न्यूनतम सरकार अधिकतम बाजार

Published at :05 May 2014 4:21 AM (IST)
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।। जावेद इस्लाम।। (प्रभात खबर, रांची) आदमी हर दुख और परेशानी यह सोच कर झेल जाता है कि एक न एक दिन तो इनका अंत होगा और अच्छे दिन आयेंगे. जनता नामक जीव-जंतुओं को इस सिद्धांत पर कुछ ज्यादा ही विश्वास होता है और वे हर छल-प्रपंच बड़े इत्मीनान से पचा लेते हैं. अच्छे दिन […]

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।। जावेद इस्लाम।।

(प्रभात खबर, रांची)

आदमी हर दुख और परेशानी यह सोच कर झेल जाता है कि एक न एक दिन तो इनका अंत होगा और अच्छे दिन आयेंगे. जनता नामक जीव-जंतुओं को इस सिद्धांत पर कुछ ज्यादा ही विश्वास होता है और वे हर छल-प्रपंच बड़े इत्मीनान से पचा लेते हैं. अच्छे दिन के लिए लोग किस-किस पर विश्वास नहीं कर लेते और क्या-क्या पापड़ नहीं बेलते! नेता तो फिर भी नेता हैं, आम आदमी ज्योतिषियों-नजूमियों तक के पांव धोकर पी लेता है.

अच्छे दिनों की इस नैसर्गिक चाहत का प्याला इन दिनों छलक रहा है. उम्मीद का पैमाना भी ऊंचा होता जा रहा है. जैसे दिलोदिमाग-घुमाऊ विज्ञापनों की माया तरह-तरह की उपभोक्ता वस्तुओं के प्रति मन में तीव्र लालसा जगा देती है, वैसे ही अच्छे दिनों की रोकड़ा-फेंक मुनादी दिलो-दिमाग में लुंगी डांस कर रही है. ऐसा लग रहा है कि अच्छे दिन बस अब पहुंचे कि तब पहुंचे.

हर कोई 60 साल से चल रहे बुरे दिनों की उल्टी गिनती में जुटा है. इसी 16 मई से अच्छे दिनों की जलवानुमाई होनी है. तो सबसे पहले मुंह छिपाती फिरेगी महंगाई. यही डायन है जो अच्छे दिन का रास्ता बरसों से रोके हुए है. इसके बाद नंबर भ्रष्टाचार का. उसे पाकिस्तान की नापाक जमीन पर फेंक दिया जायेगा. ज्यादा पांव पड़ेगा तो उसे धार्मिक -शुद्धीकरण के बाद जगह दी जायेगी. इसके लिए रीति-विधि बाबा रामदेव बाद में तय करेंगे. बाबा अभी टैक्स-फ्री इंडिया बना कर देश में मौजूद अरबों -खरबों रुपये का काला धन सफेद करने के लिए जड़ी-बूटी खोज रहे हैं.

अभी उनको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं. वैसे भी शहर-शहर में मुकदमा ठोंक कर और पुतला जला कर दलितों ने उन्हें पहले ही काफी डिस्टर्ब कर रखा है. महंगाई और भ्रष्टाचार दूर हुए, तो समङिाए आ गया गुड गवर्नेन्स. फिर सरकार की ज्यादा जरूरत नहीं रह जायेगी. ‘न्यूनतम सरकार और अधिकतम बाजार’ का सिद्धांत अपना काम करने लगेगा. सरकार की थोड़ी बहुत जरूरत पड़ेगी धारा 370 हटाने, समान नागरिक संहिता लागू करने और मंदिर वहीं बनाने के लिए. इन मामलों में मजबूत नेता और मजबूत सरकार का जलवा दिखेगा.

जो राह में रोड़ा बनेंगे, उन्हें ठीक करने के लिए पुलिस-फौज की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ेगी. अरे भाई, बरसों से कसरत कर रही, लाठी भांज रही राष्ट्रवादी सेनाएं और संगठन किस दिन काम आयेंगे. बल्कि, इन्होंने अभी से अपना काम शुरू कर दिया है. बनारस में देखिए न, हर दिन दो-चार केजरीवाल समर्थकों को ठोंक रहे हैं. ये केजरीवाल जैसा पिद्दी भारत के भावी राष्ट्र-पुरुष को चुनाव में हराना चाह रहा है, उसकी ये मजाल! अच्छे दिन में सरकार की आलोचना करनेवाले बुद्धिजीवियों से भी बड़े मौलिक ढंग से निबटा जायेगा. उन्हें मारने-पीटने की भी जरूरत नहीं होगी. एकाध थप्पड़ और चेहरे पर बूट पॉलिश मल देने भर से ही वे काबू में आ जायेंगे. सचमुच अच्छे दिन आने वाले हैं.

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