दावं पर चुनाव आयोग की साख

Published at :12 May 2014 5:27 AM (IST)
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दावं पर चुनाव आयोग की साख

।। धर्मेद्रपाल सिंह।। (वरिष्ठ पत्रकार) यह अभूतपूर्व है. एक दिन पहले जिस फैसले का मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत ने जम कर बचाव किया था, अगले दिन चुनाव आयुक्त एचएन ब्रह्म ने उसे दुर्भाग्यपूर्ण बता दिया. चुनाव आयोग वाराणसी के जिस रिटर्निग अफसर के साथ खड़ा था, मतदान से पहले उसके ऊपर एक पर्यवेक्षक बिठा […]

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।। धर्मेद्रपाल सिंह।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

यह अभूतपूर्व है. एक दिन पहले जिस फैसले का मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत ने जम कर बचाव किया था, अगले दिन चुनाव आयुक्त एचएन ब्रह्म ने उसे दुर्भाग्यपूर्ण बता दिया. चुनाव आयोग वाराणसी के जिस रिटर्निग अफसर के साथ खड़ा था, मतदान से पहले उसके ऊपर एक पर्यवेक्षक बिठा दिया गया. जो भाजपा सीवीसी जैसी संवैधानिक संस्था की आलोचना के लिए कांग्रेस को कोसती थी, उसने दूसरी संवैधानिक संस्था (चुनाव आयोग) के खिलाफ धरना-प्रदर्शन किया. उस पर पक्षपात का आरोप जड़ दिया. देश के दो बड़े दलों के कद्दावर नेताओं पर चुनाव कानून और आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप लगा. एक (मोदी) के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट दर्ज की गयी तथा दूसरे (राहुल) को कारण बताओ नोटिस जारी हुआ.

निश्चय ही आयोग के कुछ फैसलों से असहमत होना और उसकी आलोचना करना दलों का संविधानसम्मत अधिकार है, पर संवैधानिक संस्था की साख पर चोट पहुंचाने का खामियाजा अंतत: पूरी व्यवस्था को भुगतना पड़ता है. यूं भी चुनाव आयोग के फैसले पर एतराज जताने का एक मान्य तरीका है. जब चुनाव चल रहे हों तब आयोग के खिलाफ धरना या मोर्चा निकालने का समर्थन नहीं किया जा सकता. इस चुनाव में भाजपा ही नहीं, सपा और तृणमूल कांग्रेस ने भी आयोग की तीखी आलोचना की. आयोग के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देने के साथ उस पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया गया. मजे की बात है कि जब कोई दल आयोग की निंदा करता है, तब आयोग की बखिया उधेड़ने वाली कोई अन्य पार्टी उसके बचाव में खड़ी हो जाती है. इसका अर्थ यही हुआ कि हर दल के लिए अपना हित-अहित ही सर्वोपरि है. संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्ता और साख से उन्हें कुछ लेना-देना नहीं है.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराना बड़ी चुनौती है. कई दशक से चुनाव आयोग यह काम सफलतापूर्वक कर रहा है. उसके प्रयास से ही जाली मतदान, कमजोर समुदायों को वोटिंग से रोकने या हिंसा की घटनाओं में भारी कमी आयी है. आयोग के अभियान के कारण जन भागीदारी बढ़ी है, मतदान प्रतिशत में इजाफा हुआ है तथा जनता की राजनीतिक चेतना में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. चुनावी महायज्ञ के दौरान कुछ चूक स्वाभाविक है, किंतु इक्का-दुक्का चूक के कारण आयोग की नीयत पर शक करना सही नहीं है.

बात आगे बढ़ाने से पहले जन-प्रतिनिधित्व कानून और आदर्श आचार संहिता में भेद समझना जरूरी है. आदर्श आचार संहिता कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है, यह राजनीतिक दलों का सहमति पत्र है. चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों से इसके प्रावधानों के पालन और नैतिक आचरण की अपेक्षा की जाती है. 1960 में केरल विधानसभा चुनाव के दौरान सबसे पहले आदर्श आचार संहिता को लागू किया गया, लेकिन चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के कार्यकाल (नब्बे के दशक) में इसके नियम सुर्खियों में आये. आचार संहिता के उल्लंघन पर चुनाव आयोग किसी भी प्रत्याशी या पार्टी को कारण बताओ नोटिस जारी कर सकता है, प्रत्याशी द्वारा सभा या बैठक आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा सकता है, उसकी भर्त्सना कर सकता है, अधिकारियों का तबादला कर सकता है अथवा चुनाव रद्द कर सकता है. दूसरी ओर जन-प्रतिनिधित्व कानून तोड़ने पर सीधे रिपोर्ट दर्ज करने का प्रावधान है. हाल ही में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हुई है. मोदी पर मतदान केंद्र के निकट पार्टी का चुनाव चिह्न कमल दिखा कर प्रचार करने का आरोप लगा था. इसी कारण केस दर्ज हुआ.

आचार संहिता के कुछ प्रावधान ऐसे हैं, जिन पर अक्षरश: अमल व्यावहारिक नहीं है. मसलन, नियम कहता है कि चुनाव प्रचार के दौरान कोई दल या प्रत्याशी विरोधी की नीतियों और कार्यक्रमों की आलोचना तो कर सकता है, लेकिन किसी नेता के निजी जीवन या कमजोरियों पर कीचड़ नहीं उछाल सकता. मौजूदा चुनाव में इस नियम की अधिकतर दलों और नेताओं ने धज्जियां उड़ायीं. मोदी और गांधी-वाड्रा परिवार पर व्यक्तिगत आरोप थोक में लगे. इन पर अंकुश लगाने में आयोग नाकाम रहा. इसी प्रकार वैमनस्य फैलाने के प्रयास के खिलाफ आचार संहिता में स्पष्ट प्रावधान है. जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा-123 ए में भी ऐसे प्रयास के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का उल्लेख है. इसके बावजूद शायद ही किसी प्रत्याशी या नेता के विरुद्ध आयोग ने कोई कड़ा कदम उठाया है.

मोटे तौर पर आयोग की निष्पक्षता संदेह से परे है, पर उसकी साख और मजबूत करने के लिए वहां होनेवाली नियुक्तियों में पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत है. राजनीतिक दलों को मर्यादित व नैतिक आचरण से बांधे रखने के लिए आयोग की कार्यप्रणाली संदेह से परे होना जरूरी है. आशा है चुनाव के बाद सभी पार्टियां इस विषय पर विचार-मंथन करेंगी.

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