जमीनी स्टेकहोल्डर को केंद्र में रखे बिना जस्ट ट्रांजिशन संभव नहीं, आईआईटी कानपुर के रिपोर्ट का खुलासा

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जमीनी स्टेकहोल्डर को केंद्र में रखे बिना जस्ट ट्रांजिशन संभव नहीं, आईआईटी कानपुर के रिपोर्ट का खुलासा

पावर प्लांट में काम करने वाले लोग इस बात से ज्यादा इत्तेफाक रखते हैं कि कोयले से नुकसान ज्यादा है और इसका प्रयोग बंद होना चाहिए.

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आईआईटी कानपुर ने हाल ही में जस्ट ट्रांजिशन पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें इस बारे में विस्तार से चर्चा की गयी है कि कोयला खदानों और प्लांट की बंदी के बाद वहां के कर्मचारियों की उम्मीदें क्या हैं. यह तमाम चीजें तब हो रही हैं, जब भारत एनर्जी ट्रांजिशन की ओर अग्रसर है और क्लीन एनर्जी को अपनाकर नेट जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने की ओर अग्रसर है.

क्या है जस्ट ट्रांजिशन

आईआईटी कानपुर के जस्ट ट्रांजिशन रिसर्च सेंटर ने एक रिपोर्ट जारी किया है जिसका शीर्षक है व्हाट इज जस्ट ट्रांजिशन. इस रिपोर्ट को जी 20 की बैठक में रिलीज किया गया, जिसकी अध्यक्षता भारत कर रहा है. आईआईटी कानपुर द्वारा जारी किये गये रिपोर्ट में जिन बातों पर विशेष चर्चा की गयी है वो है कोयले की वजह से होने वाले नुकसान, पर्यावरण और समुदाय की आजीविका.

कोयला आश्रितों की उम्मीदें मजबूत

व्यक्तिगत और सामुदायिक धारणाओं पर अगर हम गौर करें तो पायेंगे कि जस्ट ट्रांजिशन का कैनवास बहुत विशाल है. खासकर अगर हम बात निर्भरता के प्रकार, लिंग, कोयला इकाइयों और ट्रेड यूनियनों के साथ उनके संबंधों को देखते हैं. हालांकि जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा अप्रत्यक्ष कोयला आश्रितों से ज्यादा प्रत्यक्ष कोयला आश्रितों के बीच ज्यादा मजबूत है.

जमीनी स्टेकहोल्डर्स महत्वपूर्ण

वहीं दूसरी ओर पावर प्लांट में काम करने वाले लोग इस बात से ज्यादा इत्तेफाक रखते हैं कि कोयले से नुकसान ज्यादा है और इसका प्रयोग बंद होना चाहिए. आईआईटी कानपुर के जस्ट ट्रांजिशन रिसर्च सेंटर के संस्थापक प्रदीप स्वर्णकार इस बात पर जोर देते हैं कि जस्ट ट्रांजिशन तब ही सफलता पूर्वक संभव है जब जमीनी स्तर के स्टेकहोल्डर के साथ ज्यादा से ज्यादा संपर्क साधा जाये.

उम्मीदों से जुड़ी होती है धारणा

उनका मानना है कि नीतियों को तय करते वक्त हमें जमीनी स्तर के लोगों से पहले संपर्क करना होगा, क्योंकि हम एनर्जी ट्रांजिशन की नहीं जस्ट ट्रांजिशन की बात कर रहे हैं. लोगों की जो धारणा होती है वह उनकी उम्मीदों से जुड़ी होती, ऐसे में उन्हें दरकिनार नहीं किया जा सकता है. अगर ऐसा किया गया, तो जमीनी स्तर के लोग विरोध कर सकते हैं. इसलिए यह जरूरी है कि कोई भी नीति बनाते वक्त जमीनी स्तर के लोगों को केंद्र में रखा जाये.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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