ईश्वर को तो चुनाव से बाहर रहने दें!

Published at :05 May 2014 4:14 AM (IST)
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ईश्वर को तो चुनाव से बाहर रहने दें!

।। जस्टिस राजिंदर सच्चर।। (पूर्व मुख्य न्यायाधीश दिल्ली हाइकोर्ट) भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पूरे देश में घूम-घूम कर विकास के ‘गुजरात मॉडल’ का डंका बजाते हुए कह रहे हैं कि इसे पूरे देश में लागू किया जायेगा, ताकि पूरी दुनिया हमारी ओर ललक भरी नजरों से देखे. हालांकि यह अलग बात […]

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।। जस्टिस राजिंदर सच्चर।।

(पूर्व मुख्य न्यायाधीश दिल्ली हाइकोर्ट)

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पूरे देश में घूम-घूम कर विकास के ‘गुजरात मॉडल’ का डंका बजाते हुए कह रहे हैं कि इसे पूरे देश में लागू किया जायेगा, ताकि पूरी दुनिया हमारी ओर ललक भरी नजरों से देखे. हालांकि यह अलग बात है कि अनेक विश्वसनीय आलोचकों ने उनके दावों पर सवाल उठाये हैं. 1975 में आपातकाल के दौरान जय प्रकाश नारायण द्वारा स्थापित मानवाधिकार संगठन ‘पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज’ ने गुजरात के विकास पर हाल ही में एक किताब छापी है, जिसमें बताया गया है कि विकास के दावे सरासर गलत हैं. मोदी के बड़बोले दावे और कांग्रेस द्वारा भ्रष्टाचार के मामलों एवं यूपीए सरकार की अक्षमता को छुपाने की अशोभनीय कोशिश एक सामान्य चुनावी रणनीति है. लेकिन जब नरेंद्र मोदी चुनाव में अपने समर्थन के लिए ईश्वर का नाम लेते हुए बयान देते हैं कि ‘ईश्वर कुछ मुश्किल कार्यो के लिए कुछ विशेष लोगों को चुनता है और उन्हें प्रतीत होता है कि उन्हें ईश्वर ने देश को बचाने के लिए चुना है’, तो यह हिंदू धर्म की हर शिक्षा और परंपरा का उल्लंघन है. हालांकि, मुङो हिंदू धर्मशास्त्रों की बहुत कम जानकारी है, फिर भी मुङो इतना ठीक से पता है कि हिंदू धर्म में ईश्वर ने कभी किसी मरणशील प्राणी को देश की रक्षा या राष्ट्र का नेतृत्व करने की जिम्मेवारी नहीं सौंपी है. किसी हिंदू द्वारा लौकिक मामलों के लिए ईश्वर द्वारा चयनित होने का दावा करना असल में एक पाप है.

हिंदुओं के पवित्रतम ग्रंथ, चार वेदों के बारे में कहा जाता है कि ये ईश्वरीय रचना हैं, ब्रrा ऋषियों के माध्यम से प्राप्त हुए थे, जिनके नाम तक हमें ज्ञात नहीं हैं. हिंदू लोग त्रिदेवों- ब्रrा, विष्णु और महेश (शिव) में विश्वास करते हैं. उनकी मान्यता है कि जब भी धरती पर अन्याय और अराजकता बढ़ती है, विष्णु स्वयं मनुष्य रूप में अवतार लेकर विश्व की रक्षा करते हैं. भगवान राम और भगवान कृष्ण की कथाएं अवतार की कथाएं हैं, जहां ईश्वर ने मनुष्य रूप धारण किया और अपना कार्य पूरा किया, लेकिन ईश्वर ने सीधे कभी किसी मरणशील प्राणी (मुङो उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी समर्थक इस बात का खंडन नहीं करेंगे कि धरती के अन्य लोगों की तरह नरेंद्र मोदी भी एक मरणशील प्राणी हैं) को राष्ट्र को बचाने की जिम्मेवारी नहीं सौंपी है.

इसी तरह का संदेश अन्य धर्मो में भी है. ईसाइयों के लिए ईसा मसीह ईश्वर के पुत्र थे. कोई अन्य ईसाई ईश्वर से ऐसे सीधे संबंध का दावा नहीं कर सकता है. मुसलमानों के पवित्र कुर्आन में एक ईश्वर के अलावा किसी और में ईश्वरीय गुण होने के दावों की मनाही है. पवित्र कुर्आन में पूर्ववर्ती पैगम्बरों के विवरण हैं. पैगम्बर मुहम्मद ने कभी यह दावा नहीं किया कि ईश्वर ने उन पर सीधे कुर्आन उतारा. ईश्वर के प्रति उनकी भक्ति इतनी पूर्ण थी कि उन्होंने यह स्पष्ट घोषणा की थी कि ईश्वर ने अपने देवदूत जिब्रइल के माध्यम से उन्हें कुर्आन का संदेश दिया था. इस तरह नरेंद्र मोदी का यह दावा न सिर्फ हिंदू धर्म, बल्कि सारे धर्मो की मान्यताओं के अनुसार बहुत बड़ा पाप है.

नरेंद्र मोदी ने एक और घोषणा वाराणसी में अपने नामांकन के समय की, कि वे अपने आप से नहीं, बल्कि मां गंगा के आदेश से यहां आये हैं. यह सर्वविदित है कि बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए गंगा मात्र नदी भर न होकर, एक देवी हैं. मैं इस प्रश्न पर नहीं जा रहा हूं कि मोदी के ये बयान धर्म के राजनीतिक उपयोग के दायरे में आते हैं और इसके लिए उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए. मैं यह मानता हूं कि नरेंद्र मोदी हिंदू धर्म के बारे में मुझ अज्ञानी से अधिक जानते हैं. परंतु उन्हें यह याद करना चाहिए कि महाभारत के महान चरित्र भीष्म पितामह जब मां गंगा (जो कथा के मुताबिक उनकी अपनी मां थीं) के पास जाते हैं, तो गंगा नाराजगी से कहती हैं कि भीष्म को बार-बार उनके पास आने के बजाय अपनी बुद्धि के अनुरूप काम करना चाहिए. भीष्म ने उनकी बात को पूरे आदर से स्वीकार किया था. जब गंगा को उनके अपने पुत्र भीष्म की सांसारिक समस्याओं में पड़ने की इच्छा नहीं है, तो उन्हें नरेंद्र मोदी को आम चुनाव जैसे साधारण सांसारिक मामले में बुला कर दखल देने की क्या जरूरत आन पड़ी! श्रीमान मोदी, आप मां गंगा के दैवत्व और उनकी पूजा का अपमान क्यों कर रहे हैं, जिनके लिए करोड़ों हिंदू असीम श्रद्धा और आदर रखते हैं?

सोनिया गांधी ने भी इस मामले में पीछे न रहते हुए ईश्वर से गुहार लगायी है कि वे देश को ‘गुजरात मॉडल’ से बचाएं. अब ईश्वर किसकी सुने! वह तो सभी धर्मो का एक ईश्वर है. क्या राजनेताओं से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वे ईश्वर को चुनाव के बीच में न लाएं? हम जैसे साधारण मनुष्यों के पास तो एक ईश्वर ही है, जो हमारी देखभाल और रक्षा कर सकता है. ऐसे में कांग्रेस और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच चल रहे निम्न-स्तर के आरोप-प्रत्यारोप निंदनीय लगते हैं और इनसे हमारी राजनीति व राजनीतिक दलों के गिरते स्तर का पता चलता है.

ध्यान रहे कि भारतीय राजनीति में ऐसी गिरावट हमेशा नहीं रही है. मैं यहां 1962 के आम चुनाव में चिर-प्रतिद्वंद्वियों- पंडित नेहरू और डॉ राममनोहर लोहिया के गरिमामय व्यवहार का उदाहरण देना चाहूंगा. डॉ लोहिया ने नेहरू जी के खिलाफ लड़ने की मंशा व्यक्त करते हुए उन्हें पत्र लिखा- ‘इन चुनावों में आपकी जीत सुनिश्चित है, लेकिन अगर इस निश्चितता को अनिश्चितता में और अंतत: आपकी हार में बदल दिया जाये, तो मुङो बहुत खुशी होगी तथा यह देश के लिए भी लाभप्रद होगा. तब आपको भी बेहतरी का अवसर मिलेगा, आप और अधिक अच्छे व्यक्ति बन सकेंगे. मैं आपकी लंबी आयु के लिए प्रार्थना करता हूं, ताकि मुङो आपको सुधारने का मौका मिल सके.’ पंडित नेहरू ने जवाब में लिखा- ‘मुङो खुशी है कि आपके जैसा अच्छा आदमी चुनाव में मेरा विरोध कर रहा है. मैं समझता हूं कि चुनावी बहस राजनीतिक कार्यक्रमों पर केंद्रित होंगे. सचेत रहें और व्यक्तिगत मुद्दे बहस से अलग रखें.’

बाद में जब 1963 में डॉ राम मनोहर लोहिया लोकसभा के लिए चुने गये और पहले दिन लोकसभा के सत्र में शामिल होने के लिए गये, तो पंडित जवाहरलाल नेहरू खुद उनके स्वागत के लिए वहां मौजूद थे. इस प्रकरण से हमें यह सीख मिलती है कि राजनेताओं का अच्छा और गरिमामय व्यवहार राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का शिकार नहीं बनना चाहिए. क्या यह अपेक्षा करना बहुत अधिक है कि कम-से-कम बचे हुए चुनाव के दौरान देश में राजनीतिक आधार पर बहसें हों, न कि एक-दूसरे पर व्यक्तिगत लांछन लगाया जाये और ईश्वर को बीच में लाया जाये!

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