सोनिया-राहुल की प्रो-पुअर पॉलिटिक्स में अब कितना दम?

Updated at : 28 Nov 2014 5:14 PM (IST)
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सोनिया-राहुल की प्रो-पुअर पॉलिटिक्स में अब कितना दम?

।।पंकज कुमार पाठक।। नयी दिल्लीः कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर अपने वोट बैंक को समटने की कोशिश में जुटे हुए हैं. वे अघोषित तौर पर पार्टी की कमान, उसके सबसे बुरे दौर में संभाल रहे हैं. राहुल के आलोचक कांग्रेस की मौजूदा दशा के लिए प्रमुख रूप से उन्हें ही दोषी मानते हैं. […]

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।।पंकज कुमार पाठक।।

नयी दिल्लीः कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर अपने वोट बैंक को समटने की कोशिश में जुटे हुए हैं. वे अघोषित तौर पर पार्टी की कमान, उसके सबसे बुरे दौर में संभाल रहे हैं. राहुल के आलोचक कांग्रेस की मौजूदा दशा के लिए प्रमुख रूप से उन्हें ही दोषी मानते हैं. जबकि उनके प्रशंसक इसका दोष राहुल को नहीं देते बल्कि भाजपा के आक्रामक प्रचार के तरीके को मानते हैं. राहुल के प्रशंसक यह भी कहते हैं कि भाजपा और मोदी की प्रचार शैली से जनता भ्रमित हो गयी है. राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी गरीब केंद्रित राजनीति के लिए जाने जाते हैं.

कांग्रेस लगातार 15 वर्षो तक गरीबों की आवाज बनकर दिल्ली की प्रादेशिक सत्ता बचाने में कामयाब रही. वहीं दस साल की केंद्र की सरकार में भी कांग्रेस नीत सरकार ने गरीबों के लिए कई योजनाएं धरातल पर उतारीं, जिनमें किसानों के लिए कई योजनाएं थी, तो मनरेगा जैसी योजनाओं से पार्टी ने गांव-गांव तक पहुंचने और रोजगार दूर करने की कोशिश की.
दिल्ली की रंगपुरी पहाड़ी की करीब 500 झुग्गियों को ढहाए जाने के मामले को अब कांग्रेस बड़े चुनावी मुद्दे में तब्दील करने में कोई कोर- कसर नहीं छोड़ना चाहती. पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी पूरे जोश में यह कहने से पीछे नहीं हट रहे कि बुलडोजर इन झोपड़ियों से पहले उन पर चढ़ेगा. झुग्गियों में रहने वालों के बीच उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि कठिन वक्त में गरीबों के पीछे कांग्रेस ही खड़ी है.
पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने चुनावी जंग में कांग्रेस के सबसे मजबूत हथियार में जंग का काम किया और अनधिकृत कॉलोनियों, पुनर्वास कॉलोनियों और झुग्गी-झोपड़ियों के मतदाताओं के मुद्दे को हाइजैक कर लिया. कांग्रेस इन्ही मुद्दों के दम पर 15 सालों तक दिल्ली में अपना शासन बचा पाने में कामयाब रही थी. अब राहुल गांधी इन मुद्दों को अपने हाथ से फिसलने नहीं देना चाहते.
कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि लोकसभा चुनाव में भी पार्टी इनका वोट हासिल नहीं कर पाई. कांग्रेस पार्टी से जुड़े सूत्रों के अनुसार पिछले दिनों हुई पार्टी के बड़े नेताओं की बैठक में यह तय किया गया कि पार्टी गरीबों से जुड़े मुद्दे को जोर-शोर से उठाएगी.
पार्टी को इस फैसले के बाद बैठै-बिठाये एक मौका मिल गया. सूबे के प्रशासन ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस को अपनी सियासत चमकाने का मौका दे दिया है.
राहुल गांधी इस तरह की राजनीति पहले से करते आये हैं. याद कीजिए जब 2008 में राहुल गांधी एक गरीब महिला के यहां रूके थे. कलावती नाम की इस महिला का नाम संसद तक में गूंजा था. आज भी कलावती राहुल की तारीफ करेट नहीं थकती. कलावती कहती है"उन्होंने गरीबों के लिए बहुत किया है. उनकी सरकार ने किसानों की कर्ज़माफ़ी से कई औरतों को विधवा होने से बचाया है." राहुल और कांग्रेस की हार पर अफ़सोस जाहिर करते हुए कहती हैं, "पहले बीपीएल कार्ड पर 20 किलो राशन मिलता था, अब मोदी के राज में 12-13 किलो मिलता है." राहुल अपने तरीकों में कई हद तक कामयाब रहे.
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी भले ही प्रधानमंत्री की कुर्सी से किनारा कर लिया हो लेकिन गरीबों के हित में योजनाएं बनाने और उन्हें धरातल तक पहुंचाने में उनकी अहम भूमिका रही. उन्होंने एक टीम गठित की थी जो पूरे रिसर्च के साथ योजनाएं बनाती थी और उन पर विचार-विमर्श के बाद उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय भेज देती थी. पार्टी ने चुनाव से पहले रसोई गैस की संख्या में बढोत्तरी के लिए भी राहुल की मांग पर ध्यान दिया और इस पर त्वरित कार्रवाई की. कांग्रेस की पुरानी योजनाओं का नाम और स्वरूपथोड़ाबदलकर नयी सरकार उसी योजना को लागू कर रही है. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि सरकार से जनता के विकास के लिए एक रूपया गांव जाता है लेकिन जनता तक मात्र 15 पैसे ही पहुंचते हैं.
कांग्रेस अपनी योजनाओं को ब्लॉक और पंचायत स्तर तक पहुंचाने में कितनी कामयाब रही और राजीव गांधी के इस कथन को कितनी गंभीरता से लिया यह कहना मुश्किल है लेकिन प्रधानमंत्री नेरेंद्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर के उधमपुर में आज राजीव गांधी के इस कथन को याद करते हुए यह आरोप लगा दिया कि कांग्रेस ही जनता तक एक रूपया पहुंचने नहीं देती और 85 पैसे खा जाती है. दूसरी तरफ, राहुल गांधी झारखंड के चाईबासा में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए आरोप लगाते हैं कि प्रधानमंत्री पूरे देश के प्रधानमंत्री नहीं बल्कि कुछ उद्योगपतियों के प्रधानमंत्री बनकर रह गये हैं.
दोनों ही बयानों से साफ होता है कि भारतीय जनता पार्टी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के भ्रष्टाचार की चर्चा करके जनता का दिल जीतने की कोशिश करती रही और एक हद तक कामयाब भी रही, तो कांग्रेस ने भाजपा के चुनावी खर्च और उद्योगपतियों के रिश्तों को उजागर करने की कोशिश की और जनता तक यह बात पहुंचाने की कोशिश की कि कांग्रेस पार्टी हमेशा गरीबों के हित और उनके विकास के लिए काम करती है. अब कांग्रेस एक बार फिर आम जनता के मुद्दों को समेट कर झारखंड और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव में प्रचार करने में जुटी है. वही हालिया जीत से अतिउत्साहित भाजपा नरेंद्र मोदी के चेहरे के दम पर दोनों राज्यों में जीत का दावा कर रही है.
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