बेरोजगारी का कारण ग्लोबलाइजेशन

Published at :29 Apr 2014 4:35 AM (IST)
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बेरोजगारी का कारण ग्लोबलाइजेशन

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।। अर्थशास्त्री मशीनी उत्पादन को प्रोत्साहन देते हुए बेरोजगारों को ट्रेनिंग देने से बेरोजगारी का हल नहीं निकल सकता. जरूरत है कि चिह्न्ति क्षेत्रों में मशीनी उत्पादन पर भारी टैक्स लगा दिया जाये, जिससे श्रम सघन उत्पादन प्रतिस्पर्धा में खड़ा रह सके. वर्तमान लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी मुख्य मुद्दा है. सभी […]

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।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।

अर्थशास्त्री

मशीनी उत्पादन को प्रोत्साहन देते हुए बेरोजगारों को ट्रेनिंग देने से बेरोजगारी का हल नहीं निकल सकता. जरूरत है कि चिह्न्ति क्षेत्रों में मशीनी उत्पादन पर भारी टैक्स लगा दिया जाये, जिससे श्रम सघन उत्पादन प्रतिस्पर्धा में खड़ा रह सके.

वर्तमान लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी मुख्य मुद्दा है. सभी पार्टियां रोजगार पैदा करने का वायदा कर रही हैं. परंतु साथ-साथ ग्लोबलाइजेशन को भी अपनाना चाहती हैं. यह नहीं समझा जा रहा है कि ग्लोबलाइजेशन ही रोजगार का शत्रु है. लखनऊ स्थित वीवी गिरी संस्थान द्वारा किये गये सर्वे में पाया गया है कि 15 से 30 वर्ष की आयु के ज्यादातर युवक न तो काम कर रहे हैं, न पढ़ रहे हैं और न ही रोजगार ढूंढ़ रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार 2012-2013 के बीच विश्व में बेरोजगारी की संख्या में 20 लाख की वृद्घि हुई है. आनेवाले समय में इसमें और वृद्घि के अनुमान हैं. दूसरी तरफ शेयर बाजारों में उछाल आ रहा है.

समस्या से सरकारें अवगत हैं. कई देशों द्वारा रोजगार बढ़ाने की विशेष पॉलिसी को लागू किया जा रहा है. विश्व बैंक द्वारा जारी एक अध्ययन में ऐसी पॉलिसी का यूरोप एवं मध्य एशिया में अध्ययन किया गया है. इस अध्ययन के निष्कर्ष सर्वत्र लागू होते हैं. पहली पॉलिसी उपलब्ध रोजगारों की सूचना उपलब्ध कराने की है. अकसर श्रमिक रोजगार ढूंढ़ रहा होता है और उद्यमी को श्रमिक की जरूरत होती है, परंतु उसका परस्पर संबंध नहीं बन पाता है. अध्ययन में पाया गया कि रोजगार की सूचना उपलब्ध कराने के कार्यक्रम सफल हैं, परंतु इनमें ज्यादा लाभ नहीं होता है, चूंकि रोजगार सृजन का पुट इसमें नदारद है.

दूसरी पॉलिसी ट्रेनिंग की है. पाया गया कि ट्रेनिंग का सार्थक प्रभाव है. लेकिन यह भी समस्या का हल नहीं है. मान लीजिए उद्योग को 100 श्रमिकों की जरूरत है. इनमें वर्तमान में 90 पदों के लिए श्रमिक उपलब्ध हैं. इन्हें रोजगार मिल गया. शेष 10 बेरोजगार हैं. इन्हें ट्रेनिंग दी गयी. परिणाम होगा कि उद्यमी इनमें से पांच को रोजगार देगा, चूंकि इनकी क्षमता अच्छी है. साथ ही वह वर्तमान में कार्यरत 90 में से पांच श्रमिकों को बर्खास्त कर देगा.

ट्रेनिंग का यह कार्य बाजार सहज ही करता है, जैसे लोगों ने पाया कि कंप्यूटर ऑपरेटरों के रोजगार उपलब्ध हैं, तो कंप्यूटर सिखाने के तमाम संस्थान खुल गये हैं. सरकारी कार्यक्रम से इसमें मामूली सुधार हो सकता है. परंतु इन कार्यक्रमों के बावजूद यूरोप में बेरोजगारी बढ़ रही है, चूंकि पर्याप्त संख्या में रोजगार उपलब्ध हैं ही नहीं. ऐसे में ट्रेनिंग के कार्यक्रमों की भूमिका मामूली रह जाती है. रोजगार उत्पन्न करने की मूल समस्या अनुत्तरित रहती है.

तीसरी पॉलिसी स्वरोजगार को दी जानेवाली सब्सिडी है. अध्ययन में पाया गया कि यूरोपीय देशों में दी जा रही यह सब्सिडी सफल है. परंतु इससे बेरोजगारी में मामूली सुधार ही हुआ है. स्वरोजगार छोटे पैमाने पर होता है जैसे जुलाहा घर में एक या दो हथकरघे लगाता है. संगठित क्षेत्र में ऑटोमेटिक मशीन पर बुनाई सस्ती पड़ती है. अत: देश में जुलाहों का रोजगार समाप्त हो गया है. रिक्शा और टैक्सी जैसे रोजगार जरूर उत्पन्न हुए हैं, परंतु ये भी दूसरी आर्थिक गतिविधियों पर निर्भर हैं. इनकी जरूरत तब ही पड़ेगी जब बड़ी संख्या में लोगों को जुलाहे के घर माल खरीदने जाना होगा. जब जुलाहा बेरोजगार होगा तो लोगों को टैक्सी की जरूरत कम ही होगी. अत: स्वरोजगार सब्सिडी सार्थक होते हुए भी बेरोजगारी की मूल समस्या का हल दे सकेगी, इसमें मुङो संदेह है.

संगठित क्षेत्र में रोजगार सब्सिडी देने के भी सार्थक परिणाम नहीं आये हैं. रोजगार सब्सिडी देने से उद्यमी पूर्व में काम कर रहे श्रमिकों को हटा कर नये सब्सिडी-युक्त व्यक्ति को रोजगार दे देते हैं. कुल रोजगार यथावत् रहता है. स्पष्ट है कि समस्या का हमारे पास कोई हल है ही नहीं. मूल समस्या पूंजी और श्रम के बीच संघर्ष की है. उत्पादन को पूंजी सघन मशीनों से किया जा सकता है, जैसे कपड़ों की बुनाई लूम से. उसी उत्पादन को श्रम सघन तरीके से किया जा सकता है, जैसे हथकरघे से. दोनों में जो सस्ता होगा वह बिकेगा. यदि पूंजी सस्ती होगी, तो मशीनी कपड़ा बिकेगा. चूंकि आज पूंजी सस्ती है और मशीनी कपड़ा सस्ता पड़ रहा है. फलस्वरूप श्रम-सघन उत्पादन पस्त है. यही कारण है कि शेयर बाजार में उछाल और बेरोजगारी में वृद्घि साथ-साथ चल रहे हैं.

विश्व बैंक और हमारी सरकार की ग्लोबलाइजेशन संबंधी सोच में मौलिक विसंगति है. सोच है कि बड़ी कंपनियों को सस्ते उत्पादन और रोजगार भक्षण की छूट दे दो. फिर इन पर टैक्स लगा कर लोगों को ट्रेनिंग देकर रोजगार उपलब्ध करा दो. यह सफल नहीं हो सकता, चूंकि मशीनी उत्पादन से बेरोजगारी बढ़ेगी. निमोनिया के मरीज को ठंडा पानी पिलाने के साथ-साथ दवा दी जाये, तो वह स्वस्थ नहीं होगा.

इसी प्रकार मशीनी उत्पादन को प्रोत्साहन देते हुए बेरोजगारों को ट्रेनिंग देने से बेरोजगारी का हल नहीं निकल सकता. जरूरत है कि चिह्न्ति क्षेत्रों में मशीनी उत्पादन पर भारी टैक्स लगा दिया जाये, जिससे श्रम सघन उत्पादन प्रतिस्पर्धा में खड़ा रह सके. तब ही बेरोजगारी की समस्या का हल निकलेगा.

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