केवल आदिवासी लड़ पाएं चुनाव, गारो HADC ने बनाया ऐसा नियम; हाईकोर्ट ने किया रद्द

मेघालय हाईकोर्ट. फोटो- एक्स.
GHADC Election: मेघालय हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में गारो हिल स्वायत्त जिला परिषद (जीएचएडीसी) के नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया. इस अधिसूचना के तहत परिषद ने जीएचएडीसी चुनाव के लिए अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्र को अनिवार्य कर दिया था.
GHADC Election: मेघालय उच्च न्यायालय ने चुनाव नामांकन के लिए अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्र को अनिवार्य बनाने संबंधी गारो हिल स्वायत्त जिला परिषद (जीएचएडीसी) की अधिसूचना को रद्द कर दिया है. अदालत ने कहा कि इस अधिसूचना को जारी करते समय उचित विधायी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया. गारो हिल स्वायत्त जिला परिषद ने 10 अप्रैल 2026 को होने वाले जीएचएडीसी चुनाव में गैर-आदिवासियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाली अधिसूचना 17 फरवरी को जारी की थी. इसका उद्देश्य आगामी जीएचएडीसी चुनाव में गैर-आदिवासियों को चुनाव लड़ने से रोकना था.
मतदाता ने अदालत में दी चुनौती
इस अधिसूचना के खिलाफ एक मतदाता ने अदालत में याचिका दायर की. याचिकाकर्ता ने कहा कि यह अधिसूचना असम एवं मेघालय स्वायत्त जिला (जिला परिषदों का संविधान) नियम, 1951 का उल्लंघन करती है, जिसमें मतदाताओं और उम्मीदवारों की योग्यता से जुड़े प्रावधान तय किए गए हैं. याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस अधिसूचना ने संबंधित नियमों में संशोधन किए बिना वैध गैर-आदिवासी मतदाताओं और उम्मीदवारों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया.
उन्होंने यह भी कहा कि इस कदम के लिए राज्यपाल और जिला परिषद की मंजूरी नहीं ली गई, जबकि 1951 के नियमों के नियम 72 के तहत यह अनिवार्य है. वकील ने अदालत को बताया कि गैर-आदिवासी लोग ऐतिहासिक रूप से इन चुनावों में भाग लेते रहे हैं और 1952 में परिषद की स्थापना के बाद से वे इसके सदस्य भी रहे हैं.
परिषद ने आदिवासी हितों की रक्षा का दिया तर्क
जीएचएडीसी ने अपने पक्ष में कहा कि यह अधिसूचना जनसांख्यिकीय बदलावों के बीच आदिवासी हितों की रक्षा के उद्देश्य से जारी की गई थी. परिषद ने यह भी कहा कि इसके लिए कार्यकारी समिति की आपातकालीन शक्तियों का उपयोग किया गया था. पिछले साल भी वॉयस ऑफ द पीपुल्स पार्टी ने इस मामले में आवाज उठाई थी. उसका कहना था कि इससे आदिवासियों को अधिक सुरक्षा मिलेगी.
अदालत ने बताया- नियम बदलने की प्रक्रिया जरूरी
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कार्यकारी समिति केवल नियमों में बदलाव का प्रस्ताव रख सकती है. किसी भी बदलाव को लागू करने के लिए जिला परिषद और राज्यपाल की मंजूरी अनिवार्य होती है. अदालत ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि यह अधिसूचना कानूनी समीक्षा की कसौटी पर खरी नहीं उतरती. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि इसलिए इस अधिसूचना को रद्द किया जाता है.
मेघालय में जिला परिषदों को नियम बनाने का है अधिकार
मेघालय में जिला परिषदें संविधान की छठी अनुसूची के तहत आती हैं. संविधान की छठी अनुसूची विशेष रूप से आदिवासी स्वशासन सुनिश्चित करने, पारंपरिक कानूनों को सुरक्षित रखने और अनुसूचित जनजातियों की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए बनाई गई है. इसके साथ ही भारत के संविधान का अनुच्छेद 244(2) स्वायत्त जिला परिषदों को यह सुनिश्चित करने का अधिकार देता है कि स्थानीय आदिवासी समुदाय अपने शासन के प्रमुख संरक्षक बने रहें.
जीएचएडीसी में क्या है नियम?
जीएचएडीसी में कुल 30 निर्वाचन क्षेत्र हैं. इनमें से 29 सीटों पर चुनाव होते हैं, जबकि एक सदस्य को राज्यपाल नामित करते हैं. द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, गारो हिल्स के मैदानी इलाकों में फैले कम से कम पांच निर्वाचन क्षेत्रों में बंगाली भाषी या बंगाल मूल के मुस्लिम समुदाय का प्रभाव है. इस इलाके में मुस्लिम आबादी 70 प्रतिशत से अधिक है.
29 निर्वाचन क्षेत्रों में से तीन सीटों- फुलबाड़ी, राजाबाला और महेंद्रगंज में गैर-आदिवासी उम्मीदवार परिषद चुनाव लड़ सकते हैं. जीएचएडीसी के प्रावधानों के अनुसार, गारो हिल्स में लगातार 12 वर्षों तक रहने वाला कोई भी गैर-आदिवासी निवासी मतदान कर सकता है. इसका मतलब है कि गैर-आदिवासी भी कानूनी रूप से परिषद चुनाव लड़ सकते हैं और मतदान भी कर सकते हैं. हालांकि इस भागीदारी का कई एनजीओ और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हमेशा विरोध किया है.
खासी और जैंतिया हिल्स परिषदों में नहीं है मतदान का अधिकार
मेघालय में जीएचएडीसी, खासी और जैंतिया हिल्स की परिषदों के विपरीत, गैर-आदिवासियों को चुनाव लड़ने की अनुमति देता रहा है. यह व्यवस्था 1952 में परिषद की स्थापना के समय से ही लागू है.असम एवं मेघालय स्वायत्त जिला (जिला परिषदों का संविधान) नियम, 1951 के अनुसार गैर-आदिवासियों के चुनाव लड़ने पर कोई विशेष प्रतिबंध नहीं है. इसी तरह मतदान के अधिकार से जुड़े नियमों में भी गैर-आदिवासियों पर कोई रोक नहीं है, बल्कि केवल यह शर्त है कि मतदाता राज्य का स्थायी निवासी होना चाहिए.
हालांकि खासी हिल स्वायत्त जिला परिषद (संविधान, प्रक्रिया और कार्य संचालन) नियम, 2018 आदिवासी वयस्क मताधिकार की रक्षा करते हैं. इनमें यह भी कहा गया है कि संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 की अनुसूची के भाग-11 (मेघालय) में सूचीबद्ध अनुसूचित जनजाति से संबंधित नहीं होने वाला व्यक्ति मतदान का अधिकार नहीं रखेगा.
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उम्मीदवार ने बताया असंवैधानिक
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, बालाचंदा निर्वाचन क्षेत्र से संभावित उम्मीदवार एनामुल हक ने कहा कि यह अधिसूचना संविधान की छठी अनुसूची के पैरा 11 के आधार पर जारी की गई है. उनके अनुसार, यह पैरा केवल यह बताता है कि कानून और नियम आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित होने के बाद कैसे प्रभावी होते हैं, लेकिन यह परिषद को सदस्यता के लिए नई योग्यताएं या अयोग्यताएं तय करने का अधिकार नहीं देता.
हक के अनुसार, 1952 में जिला परिषद की स्थापना के बाद से गैर-आदिवासी निवासी चुनाव लड़ते रहे हैं. असम एवं मेघालय स्वायत्त जिला (जिला परिषदों का संविधान) नियम, 1951 में गैर-आदिवासियों को चुनाव लड़ने से नहीं रोका गया है, सिवाय उन सीटों के जो आरक्षित हैं. उन्होंने कहा, ‘यह कदम मनमाना है और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का भी उल्लंघन है.’
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पूर्व विधायक एस.जी. एस्मातुर मोमिनिन ने अधिसूचना की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि जीएचएडीसी के पास ऐसा कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है, जिससे वह गैर-आदिवासियों को चुनाव लड़ने से रोकने की शर्त लागू कर सके. इसी मामले में 9 मार्च से केस की सुनवाई चल रही थी.
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लेखक के बारे में
By Anant Narayan Shukla
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
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