सबका मॉडल एक ही है

Published at :04 May 2014 4:13 AM (IST)
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सबका मॉडल एक ही है

।। राजेंद्र तिवारी।। (कारपोरेट एडिटर, प्रभात खबर) आम चुनाव की प्रक्रिया अब अंत की ओर बढ़ रही है. 438 सीटों पर मतदान हो चुका है और बाकी 105 सीटों पर 7 व 12 मई को हो जायेगा. 16 मई को नतीजे आ जायेंगे. यानी अब सिर्फ 12 दिन बचे हैं नतीजे जानने के लिए. इस […]

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।। राजेंद्र तिवारी।।

(कारपोरेट एडिटर, प्रभात खबर)

आम चुनाव की प्रक्रिया अब अंत की ओर बढ़ रही है. 438 सीटों पर मतदान हो चुका है और बाकी 105 सीटों पर 7 व 12 मई को हो जायेगा. 16 मई को नतीजे आ जायेंगे. यानी अब सिर्फ 12 दिन बचे हैं नतीजे जानने के लिए. इस चुनाव के दौरान तमाम बातें उठीं. विकास के मॉडल बताये गये और सबने अपने मॉडल को देशहितैषी और विरोधियों के मॉडल को देश-विरोधी करार दिया. ईश्वर तक को इस चुनाव में काम पर लगा दिया गया. एक ने कहा कि देशहित में ईश्वर ने उनको भेजा है, तो दूसरे ने कहा कि ईश्वर देश को उनसे बचाये.

एक ने कहा कि जो हमें वोट न दे वह पाकिस्तान जाये तो दूसरे ने कहा कि जो उनको वोट दे वो समुंदर में डूब जाये.. आदि आदि. लिस्ट बहुत लंबी है. और अभी दो चरण का मतदान बाकी है, इसलिए इस लिस्ट के और लंबी होते जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. अपना दिमाग भी खदबदाता रहा. सबसे ज्यादा माथापच्ची इस बात को समझने को लेकर की कि गुजरात के विकास मॉडल और कांग्रेस के विकास मॉडल में क्या अंतर है? इस अंतर को समझने के लिये प्रो जगदीश भगवती की मदद ली तो प्रो अमर्त्य सेन की किताबें भी ऊपर-ऊपर से पढ़ीं. गुजरात को लेकर किये जा रहे दावों की सत्यता परखने के लिए वडोडरा और अहमदाबाद की यात्रओं को भी याद किया. मध्यप्रदेश से गुजरात जानेवाले हाईवे को भी रिकॉल किया और मध्यप्रदेश के कस्बे अलीराजपुर को भी. मित्रों से भी बात की- उन मित्रों से खास तौर पर जो गुजरात के विकास माडल पर लट्ट हैं और उनसे भी जो गुजरात के विकास मॉडल की 50 कमियां किसी भी समय गिनाने को तत्पर रहते हैं. मैं अब तक जो समझ पाया, अपने पाठकों के सामने रखना चाहता हूं.

गुजरात मॉडल का मतलब है बिजनेस फ्रेंडली शासन-प्रशासन, कमियों पर बात न करना, सिर्फ अच्छाइयां बढ़ा-चढ़ा कर सामने रखना, अच्छी सड़कें और बड़े-बड़े मॉल बनने देने में मदद करना. इन सड़कों पर चलने के पैसे लगते हैं और इन मॉल में घुसने के भी. पिछले दिनों मुझे सड़क मार्ग से रांची से लखनऊ वाया कानपुर जाना पड़ा. पता नहीं आपको ताज्जुब होगा कि नहीं लेकिन मुङो बहुत ताज्जुब हुआ कि टोल के रूप में 500 रु पये से ज्यादा का भुगतान हमें करना पड़ा. गुजरात के विकास मॉडल में भी यह शामिल है. गुजरात मॉडल के समर्थकों से बात करने पर वे अहमदाबाद, सूरत, वडोडरा आदि की सड़कों और चकाचौंध का बखान शुरू कर देते हैं. बताने लगते हैं कि अमुक सड़क पर आप बिना रुके 100 की स्पीड से इतने किमी तक जा सकते हैं. वह बताने लगते हैं कि वहां तो भ्रष्टाचार है ही नहीं. सब काम आराम से होता है. मुख्यमंत्री उद्यमियों से सीधे बात करता है और अफसरों को टाइम बाउंड काम करने का निर्देश देता है. जब बात करिये रोजगार, सरकारी स्कूलों, पेयजल, कुपोषित बच्चों की संख्या की, तो जवाब मिलता है कि दूसरे राज्यों को तो देखिए. ये सब आंकड़े गढ़े हुए हैं.

खैर, अब जरा दूसरे मॉडल की ओर जायें. हरियाणा बड़े राज्यों या कहें कि पूर्ण राज्यों में प्रति व्यक्ति आय के मामले में सबसे आगे है. आपको यहां हर कस्बे में सरकारी हाउसिंग स्कीमें दिखायी देंगी. शहर-कस्बे कुछ हद तक व्यवस्थित दिखायी देंगे. गांव-गांव तक सड़क है. हरियाणा परिवहन निगम की बसें लगभग हर बड़े गांव-कस्बों को जोड़ती हैं. फर्राटा हाईवे जहां आप 200 किमी का सफर दो घंटे में तय कर सकते हैं. खेती-किसानी करता है यह राज्य. विकास की बात को लेकर माथापच्ची के समय 2006 का एक वाकया भी याद आया. उन दिनों मैं हरियाणा में काम करता था. एक दिन खबर आयी कि एक गांव में विशेष तांत्रिक आयोजन होने वाला है जिसके तहत 48 घंटे तक न कोई गांव से बाहर आयेगा और न ही अंदर जायेगा. दरअसल, गांव में बैलों की असमय मौत हो रही थी, लिहाजा सब लोग बहुत परेशान थे और इसे रोकने के लिए ही यह आयोजन किया जा रहा था. मैंने अपने एक रिपोर्टर को आयोजन शुरू होने की पूर्वसंध्या पर ही गांव में भेज दिया लैपटाप और डाटाकार्ड के साथ. डाटाकार्ड बहुत ही स्लो था और कभी-कभी सिगनल भी नहीं पकड़ता था. रिपोर्टर वहां गया. रात को ही उसका फोन आया कि चिंता करने की कोई बात नहीं है, इस गांव में तीन घरों ऐसे हैं जिनमें ब्रांडबैंड कनेक्शन है. जी हां, पानीपत जिले के उस अंदरूनी गांव में आज से 8 साल पहले भी तीन ब्राडबैंड कनेक्शन थे.

गुजरात के विपरीत दूसरे विकास के मॉडल पर बात करें तो उसके समर्थक पहले गुजरात की कमियां गिनाते हैं कि लोकायुक्त नियुक्ति में कितना अड़ंगा लगा, अल्पसंख्यकों को डरा कर रखा गया है, सरकारी खजाने से उद्यमियों को मदद की जा रही है आदि-आदि. मनरेगा से कितनों को रोजगार मिल रहा है, राइट टू फूड दे दिया गया है, ट्रांसपेरेंसी के लिए राइट टू इनफार्मेशन लाया गया है आदि आदि.

दोनो तरफ से तर्क व तथ्य (यदि इन्हें तर्क और तथ्य माना जाये) जानने के बाद मैं तो अपनी पहले वाली समझ पर ही कायम रहने पर मजबूर हूं कि न कोई गुजरात मॉडल है और न कोई इससे अलग मॉडल. अर्थव्यवस्था और विकास का सिर्फ एक मॉडल हर जगह चल रहा है और वह है उदार अर्थव्यवस्था का मॉडल जिसे 1991 में पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में मनमोहन सिंह लाये थे. चाहे तीसरे मोर्चे की देवेगौड़ा व गुजराल सरकारें रही हों या एनडीए की वाजपेयी सरकार और यूपीए की मनमोहन सरकार, सब इसी मॉडल पर चली हैं. सबमें होड़ रही है कि कौन इस मॉडल को कितनी तेजी से लागू करता है. और, यह सिर्फ मैं नहीं कह रहा हूं, वे भी कह रहे हैं जो गुजरात मॉडल के सबसे बड़े पैरोकार हैं. जी हां, प्रो जगदीश भगवती साहब. दरअसल यह कॉलम लिखते समय मैं गूगल पर प्रो भगवती से संबंधित खबरें भी सर्च कर रहा था और मुङो पढ़ने को मिला उनका एक इंटरव्यू जो उन्होंने पिछले माह ही रायटर को दिया था. इसमें उन्होंने कहा है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किये गये कामों को आगे ले जाना चाहिए. इसका मतलब क्या हुआ? एक और बात गुजरात के भ्रष्टाचार मुक्त होने को लेकर. गुजरात में शराबबंदी है लेकिन आपको वहां हर ब्रांड की शराब मिल जायेगी, बस पैसे दोगुने-तिगुने देने पड़ेंगे. यह बात हर किसी को पता है. इसके बाद भी कोई कहे कि गुजरात भ्रष्टाचार मुक्त है तो यह उसका ईमान!

और अंत में

इस बार पढ़िए बर्तोल्त ब्रेख्त की एक प्रसिद्ध कविता का यह अंश-

ऊंची जगहों पर आसीन लोगों में

भोजन के बारे में बात करना अभद्र समझा जाता है.

सच तो यह है : वो पहले ही

खा चुके हैं.

जो नीचे पड़े हैं, उन्हें इस धरती को छोड़ना होगा

बिना स्वाद चखे

किसी अच्छे मांस का.

यह सोचने-समझने के लिए कि वो कहां से आए हैं

और कहां जा रहे हैं

सुंदर शामें उन्हें पाती हैं

बहुत थका हुआ.

उन्होंने अब तक नहीं देखा

पर्वतों को और विशाल समुद्र को

और उनका समय अभी से पूरा भी हो चला.

अगर नीचे पड़े लोग नहीं सोचेंगे

कि नीचा क्या है

तो वे कभी उठ नहीं पायेंगे.

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