Just Transition : वर्ल्ड बैंक ने बतायी जस्ट ट्रांजिशन की रूपरेखा, पीएम मोदी ने ग्रीन ग्रोथ पर दिया जोर

Just Transition : विश्व बैंक ने जस्ट ट्रांजिशन की रूपरेखा का अपनी रिपोर्ट में अच्छे से वर्णन किया है. विश्व बैंक के अनुसार जस्ट ट्रांजिशन की प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी की जा सकती है.
देश में पिछले दस दिन सप्ताह जलवायु परिवर्तन और उसके कारणों को लेकर महत्वपूर्ण रहे. कुछ सकारात्मक बातें सामने आयीं, जिसमें सबसे प्रमुख यह है कि 10 वर्षों में कोल इंडिया अपने 150 खदानों को बंद कर देगा. इसके साथ ही यह खबर भी सामने आयी है कि रिन्युएबल एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने 15,00 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी दी है.
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की ���ध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी (IREDA) में 1,500 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी दी है. इस निवेश का परिणाम यह होगा कि इरेडा रिन्युएबल एनर्जी के क्षेत्र को 12,000 करोड़ रुपये का ऋण देने में सक्षम होगा. कैबिनेट के इस फैसले से इरेडा को 3,500 से 4,000 मेगावाट की रिन्युएबल एनर्जी के उत्पादन में मदद मिलेगी.
प्रधानमंत्री ने 23 सितंबर को पर्यावरण मंत्रियों को संबोधित करते हुए कहा कि अब देश का फोकस ग्रीन ग्रोथ पर है, ग्रीन जाॅब्स पर है. पीएम नरेंद्र मोदी ने पहले ही COP26 में 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का टारगेट रखा है. ऐसे में पीएम मोदी की ये घोषणा काफी मायने रखती है.
वहीं वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट सामने आयी है जिसे 12 अगस्त को कोयला मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया है. इस रिपोर्ट में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए 150 से अधिक खदानों को बंद करने की बात कही गयी है. ऐसे में कोयला खदान में काम करने वाले कोल इंडिया के कर्मी और कोयला आधारित जीविका पर जीवन बसर करने वालों के सामने गंभीर समस्या उत्पन्न हो जायेगी, जिसपर गहराई से विचार करने की जरूरत है.
विश्व बैंक ने जस्ट ट्रांजिशन की रूपरेखा का अपनी रिपोर्ट में अच्छे से वर्णन किया है. विश्व बैंक के अनुसार जस्ट ट्रांजिशन की प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी की जा सकती है.
1. खदान बंद करने की पूर्व योजना और तैयारी को मजबूत करने की आवश्यकता है. साथ ही कोयला क्षेत्रों में न्यायोचित परिवर्तन के संबंध में वैश्विक स्तर पर जो कुछ हुआ है, उससे सीख लेने की जरूरत है. खदानों को बंद करने की योजना इससे संबंधित लोगों और समुदाय पर इसके प्रभावों के आकलन की आवश्यकता है.
2. कर्मचारियों के कौशल को निखारा जाये. नौकरी गंवाने वाले कर्मचारियों को मुआवजा दिया जाये. साथ ही कर्मचारियों के लिए पेंशन की व्यवस्था की जाये.
3. पर्यावरण सुधार और भूमि के बेहतर इस्तेमाल के लिए योजना बनाने की जरूरत है. इसके लिए खनन भूमि के पुनरूद्धार की सख्त जरूरत है. इसके लिए अतिरिक्त धन राशि की सख्त जरूरत है. लोगों की आजीविका को बनाये रखने के लिए विकास कार्यों की सख्त जरूरत है, ताकि लोगों की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके.
अभी कोल इंडिया देश के आठ राज्यों के 58 जिलों में 141 भूमिगत, 158 ओसीपी, 19 मिक्स्ड खदानों से उत्पादन कर रही है. भूमिगत खदानों में से मात्र दो ही लाभ में हैं, जबकि ओपनकास्ट माइंस घाटे में चल रहे हैं. वहीं 221 माइंस बंद हो चुके हैं. एक अप्रैल 2022 तक के आंकड़े बताते हैं कि कोल इंडिया का कुल मैनपावर 2,48,550 है, जिसका 41 प्रतिशत भूमिगत खदानों में कार्यरत हैं.
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लेखक के बारे में
By रजनीश आनंद
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.
राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.
रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.
आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.
रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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