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पूरे दक्षिण एशिया की नस्ल एक, सभी के पूर्वज हैं एक : प्रो शिंदे

Updated at : 15 Sep 2019 12:50 PM (IST)
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पूरे दक्षिण एशिया की नस्ल एक, सभी के पूर्वज हैं एक : प्रो शिंदे

नयी दिल्ली : हड़प्पा सभ्यता के सबसे बड़े ज्ञात शहर ‘राखीगढ़ी’ से प्राप्त नमूनों पर हुए एक हालिया शोध ने ‘आर्यों के बाहरी होने’ के सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है. यह शोध प्रतिष्ठित शोधपत्रिका ‘सेल’ में ‘हड़प्पा के एक प्राचीन जीनसमूह में पूर्वी-यूरोप (स्टेपी) या ईरानी कृषकों का डीएनए अनुपस्थित’ शीर्षक से इसी महीने […]

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नयी दिल्ली : हड़प्पा सभ्यता के सबसे बड़े ज्ञात शहर ‘राखीगढ़ी’ से प्राप्त नमूनों पर हुए एक हालिया शोध ने ‘आर्यों के बाहरी होने’ के सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है. यह शोध प्रतिष्ठित शोधपत्रिका ‘सेल’ में ‘हड़प्पा के एक प्राचीन जीनसमूह में पूर्वी-यूरोप (स्टेपी) या ईरानी कृषकों का डीएनए अनुपस्थित’ शीर्षक से इसी महीने प्रकाशित हुआ. इसके मुख्य शोधकर्ता एवं पुणे स्थित डेक्कन कॉलेज के पूर्व कुलपति प्रोफेसर बसंत शिंदे हैं.

उनके शोध ने कई सवालों के जवाब दिये हैं, जिस पर अब नये सिरे से बहस छिड़ गयी है. उनके शोध ने कहा है कि सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता के नष्ट होने का मुख्य कारण आर्यों का हमला नहीं था. आर्य बाहर से नहीं आये थे.

उन्होंने कहा, ‘हमारा शोध प्रकाशित होने के बाद ज्यादातर चर्चा वैज्ञानिक (डीएनए) साक्ष्यों को लेकर हुई. हमारे शोध में वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ-साथ पुरातात्विक साक्ष्य भी स्पष्ट बताते हैं कि इतिहास में आर्यों का हमला या बड़े स्तर पर पलायन जैसा कुछ नहीं हुआ. लोगों का व्यापार आदि के सिलसिले में संपर्क था, इसके कारण कुछ मिश्रित डीएनए मिलते हैं.’

उन्होंने आगे का कि आर्य बाहरी थे, यह सिद्धांत अवैज्ञानिक और बेबुनियाद है. यह सिर्फ अनुमानों पर आधारित है. मैं कहना चाहूंगा कि ‘अफगानिस्तान से लेकर बंगाल और कश्मीर से लेकर अंडमान-निकोबार तक, पूरे दक्षिण एशिया’ की नस्ल एक है, सभी के पूर्वज एक हैं. आर्य-अनार्य की बातें गलत सिद्धांत के कारण बाद में होने लगीं.

उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक साक्ष्य हड़प्पा सभ्यता के पतन का मुख्य कारण ‘पर्यावरण में बदलाव’ को बताते हैं. 2000 ईसा पूर्व के आस-पास पर्यावरण शुष्क होने लगा था. इससे सिर्फ हड़प्पा ही नहीं, मिस्र और मेसोपोटामिया की तत्कालीन सभ्यताओं का भी साथ-साथ पतन हुआ. हड़प्पा सभ्यता की मुख्य बसावटें सरस्वती नदी के आस-पास रहीं. जब सरस्वती सूखने लगी, तो लोग अन्य स्थलों की ओर बढ़ने लगे. इसी कारण वहां की बसावटों का पतन हुआ.

आर्यों को बाहरी बताने वालों के भाषायी तर्क से जुड़े सवालों के जवाब में श्री शिंदे ने बताया कि लोगों को भाषा और लिपि का फर्क समझना चाहिए. संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है, इसका विकास 2000 या 1500 ईसा पूर्व में हुआ. हालांकि, भाषाई मुद्दे का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिलता है.

उन्होंने कहा कि यह भी कहा जा सकता है कि सभी इंडो-यूरोपियन भाषाओं का उद्गम संस्कृत है. हमारा शोध बताता है कि पहले यहां के लोग बाहर गये, फिर बाहरी लोग आये. इससे साबित होता है कि संस्कृत का असर वहां की भाषाओं पर पड़ा. उन्होंने यह भी कहा कि हड़प्पा सभ्यता की लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है. इस आधार पर कहा जा सकता है कि हड़प्पा के लोग भी संस्कृतभाषी थे, बस उनकी लिपि अलग थी. अभी दक्षिण भारत को देखें, तो संस्कृत सबसे अधिक वहीं जीवित है. दक्षिण भारत की भाषाओं का संस्कृत से बहुत साम्य मिलता है.

श्री शिंदे कहते हैं कि हड़प्पा सभ्यता में सिर्फ पांच बड़े शहर मिलते हैं. इसके अलावा आठ-दस छोटे शहर मिले हैं. अभी तक हड़प्पा सभ्यता की 2000 से अधिक बसावटें मिल चुकी हैं. अधिकांश बसावटें ग्रामीण हैं. वैदिक साहित्य में भी शहरों का जिक्र है. ज्ञात पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर हड़प्पा और वैदिक सभ्यता एक ही साबित होती है. राखीगढ़ी की खुदाई में विभिन्न ज्यामितीय अग्निकुंड मिले हैं. वैदिक साहित्य में भी इन अग्निकुंडों का जिक्र है. हड़प्पा सभ्यता के लोग अग्नि पूजक थे, यह स्पष्ट है. हड़प्पा के लोग ही वैदिक लोग थे, इसका इससे बड़ा क्या सबूत हो सकता है?

प्रोफेसर बसंत शिंदे कहते हैं कि उनका शोध वर्ष 2006 में शुरू हुआ. खुदाई शुरू हुई और वे साक्ष्य जुटाते रहे. उन्होंने कयासों पर नहीं, वैज्ञानिक-पुरातात्विक प्रमाणों पर जोर दिया. प्रतिष्ठित वैश्विक संस्थानों में नमूनों की जांच की गयी. वैज्ञानिक-पुरातात्विक साक्ष्यों के कारण ही यह शोध ‘सेल’ में प्रकाशित हुआ.

उन्होंने कहा कि अब सारे परिणाम वर्ष 2019 में आ पाये, तो हम क्या कर सकते हैं? यह पहले हो जाता, तब भी लोग कुछ न कुछ कहते. दरअसल जो राजनीति से संचालित हो रहे हैं, उन्हें हर चीज में राजनीति दिखाई देती है.

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