Just Transition : झारखंड में सोलर पॉलिसी लॉन्च होने के बाद जस्ट ट्रांजिशन नीति की जरूरत बढ़ी

एनर्जी ट्रांजिशन की प्रक्रिया ज्यों-ज्यों मूर्त रूप लेगी, जस्ट ट्रांजिशन की जरूरत उतनी ही बढ़ेगी. इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि सरकार जस्ट ट्रांजिशन को भी उतनी ही गंभीरता से ले जितनी गंभीरता ने वह एनर्जी ट्रांजिशन के लिए सौर ऊर्जा पॉलिसी लेकर आयी है.
झारखंड सरकार ने हाल ही में सोलर एनर्जी पॉलिसी को लॉन्च किया है, इस पॉलिसी के तहत कई ऐसी योजनाएं हैं जिसके तहत सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए कई उपाय किये गये हैं, मसलन अगर कोई रूफ टॉप पैनल लगवाता है तो उसे 40 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जायेगी, ये कुछ ऐसे स्कीम हैं, जिनसे प्रदेश में सौर ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा और प्रदेश हरित ऊर्जा की ओर अग्रसर होगा.
लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि अगर प्रदेश हरित ऊर्जा की ओर अग्रसर होगा तो निसंदेह प्रदेश में एनर्जी ट्रांजिशन होगा. एनर्जी ट्रांजिशन की प्रक्रिया ज्यों-ज्यों मूर्त रूप लेगी, जस्ट ट्रांजिशन की जरूरत उतनी ही बढ़ेगी. इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि सरकार जस्ट ट्रांजिशन को भी उतनी ही गंभीरता से ले जितनी गंभीरता ने वह एनर्जी ट्रांजिशन के लिए सौर ऊर्जा पॉलिसी लेकर आयी है.
Iforest.Global में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में कई कोल माइंस बंद हो चुके हैं और कई नुकसान में चल रहे हैं, जिसकी वजह से कोल कंपनियां वहां खनन का काम रोक चुकी है. झारखंड का रामगढ़ जिला इसमें सबसे ऊपर आता है, जहां कई कोयला खदान बंद हो चुके हैं और कई खदानों में खनन का काम नुकसान को देखते हुए रोक दिया गया है.
रामगढ़ से प्रभात खबर के पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने बताया कि रामगढ़ में कई खदान बंद हैं, वहीं बांसगड़हा जैसे खदान भी हैं, जिन्हें एक साल तक की बंदी के बाद सीटीओ मिल गया है. सीटीओ मिलने के बाद खनन कार्य फिर शुरू हो सकता है. बंद खदानों के मजदूरों का क्या हुआ? इस सवाल के जवाब में मनोज कुमार सिंह बताते हैं कि जो सीसीएल के पेरोल कर्मचारी हैं, उन्हें कंपनी सैलरी देती है. जिन इलाकों में यह उम्मीद है कि खनन कार्य शुरू कर दिया जायेगा वहां के मजदूरों को तो बैठा कर पैसा दिया जाता है, लेकिन जहां खनन कार्य पूरी तरह बंद हो गया है, वहां के मजदूरों को दूसरे खनन प्रोजेक्ट में शिफ्ट कर दिया जाता है.
रामगढ़ में कई ओपनकास्ट माइंस भी हैं. इन माइंस में अधिकतर कॉन्टैक्ट कर्मचारी काम करते हैं और वे काम बंद होने पर दूसरी जगह शिफ्ट हो जाते हैं. इसके अलावा कोयला आधारित उद्योग के भी मजदूर हैं, जिनपर रोजगार का संकट उत्पन्न हो गया है. बेशक कोयला खदानों के पूरी तरह बंद होने में अभी काफी लंबा वक्त है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि झारखंड में जस्ट ट्रांजिशन का समय आ चुका है.
क्लाइमेट ट्रेंड के एक कार्यक्रम में झारखंड के खदानों पर शोध करने वाली श्रेष्ठा बनर्जी ने बताया कि यहां जस्ट ट्रांजिशन की सख्त जरूरत है, क्योंकि यहां के कई खदान बंद होने वाले हैं या बंद हो चुके हैं. सरकार को शीघ्र अतिशीघ्र इसपर योजना और नीति बनाने की जरूरत है.
वहीं आईआईटी कानपुर के प्रदीप स्वर्णकार का कहना है कि देश में करोड़ों लोग हैं जो कोयला आधारित उद्योग पर जीते हैं और वे जस्ट ट्रांजिशन से प्रभावित होंगे. कोयले पर निर्भर लोगों में 90 प्रतिशत लोग पे रोल पर नहीं हैं इनका सटीक आंकड़ा भी किसी के पास नहीं है और यही परेशानी की सबसे बड़ी वजह है. इस लोगों की संख्या जानने के लिए कभी सर्वे भी नहीं किया गया है और ना स्टेकहोल्डर्स के पास ही ऐसा कोई डाटा है.
इन परिस्थितियों में जस्ट ट्रांजिशन एक बड़ी समस्या है जिसपर सरकारों को चाहे वो केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, गंभीरता से नीति बनाने की जरूरत है. नीति के अभाव में न्यायपूर्ण ट्रांजिशन या जस्ट ट्रांजिशन संभव नहीं है.
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By रजनीश आनंद
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.
राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.
रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.
आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.
रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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