लोकपाल की आस अधूरी ही रह गयी

Published at :07 May 2014 4:14 AM (IST)
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लोकपाल की आस अधूरी ही रह गयी

भोजपुरी कहावत है- ‘हड़बड़ी के बियाह, कनपटी में सेनूर’. भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए लोकपाल के गठन के मामले में शुरुआत से कुछ ऐसा ही दिख रहा है. लोकपाल के लिए आंदोलन जेपी के जमाने से ही किसी न किसी रूप में जारी है, पर सरकार की तरफ से कभी कोई ऐसी पहल नहीं हुई […]

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भोजपुरी कहावत है- ‘हड़बड़ी के बियाह, कनपटी में सेनूर’. भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए लोकपाल के गठन के मामले में शुरुआत से कुछ ऐसा ही दिख रहा है. लोकपाल के लिए आंदोलन जेपी के जमाने से ही किसी न किसी रूप में जारी है, पर सरकार की तरफ से कभी कोई ऐसी पहल नहीं हुई कि लगे उसका मन भी भ्रष्टाचार मिटाने की मांग के साथ है.

अन्ना आंदोलन के बाद लोकपाल की मांग ने नयी शक्ल अख्तियार की, तो संसद ने पहले उसे समवेत स्वर में नकारा, लेकिन जब लगा कि इससे शासन के प्रति लोगों के विश्वास में बहुमुख हानि हो रही है, तो लोकपाल के गठन की कोशिश कुछ इस तरह से की गयी कि जनांदोलन का सांप मर जाये और लाठी उन्हीं हाथों में रहे, जहां रहती आयी है.

लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम को इस तरह रच कर पारित किया गया कि लोकपाल की नियुक्ति पर सत्तापक्ष का अंकुश बना रहे. इससे देश का पहला लोकपाल चुनने के प्रयास सफल नहीं हो सके. चयन समिति से फाली नरीमन जैसे प्रख्यात अधिवक्ता और न्यायमूर्ति केटी थॉमस अलग हो गये. उन्होंने सवाल उठाया कि जिस समिति को लोकपाल चयन की स्वतंत्रता न हो, उसके गठन का औचित्य ही क्या है?

लोकपाल बिल के पास होने के चार महीने बाद भी अगर देश को पहला लोकपाल नहीं मिल पाया है, तो इसीलिए कि सरकार ने चयन-प्रक्रिया को अधिनियम की भावना के विपरीत बनाया. यह प्रक्रिया कुछ ऐसी बनी, मानो साक्षात्कार के जरिये किसी नौकरी के अभ्यर्थियों को चुनने की एक व्यवस्था हो. एक एनजीओ की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यह गलती दुरुस्त करने के लिए कहा, ताकि लोकपाल की चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो और चयन समिति के अध्यक्ष व सदस्य के रूप में सार्वजनिक जीवन के विविध क्षेत्रों के लोगों को मौका मिल सके.

अब सरकार कानून की भावना के अनुरूप चयन प्रक्रिया में संशोधन के लिए सहमत है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में भ्रष्टाचार-निरोधी संस्था के निर्माण में आ रही एक बड़ी रुकावट दूर होगी, पर इस प्रकरण से यह भी साबित हुआ कि यूपीए-2 सरकार अपने आखिरी दिनों में भी गलतियों से सबक नहीं ले सकी और लोकपाल का चयन अब अगली सरकार के वक्त में ही हो पायेगा.

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