भारत की दो सदी से अधिक पत्रकारिता के दौर को सामने लाने वाली पुस्तक का हुआ लोकार्पण
Published by : Pritish Sahay Updated At : 13 Feb 2026 10:54 PM
विजयदत्त श्रीधर की पुस्तक का लोकार्पण
Book Release: समग्र भारतीय पत्रकारिता विषय पर आधारित वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहास अध्येता विजयदत्त श्रीधर की पुस्तक का लोकार्पण शुक्रवार को हुआ. पुस्तक लोकार्पण के मौके पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के कलानिधि विभाग की ओर से एक विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया, जिसमें विद्वानों, शोधकर्ताओं और मीडिया जगत से जुड़े गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया. कार्यक्रम में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश के लिखित संदेश को प्रभात खबर के प्रधान संपादक अंकित शुक्ला ने पढ़ा.
Book Release: समग्र भारतीय पत्रकारिता पर माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान’ के संस्थापक वरिष्ठ पत्रकार, इतिहास अध्येता विजयदत्त श्रीधर की लिखित पुस्तक का लोकार्पण शुक्रवार को हुआ. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के कलानिधि विभाग द्वारा पुस्तक के लोकार्पण पर परिचर्चा का आयोजन हुआ. इस पुस्तक के तीन भाग है. पहले भाग में 1780 से 1880, दूसरे में तिलक युग 1881 से 1920 और फिर गांधी युग 1921 से 1948 का वर्णन किया गया है. कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र न्यास के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने कहा कि इस किताब के दूसरे खंड को जरूर पढ़ना चाहिए क्योंकि इसमें 40 साल की पत्रकारिता का जिक्र किया गया है. इस खंड में बताया गया है कि तिलक युग समाप्त हो रहा है और गांधी की पत्रकारिता शुरू हो रही है.
गांधी की पत्रकारिता सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भविष्य की भी है. इसलिए वर्ष 1947 के बाद का पत्रकारिता का खंड जब आएगा तो आएगा लेकिन हम अभी गांधी युग के पत्रकारिता को समझ लें तो ना आज सिर्फ पत्रकारिता की गिरावट देखने को मिलती है, बल्कि इसमें राजनीति, समाज और कारोबार सभी शामिल है. वहीं पहले खंड में बताया गया है कि पत्रकारिता होती क्या है. अपने समय की सबसे बड़ी चुनौती की पहचान पत्रकारिता करती है. अरविंदो वंदे मातरम लिख रहे थे, तो कई दौर की बहस हुई और फिर उन्होंने लिखा कि अपने समय की सबसे बड़ी चुनौती की पहचान करना, उसका समाधान करना और उसके लिए पूरी ताकत लगा देना ही पत्रकारिता है.
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश के लिखित संदेश को प्रभात खबर के प्रधान संपादक अंकित शुक्ला ने पढ़ा. अपने लिखित संदेश में हरिवंश ने कहा कि इस किताब को लिखने में श्रीधर को कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी. इस ध्रुव काम को आकार और मुकाम तक पहुंचाने के लिए इस भागीरथ काम को वे ही कर सकते हैं. तीन दशकों तक बिना थके, बिना उबे, एक विषय पर एकाग्र भाव से काम करना, दो हजार से अधिक प्रकाशकों से संपर्क और संवाद, देश भर की लाइब्रेरी और आर्काइव को खंगालना. श्रीधर के इस श्रम और समर्पण के प्रति पत्रकारिता जगत हमेशा आभारी रहेगा. तीन खंड में 245 वर्ष की पत्रकारिता को तथ्यों को संकलित और विश्लेषित करना काफी मुश्किल काम है. इसके महत्व और उपादेयता का महत्व सिर्फ मीडिया के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक खुशी की बात है कि यह पुस्तक ऐसे समय आयी है जब भारत अतीत की विरासत को याद करने का काम करेगा.
वरिष्ठ पत्रकार व माखनलाल चतुर्वेदी के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि इस किताब के द्वारा उन पहलुओं को छूना है, जिससे बहुत सारे लोग आज भी अनभिज्ञ हैं. पत्रकारिता का एक बड़ा इतिहास रहा है और उन इतिहास को पूरे संदर्भ के साथ रखना इस किताब की विशेषता है. इस किताब में जिन पहलुओं को छुआ गया है वह सिर्फ पत्रकारिता का विषय ही नहीं है, बल्कि इसमें तत्कालीन समाज , संस्कृति, राजनीति सभी का मिश्रण है. तिलक जैसे लोगों को क्यों और किस कारण से पत्रकारिता करनी पड़ी इस तरह के विषयों की भी जानकारी मिलती है.
प्रभात खबर के प्रधान संपादक अंकित शुक्ला ने आज की पत्रकारिता में आयी गिरावट को लेकर सिर्फ पत्रकार या पत्रकारिता को दोषी ठहराये जाने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इसके लिए हम सब दोषी है. किसी एक को दोष देना ठीक नहीं है. सभी वक्ताओं ने और वरिष्ठों ने कहा कि पत्रकारिता है क्या और पत्रकार है कौन, साहित्य है क्या और साहित्यकार है कौन? लेकिन उस समय जैसा समाज होता है, वैसा ही पत्रकार निकलता है, वैसा ही साहित्यकार निकलता है, वैसा ही राजनेता निकलता है. पूरे वैल्यू सिस्टम में जिस प्रकार की गिरावट आयी है, ज्ञान के मायने बदल गये हैं, ज्ञान को प्रदर्शित करने और मापने के पैमाने बदल गये हैं उसे गलत या सही नहीं कहा जा सकता है. यह आज के समय की जरूरत है और समय को रिवर्स भी नहीं किया जा सकता है. विपरीत परिस्थितियों में हम जहां टिके हुए है, उसमें यह किताब एक संबल का काम करेगा.
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं स्तंभकार अनंत विजय, नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने भी अपने-अपने विचार रखें.
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By Pritish Sahay
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