जमीनी स्टेकहोल्डर को केंद्र में रखे बिना जस्ट ट्रांजिशन संभव नहीं, आईआईटी कानपुर के रिपोर्ट का खुलासा
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 18 Dec 2022 10:25 PM
पावर प्लांट में काम करने वाले लोग इस बात से ज्यादा इत्तेफाक रखते हैं कि कोयले से नुकसान ज्यादा है और इसका प्रयोग बंद होना चाहिए.
आईआईटी कानपुर ने हाल ही में जस्ट ट्रांजिशन पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें इस बारे में विस्तार से चर्चा की गयी है कि कोयला खदानों और प्लांट की बंदी के बाद वहां के कर्मचारियों की उम्मीदें क्या हैं. यह तमाम चीजें तब हो रही हैं, जब भारत एनर्जी ट्रांजिशन की ओर अग्रसर है और क्लीन एनर्जी को अपनाकर नेट जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने की ओर अग्रसर है.
आईआईटी कानपुर के जस्ट ट्रांजिशन रिसर्च सेंटर ने एक रिपोर्ट जारी किया है जिसका शीर्षक है व्हाट इज जस्ट ट्रांजिशन. इस रिपोर्ट को जी 20 की बैठक में रिलीज किया गया, जिसकी अध्यक्षता भारत कर रहा है. आईआईटी कानपुर द्वारा जारी किये गये रिपोर्ट में जिन बातों पर विशेष चर्चा की गयी है वो है कोयले की वजह से होने वाले नुकसान, पर्यावरण और समुदाय की आजीविका.
व्यक्तिगत और सामुदायिक धारणाओं पर अगर हम गौर करें तो पायेंगे कि जस्ट ट्रांजिशन का कैनवास बहुत विशाल है. खासकर अगर हम बात निर्भरता के प्रकार, लिंग, कोयला इकाइयों और ट्रेड यूनियनों के साथ उनके संबंधों को देखते हैं. हालांकि जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा अप्रत्यक्ष कोयला आश्रितों से ज्यादा प्रत्यक्ष कोयला आश्रितों के बीच ज्यादा मजबूत है.
वहीं दूसरी ओर पावर प्लांट में काम करने वाले लोग इस बात से ज्यादा इत्तेफाक रखते हैं कि कोयले से नुकसान ज्यादा है और इसका प्रयोग बंद होना चाहिए. आईआईटी कानपुर के जस्ट ट्रांजिशन रिसर्च सेंटर के संस्थापक प्रदीप स्वर्णकार इस बात पर जोर देते हैं कि जस्ट ट्रांजिशन तब ही सफलता पूर्वक संभव है जब जमीनी स्तर के स्टेकहोल्डर के साथ ज्यादा से ज्यादा संपर्क साधा जाये.
उनका मानना है कि नीतियों को तय करते वक्त हमें जमीनी स्तर के लोगों से पहले संपर्क करना होगा, क्योंकि हम एनर्जी ट्रांजिशन की नहीं जस्ट ट्रांजिशन की बात कर रहे हैं. लोगों की जो धारणा होती है वह उनकी उम्मीदों से जुड़ी होती, ऐसे में उन्हें दरकिनार नहीं किया जा सकता है. अगर ऐसा किया गया, तो जमीनी स्तर के लोग विरोध कर सकते हैं. इसलिए यह जरूरी है कि कोई भी नीति बनाते वक्त जमीनी स्तर के लोगों को केंद्र में रखा जाये.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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