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जस्टिस जोसेफ की सुप्रीम कोर्ट में ''नियुक्ति'' को लेकर सरकार के ''कदम'' पर प्रतिक्रियाआें का बाजार गर्म

Updated at : 26 Apr 2018 7:00 PM (IST)
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जस्टिस जोसेफ की सुप्रीम कोर्ट में ''नियुक्ति'' को लेकर सरकार के ''कदम'' पर प्रतिक्रियाआें का बाजार गर्म

नयी दिल्ली : दो न्यायविदों वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु मल्होत्रा और उत्तराखंड हार्इकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ में से सिर्फ मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद पर नियुक्ति को मंजूरी देने के केंद्र के कदम पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन (एससीबीए ) ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की. सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के […]

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नयी दिल्ली : दो न्यायविदों वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु मल्होत्रा और उत्तराखंड हार्इकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ में से सिर्फ मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद पर नियुक्ति को मंजूरी देने के केंद्र के कदम पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन (एससीबीए ) ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की. सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रमुख और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मल्होत्रा का नाम स्वीकार करने और न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम पर दोबारा विचार के लिए कहने के केंद्र सरकार के कदम को ‘परेशान करने वाला’ करार दिया.

इसे भी पढ़ेंः जस्टिस जोसेफ पर गरमायी राजनीति, कांग्रेस का आरोप सरकार अदालतों में ‘अपने लोग’ भरना चाहती है

सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम ने मल्होत्रा और न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम की सिफारिश शीर्ष अदालत के न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के लिए की थी. जानेमाने वकील प्रशांत भूषण ने विकास सिंह की राय से सहमति जतायी, जबकि भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट में अक्सर याचिकाएं दाखिल करने वाले सुब्रमण्यन स्वामी ने कहा कि इस मुद्दे पर कांग्रेस का रुख उसकी हताशा को दर्शाता है. स्वामी की टिप्पणी अहम है, क्योंकि वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने केंद्र के फैसले की आलोचना की है. उन्होंने ट्वीट किया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में कोलेजियम की सिफारिश अंतिम और बाध्यकारी होती है. चिदंबरम ने ट्वीट किया कि क्या मोदी सरकार कानून से ऊपर है ? न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की नियुक्ति क्यों रोकी जा रही है ? उनके राज्य या उनके धर्म या उत्तराखंड मामले में उनके फैसले की वजह से?

मोदी सरकार को करारा झटका देते हुए उत्तराखंड हार्इकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जोसेफ की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2016 में राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के केंद्र के फैसले को निरस्त कर दिया था और हरीश रावत की कांग्रेस सरकार बहाल कर दी थी. बाद में कांग्रेस विधानसभा चुनाव हार गयी थी. चिदंबरम एवं अन्य की प्रतिक्रियाएं इन खबरों के बीच आयी हैं कि केंद्र ने वरिष्ठ वकील मल्होत्रा की सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश पद पर नियुक्ति को मंजूरी दे दी, जबकि न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम को मंजूरी नहीं दी. मल्होत्रा बार से सीधे सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के पद पर नियुक्त की जाने वाली पहली महिला न्यायाधीश हैं.

इस बीच, कानून मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि सरकार ने कोलेजियम से कहा है कि वह न्यायमूर्ति जोसेफ को शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के तौर पर नियुक्ति की अपनी सिफारिश पर फिर से विचार करे. विकास सिंह ने अपनी निजी राय जाहिर करते हुए न्यायमूर्ति जोसेफ की नियुक्ति में देरी पर चिंता जतायी. उन्होंने कहा कि कार्यपालिका की ओर से इस तरह का दखल निश्चित तौर पर अवांछित है. उन्होंने कहा कि यह तरक्की काफी गलत है, क्योंकि इससे सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता प्रभावित होती है.

जस्टिस जोसेफ मामले में कार्यपालिका की दखल अवांछित

उन्होंने कहा कि हमने हालिया समय में देखा है कि सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता कितनी अहम है. न्यायाधीशों को कनिष्ठ न्यायाधीशों के तौर पर पेश किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि वे संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए उपयुक्त नहीं हैं. इसलिए कल यदि कोई कहता है कि न्यायमूर्ति जोसेफ एक कनिष्ठ न्यायाधीश हैं और किसी खास मामले की सुनवाई के लिए उपयुक्त नहीं हैं, तो यह बहुत दुखद होगा. सिंह ने बताया कि सरकार जिम्मेदार होगी. कार्यपालिका की ओर से इस तरह का दखल निश्चित तौर पर अवांछित है. इसमें देरी करके उन्होंने निश्चित तौर पर वरिष्ठता के नियमों में दखल दिया है और उस मायने में उन्होंने न्यायपालिका के कामकाज में दखल दिया है. यह काफी गंभीर मामला है. सिविल सोसाइटी और सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों को इस पर चर्चा करनी चाहिए और सरकार के समक्ष इस मामले को उठाना चाहिए.

स्वामी ने कांग्रेस को बताया हताश

न्यायमूर्ति जोसेफ की नियुक्ति में देरी के मुद्दे पर भाजपा नेता स्वामी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी हताश है. उन्होंने कहा कि एक तरफ वे सीजेआई पर भाजपा की तरफ झुके होने का आरोप लगाते हैं और दूसरी तरफ वे कह रहे हैं कि हमने उनकी अनदेखी की है. कांग्रेस पार्टी हताश है. भूषण ने केंद्र पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि सरकार कोलेजियम की सिफारिश के मुताबिक नियुक्तियां नहीं करके न्यायपालिका की आजादी को ध्वस्त करने की कोशिश कर रही है.

जस्टिस जोसेफ ने उत्तराखंड मामले में दिया था सरकार के खिलाफ फैसला

उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति केएम जोसेफ का मामला बहुत साफ है. उनके नाम को रोका गया है, जिसकी सिफारिश चार महीने पहले कोलेजियम की ओर से की गयी थी. कोलेजियम ने एकमत से नामों की सिफारिश की थी और फिर भी सरकार ने इसे अटकाया है, क्योंकि उन्होंने उत्तराखंड मामले में सरकार के खिलाफ फैसला दिया था. भूषण ने कहा कि यह न्यायपालिका की आजादी की बातें करने वाली सरकार के लिए बहुत शर्मनाक है और स्तब्ध करने वाली बात है कि वह खुद को पसंद न आने वाले लोगों की नियुक्ति को ठंडे बस्ते में डालकर न्यायपालिका की आजादी को ध्वस्त करने की कोशिश कर रही है.

फरवरी से सरकार ने रोक रखा था फैसला

बीते 22 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम की वह फाइल कानून मंत्रालय में पहुंची थी, जिसमें न्यायमूर्ति जोसेफ और मल्होत्रा को शीर्ष अदालत में न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की गयी थी. फरवरी के पहले हफ्ते में फाइल पर गौर करने के बाद सिफारिशों पर फैसला रोक कर रखा गया, क्योंकि सरकार सिर्फ मल्होत्रा के नाम पर मंजूरी देना चाहती थी. अब सरकार ने मल्होत्रा की नियुक्ति पर मंजूरी दे दी है और कोलेजियम को न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम पर फिर से विचार करने के लिए कहा है. सरकार का मानना है कि न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम की सिफारिश करते हुए कोलेजियम ने वरिष्ठता और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की अनदेखी की. वह हार्इकोर्ट के 669 न्यायाधीशों में से वरिष्ठता क्रम में 42वें स्थान पर हैं.

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