घरेलू दवा कंपनियों पर खतरा

Published at :09 May 2014 4:27 AM (IST)
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घरेलू दवा कंपनियों पर खतरा

।। सुषमा वर्मा।। (वरिष्ठ पत्रकार) बात महत्वपूर्ण है, इसलिए आम चुनाव के शोर के बीच इस पर चर्चा जरूरी है. भारत के दवा उद्योग को चोट पहुंचाने के लिए आस्त्र, जेनिका, नोवार्टिस जैसी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने जेनेरिक दवा बनानेवाली घरेलू कंपनियों- ग्लेनमार्क, कैडिला, बायोकॉन आदि- के खिलाफ अदालतों से स्थगनादेश लेकर उनके उत्पादन पर […]

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।। सुषमा वर्मा।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

बात महत्वपूर्ण है, इसलिए आम चुनाव के शोर के बीच इस पर चर्चा जरूरी है. भारत के दवा उद्योग को चोट पहुंचाने के लिए आस्त्र, जेनिका, नोवार्टिस जैसी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने जेनेरिक दवा बनानेवाली घरेलू कंपनियों- ग्लेनमार्क, कैडिला, बायोकॉन आदि- के खिलाफ अदालतों से स्थगनादेश लेकर उनके उत्पादन पर रोक लगा दी है. उनके इस नये पैंतरे से देश के मरीजों को सस्ती दवा मिलनी बंद हो जायेंगी. भारतीय दवा उद्योग का गला घोंटने के लिए विदेशी कंपनियों ने आरटीआइ के जरिये घरेलू कंपनियों के उत्पाद के बारे में पहले जानकारी जुटायी और फिर नामी कानूनी फर्मो के जरिये मुकदमा दायर कर दिया. भारतीय कंपनियों पर पेटेंट कानून के उलंघन का आरोप लगाया गया और अदालतों ने दूसरे पक्ष की बात सुने बिना स्थगनादेश दे दिया. अब भारतीय कंपनियों के लिए स्थगनादेश समाप्त करना आसान नहीं है. खबर है कि महंगी कानूनी लड़ाई से परेशान होकर कई कंपनियों ने सस्ती दवा बनाने का इरादा छोड़ दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अप्रैल में एक ऐतिहासिक फैसला सुना कर महंगी दवा बनानेवाली विदेशी कंपनियों को गहरा झटका दिया था. अदालत ने उन्हें पेटेंट की आड़ में महंगी दवा बेचने का एकाधिकार देने से इनकार करते हुए कहा था कि यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को संरक्षण दिया गया, तो कैंसर, एचआइवी/ एड्स, हेपेटाइटिस बी व सी आदि की दवा गरीब ही नहीं, उच्च मध्यवर्ग की पहुंच से भी बाहर हो जायेंगी. कैंसर की ‘ग्लीवेक’ नामक जिस दवा को लेकर यह मुकदमा शुरू हुआ था, उसे बनानेवाली विदेशी कंपनी ने शुरू में एक खुराक की कीमत 1.1 लाख रुपये रखी थी. मुकदमा हारने के बाद विदेशी कंपनियों ने भारत के जेनरिक दवा उद्योग को चोट पहुंचाने के लिए नयी रणनीति बनायी है.

जेनेरिक दवा उत्पादन में भारत आज दुनिया के शीर्ष देशों में शुमार है. 1980 में यह उद्योग 1,500 करोड़ रुपये का था, जबकि 2012 में बढ़ कर 1,19,000 करोड़ रुपये का हो गया. देश के गरीब व मध्य वर्ग के स्वास्थ्य के लिए सस्ती दवाओं का उत्पादन जरूरी है. सवा अरब की आबादी वाला देश महंगी दवा बनानेवाली विदेशी कंपनियों को ललचाता है. वहीं हमारी लचर सरकारी नीतियों के कारण उनके हौसले बुलंद हैं. उन्हें पता है कि सस्ती दवा बनानेवाली भारत की घरेलू कंपनियों को समाप्त किये बिना उनकी योजना सफल नहीं हो सकती.

पेटेंट कानून की पैरोकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दावा है कि एक नयी दवा इजाद करने में बरसों की मेहनत लगती है और करोड़ों डॉलर का खर्च आता है. इसलिए नयी दवा का मूल्य ज्यादा होता है. सच यह है कि बाजार में नयी दवा कंपनियां महज एक बरस में अकेले अमेरिका में बिक्री से सारा खर्च वसूल लेती हैं. अमेरिका में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ केयर मैनेजमेंट ने 1989-2000 के बीच बाजार में आयी 1,035 नयी दवाओं का अध्ययन किया, तो पाया कि इन दवाओं में महज 15 फीसदी नयी खोज की श्रेणी में रखी जाने योग्य थीं. थोड़ी अदल-बदल कर 65 फीसदी दवा तो नये नाम से बाजार में उतार दी गयी थीं.

पिछले साल जारी संसदीय समिति की रिपोर्ट ने तो दवा क्षेत्र में सरकार की एफडीआइ नीति की पोल खोल कर रख दी थी. रिपोर्ट से लगता है कि घरेलू दवा उद्योग पर एकाधिकार जमा कर अपनी महंगी दवा बेचने तथा देश के दवा निर्यात को चौपट करने के लिए बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां गहरा षड्यंत्र रच रही हैं. उस रिपोर्ट से पेटेंट और जेनेरिक दवाओं के भारी मूल्यांतर तथा जेनेरिक दवा उत्पादन में भारत के अग्रणी स्थान को छीनने का प्रयास नजर आता है. जेनेरिक दवा के मुकाबले बड़ी कंपनी की पेटेंट दवा का मूल्य 40 से 4000 फीसदी ज्यादा होता है.

भारत सरकार ने बारहवीं पंचवर्षीय योजना में सबको स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने का लक्ष्य रखा था. योजना आयोग ने अब इस लक्ष्य से किनारा कर लिया है. आज नि:शुल्क दवा योजना 68 फीसदी आबादी की पहुंच से बाहर है. आम जनता को 70 प्रतिशत दवा खर्च खुद उठाना पड़ता है. महंगी दवाओं के कारण भारत में हर साल 3.8 करोड़ लोग कंगाली के गर्त में पहुंच जाते हैं. फिलहाल देश में दवा मांग की 95 फीसदी आपूर्ति घरेलू उद्योग कर रहे हैं. यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इस षड्यंत्र पर अंकुश नहीं लगा, तो स्थिति 70 के दशक से पहले जैसी हो जायेगी. तब हमें अपनी 80 फीसदी दवा आयात करनी पड़ती थी.

भारत में बिकनेवाली कुल दवाओं में केवल दस फीसदी ही पेटेंट हैं. ये बहुत महंगी हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियां पेटेंट दवाओं का दायरा और बाजार बढ़ाना चाहती हैं. इसलिए सरकार को इस ओर तुरंत ध्यान देकर जरूरी कदम उठाने चाहिए. एकतरफा स्थगनादेश देने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. घरेलू दवा कंपनियों को यह लड़ाई मिल कर लड़नी चाहिए, तभी वे कामयाब हो सकती हैं.

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