अक्षय तृतीया और दान परंपरा

Published at :01 May 2014 4:49 AM (IST)
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अक्षय तृतीया और दान परंपरा

।। सीके जैन।। (पूर्व महासचिव, लोकसभा) सभी धार्मिक परंपराओं में महापुरुषों के जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण प्रसंग पर्व के रूप में मनाये जाते हैं. इन पर्वो का कालातीत महत्व है, जो हजारों साल से व्यक्ति को स्वयं के जीवन को उत्कर्षोन्मुख करने में प्रेरणा-स्रोत है और सामाजिक सौहद्र्र की भी वृद्धि करते हैं. वैशाख […]

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।। सीके जैन।।

(पूर्व महासचिव, लोकसभा)

सभी धार्मिक परंपराओं में महापुरुषों के जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण प्रसंग पर्व के रूप में मनाये जाते हैं. इन पर्वो का कालातीत महत्व है, जो हजारों साल से व्यक्ति को स्वयं के जीवन को उत्कर्षोन्मुख करने में प्रेरणा-स्रोत है और सामाजिक सौहद्र्र की भी वृद्धि करते हैं. वैशाख शुक्ल तृतीया जैन परंपरा में प्रथम र्तीथकर वृषभदेव के जीवन के संन्यास काल के एक अति महत्वपूर्ण प्रसंग से जुड़ी है. यह प्रति वर्ष वैशाख माह के द्वितीय पक्ष के तीसरे दिन ‘अक्षय तृतीया’ के रूप में मनाया जाता है. इसका प्रचलित शब्द ‘अखतीज’ भी है. इस पर्व के दोनों ही पहलू, सामाजिक व धार्मिक, अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उसी समय से दान परंपरा की शुरुआत हुई.

प्रसंग इस प्रकार है- वृषभदेव ने अपने राज्यकाल में पूर्व व्यवस्थाएं निष्प्रभावी होने से उत्पन्न स्थिति का सामना करने के लिए कर्मभूमि की नवीन व्यवस्था के लिए असि, भजी, कृषि, विया, वाणिज्य और शिल्प के छह कार्य करने को कहा. कृत युग की व्यवस्था को चलाने के लिए नियम बनाये. हर वर्ग के कार्य निश्चित किये, विवाह व्यवस्था मर्यादित की, न्याय-दंड तथा राजनीतिक व्यवस्था स्थापित की. दीर्घकाल राज करने के उपरांत ज्येष्ठ पुत्र को राज्य सौंप कर दीक्षा ग्रहण की. योग धारण किये जब छह महीने पूर्ण हुए, तब आहार लेने नगर में भ्रमण किया. उन्हें न केवल अपने लिए आहार लेना था, बल्कि निग्रंथ साधुओं की आहार-चर्या और उन्हें गृहस्थों द्वारा आहार देने की विधि भी प्रशस्त करनी थी.

कृषभदेव के मंतव्य को स्पष्ट करते हुए आचार्य जिनसेन महापुराण (विंश पर्व) में कहते हैं- मार्ग प्रबोधनरथ च मुक्तेश्च सुख सिद्धये।

कार्यास्थत्यर्थमाहारं दर्शयामस्ततोùधुना।।4।।

अर्थात् मोक्ष का मार्ग बतलाने के लिए और मोक्ष की सिद्धि के लिए शरीर की स्थिति-अर्थ आहार लेने की विधि बताते हैं.

न केवलमयं काय: कर्शनीयो मुमुक्षुभि।

नाप्युत्कररसै: पोष्यो मृष्टैरिष्टैश्च वल्मेने:।।5।।

अर्थात् मोक्षाभिलाषी मुनियों को यह शरीर न तो केवल कृश ही करना चाहिए और न ही रसीले, मधुर तथा मनचाहे भोजनों से इस शरीर को पुष्ट करना चाहिए.

वशे यथा स्युरक्षाणि नोत धावन्त्यनूत्वशम्।

तथा प्रयतितव्यं स्याद् वृत्ति माक्षित्थमध्यमाम्।।6।।

अर्थात् जिस प्रकार ये इंद्रियां अपने वश में रहें और कुमार्ग की ओर न दौड़ें, उस प्रकार मध्यम वृत्ति का आहार लेकर प्रय-करना चाहिए.

मौन वृषभदेव ग्राम-ग्राम, नगर-नगर, पर्वत और खेतों में विहार करते रहे, किंतु दिगम्बर मुनि की विधिवत् आहार ग्रहण करने की प्रक्रिया से अनभिज्ञ जन-सामान्य उन्हें आहार देने के सौभाग्य से वंचित रहा. लोग उन्हें तरह-तरह की भेंट देने का प्रय-करते, किंतु प्रशांत मौन मुनि वृषभदेव आगे बढ़ जाते. भोजन-काल समाप्त होने पर वे वापस वन चले जाते.

इस तरह छह महीने व्यतीत हो गये. योग धारण के एक वर्ष पूरा होने पर मुनि वृषभदेव हस्तिनापुर पहुंचे. वहां के राजा सोमप्रभ के अनुज राजा श्रेयांस को पूर्व रात्रि के स्वप्न में सुसंयोग एवं आहार-विधि का ज्ञान हुआ. अगले दिन प्रात:काल विगत दिनों की भांति मुनि वृषभदेव आहार के लिए नगर में निकले और ज्यों ही राजा श्रेयांस के महल के सामने पहुंचे, राजा ने श्रद्धा-भक्ति से आहार के लिए आमंत्रित किया. आमंत्रण को मौन स्वीकृति देते हुए उन्होंने महल में प्रवेश किया. श्रेयांस ने वृषभदेव को गन्ने के रस का आहार दिया. उसके बाद दान के आदि तीर्थ की प्रवृत्ति करनेवाले राजा श्रेयांस ने श्रद्धा, शक्ति, भक्ति, विज्ञान, अक्षुब्धता, क्षमा और त्याग- सात गुणों के साथ उत्तम पात्र दान दिया.

वह शुभ दिवस वैशाख शुक्ल तृतीया था, जो प्रतिवर्ष ‘अक्षय तृतीया’ महापर्व के रूप में मनाया जाता है. सहस्त्रों वर्ष पूर्व पनपी पुनीत सर्वोत्कृष्ट दान परंपरा कालांतर में उत्तरोत्तर पल्लवित हो रही है. आज आहार दान के अतिरिक्त विद्या दान, औषधि दान एवं आवास दान की सद्वृत्ति विभिन्न माध्यमों से लोकहित कार्यो द्वारा बढ़ रही है. विशाल धार्मिक स्थल, उन्नत संस्कृति और भव्य कला के साथ-साथ दान प्रवृत्ति के प्रेरणा-स्तंभ हैं. लोकोत्तर आध्यात्मिक उत्कर्ष की दृष्टि के अलावा अभाव-पीड़ित एवं वंचित त्रस्त प्राणियों की सहायता करना न्याय-पूर्ण तथा विषमता-मुक्त समाज के निर्माण की दिशा में दान परंपरा सामाजिक दायित्व का अर्थपूर्ण निर्वाह भी है. पीड़ा और ईष्र्या के फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाले अपराधों को रोकने में यह दान सद्वृत्ति सक्षम है. पर्व मनाने की सार्थकता तभी है, जब हम अपने सामथ्र्यानुसार किसी न किसी रूप में इस पावन परंपरा को अपनाएं. निश्चित ही लोभ-स्वार्थ भावना के विसजर्न और त्याग-संवेदनशीलता के अजर्न से अपने को भी सुख-आनंद मिलेगा और दूसरों को भी.

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