शोर के बीच विकास का भ्रमजाल

Published at :05 May 2014 4:13 AM (IST)
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शोर के बीच विकास का भ्रमजाल

।। चंदन श्रीवास्तव।। (एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस) ठीक यही है कि शब्द जबान तक रहें, सिर पर चढ़ कर न बोलने लगें. शब्द जब तक जबान पर चढ़े रहते हैं, उनके भीतर बहस में उतरने की ताकत और जीवन को दिशा देने की हैसियत होती है. शब्द जब सिर पर चढ़ कर बोलने लगें, तो सिर्फ […]

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।। चंदन श्रीवास्तव।।

(एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस)

ठीक यही है कि शब्द जबान तक रहें, सिर पर चढ़ कर न बोलने लगें. शब्द जब तक जबान पर चढ़े रहते हैं, उनके भीतर बहस में उतरने की ताकत और जीवन को दिशा देने की हैसियत होती है. शब्द जब सिर पर चढ़ कर बोलने लगें, तो सिर्फ शोर पैदा होता है. निपट शोर, एकदम निर्थक! फिर भी शोर कभी थमते नहीं, उनका जोर चलते रहता है. इसलिए, कभी शोर के बारे में यह पूछ कर देखिए कि उससे क्या सिद्ध होता है? शोर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें वक्ता और श्रोता, सुनने और गुनने के बीच का जरूरी फर्क खत्म हो जाता है. सब बोलते हैं, सो कोई किसी की नहीं सुनता. दूसरी बड़ी विशेषता है कि शोर आदमी को भीड़ में बदलने के लिए उकसाती है. जितनी बड़ी भीड़, उतना ही ऊंचा शोर! भीड़ से आप बहस नहीं कर सकते. बस यही कि आप या तो भीड़ से अलग रहें और छंटुआ कहलाएं या भीड़ का हिस्सा बन जायें. शोर की तीसरी खासियत भीड़ जुटाने के उसके इसी पहलू से जुड़ा है. भीड़ का चेहरा नहीं होता, इसलिए वह बेखटके मनमानी कर सकती है. शोर की महिमा का उपयोग हमेशा मनमानी करने और जरूरी शब्दों के अर्थ को ढंकने के लिए होता है. ऐसा लगता है कि लोकसभा चुनाव के दौरान फिलहाल यही हो रहा है.

चुनावी कुरुक्षेत्र का जब से शंखनाद हुआ है, चहुंओर शोर ही शोर है. अचरज, कि सब एक ही शब्द का उच्चार कर रहे हैं-‘विकास’. कोई कह रहा है, विकास के मोरचे पर अब तक जो नहीं हुआ वह हम कर दिखायेंगे. अद्भुत और अतुलित विकास का उसका यह दावा अपनी थ्रीडी प्रस्तुतियों में किसी शेर की दहाड़ से कम नहीं लगता. कुछ और हैं जो दहाड़ के जवाब में जब-तब चिंघाड़ रहे हैं कि ‘विकास कोई और क्या करेगा, विकास तो वह है जो अब तक हमने किया है.’ विकास का एक मॉडल विकास के दूसरे मॉडल से कुछ इस तरह टकरा रहा है, मानो उसे चूर-चूर करके ही दम लेगा. विकास के इस दिन-राती शोर में खुद ‘विकास’ शब्द का अर्थ गहरे गर्त में धंसा जा रहा है.

मीडियामुखी 2014 के चुनावी भाषणों में विकास एक जादुई पिटारा बन गया है. ऐसा पिटारा जो खुलेगा तो अंधे को आंख, बहरे को कान और लंगड़े को पैर मिलेंगे, जो रंक हैं वे अपने सिर पर राजक्षत्र धारण करके चलेंगे. कुछ ऐसी ही कल्पना अपने भगवान को सर्वशक्तिशाली मान कर भक्त किया करते हैं. देश की विकासमुंही राजनीति मतदाताओं के मन में विकास की सर्वशक्तिमानता के बारे में वैसी ही कल्पनाएं जगा रही है. यह राजनीति समझा रही है कि एक एशियाइ महाशक्ति के रूप में अमेरिका से मुकाबला करने की ताकत बटोरने के लिए विकास जरूरी है, तो चीन और पाकिस्तान को औकात बताने के लिए भी. विकास शब्द का अर्थ-विस्तार कुछ ऐसा हुआ है कि उसे महंगाई को थामने और भ्रष्टाचार मिटाने के उपचार के रूप में पेश किया जा रहा है, तो विदेशी निवेश न्योतने, उत्पादन बढ़ाने और रोजगार गढ़ने के समाधान के रूप में भी. रोटी, कपड़ा, मकान, सेहत, शिक्षा, सुरक्षा, बिजली, पानी, सड़क के अपने परंपरागत अर्थ के दायरे से निकल कर विकास शब्द के सहारे फिलहाल महाशक्तिशाली भारत का एक रूपक रचा जा रहा है. इस रूपक से राज्य और नागरिक के रिश्ते को धुंधला किया जा रहा है.

बीते दो दशकों में विकास शब्द ने नागरिक-संगठनों की कोशिश और न्यायिक सक्रियता के बीच एक खास अर्थ ग्रहण किया है. वह राज्य की तरफ से नागरिक को मिलनेवाली भीख नहीं है कि आशीर्वाद लेने का मन हुआ, तो दुखियारी जनता की झोली में गिरा दिया. विकास नागरिक को असहाय मान कर दिया जानेवाला दान भी नहीं है, जो दाता अपने मन से तय करे कि कब कितना और किसे देना या नहीं देना है. विकास शब्द ने भारतीय राज्य व नागरिक के संदर्भ में बीते दो दशकों में अधिकारिता का अर्थ ग्रहण किया है. अदालत ने विकास के बुनियादी पहलू को नागरिक के जीवन जीने के अधिकार का अनिवार्य प्रसंग करार दिया है. सूचना, शिक्षा और भोजन के अधिकार से जुड़ा संघर्ष सड़क से उठ कर सीधे अदालत तक पहुंचा और संसद इन बातों को नागरिक के अधिकार के रूप में स्वीकार करने को बाध्य हुई. अधिकार के अर्थ में विकास राज्य की तरफ से नागरिक के साथ किया जानेवाला जरूरी वायदा है. सामान्य स्थितियों में इस वायदे का स्थगन या निर्वाह में चूक अक्षम्य है.

चुनाव-प्रचार में विकास का यह अर्थ विलुप्त हो गया है. विकास राज्यसत्ता की शक्तिमानता का नहीं, बल्कि नागरिक के अधिकार-संपन्न होने की घोषणा है. परंतु विकासमुंही प्रचार में अधिकार-संपन्न नागरिक का सवाल गौण है. कोई नहीं पूछ या बता रहा है कि राजनीतिक दल जिसे विकास कह रहे, वह नागरिक की स्वतंत्रता बढ़ाने में कहां तक सहायक है और देश के ज्यादातर नागरिक क्या इतने अधिकार-संपन्न हैं कि प्रदत्त विकास को जीवन जीने के महत्वपूर्ण अवसर के रूप में भुना सकें!

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