी कहानी पर ही क्यों न बनी हो, उसका प्रोमोशन अलग तरह से किया जाता है.
उस फिल्म से जुड़ी टीम भी कहती फिरती है कि उनकी फिल्म जरा हटके है. इसी मानसिकता से पीड़ित ढेरों लोग हमारे समाज में भी हैं. जो अच्छा है, सबको पसंद है, उन्हें वह अच्छा नहीं लगता. औरों की पसंद सलमान-शाहरुख-आमिर खान होंगे तो इनकी पसंद अक्षय खन्ना होंगे. अब इन लोगों ने नरेंद्र मोदी की क्षमता को चुनौती देने के मकसद से एक नया शिगूफा यह कह कर छोड़ा है कि देखते हैं मोदी चुनावों के दौरान जनता से किये गये अपने वादों को कैसे और कब तक पूरा करते हैं. अरे भैया! मोदी तो अपना काम करेंगे ही, आप भी तो मातम मनाना छोड़ अपना काम मान और ईमान के साथ कीजिए, तभी तो अच्छे दिन आयेंगे न!
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