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यादें: खय्याम सिर्फ खय्याम में मिलेंगे

Updated at : 20 Aug 2019 10:25 AM (IST)
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यादें: खय्याम सिर्फ खय्याम में मिलेंगे

बीते सोमवार को 70 और 80 के दशक के मशहूर संगीतकार मोहम्मद जहुर खय्याम ने मुम्बई के एक अस्पताल में आखिरी साँसें ली. कभी कभी, उमराव जान ,बाज़ार और रज़िया सुल्तान जैसी फिल्मों में उनके कालजयी संगीत ने उन्हें हमेशा के लिए अमर बना दिया है. उनसे हुई एक पुरानी बातचीत में उन्होंने अपने बचपन, […]

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बीते सोमवार को 70 और 80 के दशक के मशहूर संगीतकार मोहम्मद जहुर खय्याम ने मुम्बई के एक अस्पताल में आखिरी साँसें ली. कभी कभी, उमराव जान ,बाज़ार और रज़िया सुल्तान जैसी फिल्मों में उनके कालजयी संगीत ने उन्हें हमेशा के लिए अमर बना दिया है. उनसे हुई एक पुरानी बातचीत में उन्होंने अपने बचपन, संगीत से लेकर कई पहलुओं पर उर्मिला कोरी से बातचीत की थी.पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंश…

बचपन से फिल्मों में रुझान

‘ फिल्मों में मैं के. एल सहगल की एक्टिंग से प्रभावित होकर आया था. मूल रूप से मैं जालन्धर के छोटे से शहर राहों का रहनेवाला हूं लेकिन मुझे मीडिया ने अक्सर गांव वाला कहा है. सो मैं सभी से यह बात साफ कर देना चाहता हूं कि मैं एक ऐसे शहर से हूं जहां बी.एम.सी., अस्पताल, स्कूल, टूरिस्ट बंगले, पुलिस थाना जैसी सभी सुविधाएं थी जो गांव में मिलना मुमकिन नहीं है. उन दिनों सिनेमा को बाइस्कोप और सिनेमाघर को मंडुआ कहते थे. सिनेमाघर के अलावा ड्रामा और थियेटर कंपनी को भी मंडुआ ही कहा जाता था. शनिवार को स्कूल का आधा दिन होता था. दोपहर 12 बजे हम सब भाई बहन आते और जल्दी जल्दी कुछ खाकर दोपहर 2 बजे की ट्रेन से रवाना हो जाते. भाईजान स्टेशन पर हमें लेने आते और साथ ही सिनेमा की टिकटों की बुकिंग करके आते. सिनेमा देखने के दौरान हमारे खाने पीने का भी पर्याप्त प्रबन्ध वह करते थे. हर हफ्ते पहले दिन ही हम दो शो जरूर देखते थे. जिससे सिनेमा से लगाव हो गया.’

भजन भी सुनते थे

‘ हमारे मुस्लिम समाज में उन दिनों कोई भी संगीत को प्रोफेशन नहीं बनाता था क्योंकि लाखों में कोई एक ही बुलन्दी पर पहुंच पाता था. और बाकी लोग भूखे मरते थे. गानेवाले बजानेवालों के अलावा शायरों को भी हेय दृष्टि से देखा जाता था. क्योंकि उनकी माली हालत अच्छी नहीं होती थी. यही वजह थी कि घरवाले बच्चों को संगीत से दूर रखने की हिदायत देते थे. जहां तक मेरे परिवार की बात है तो मेरे परिवार का माहौल काफी साहित्यिक था. हमारे घर में बहुत बडी लाइब्रेरी थी. कहानी, कविताओं के अलावा कमोबेश सभी शायरों की किताबें थी. किताबों की तरह ही बडे बडे कलाकारों के ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स भी आते रहते थे. उन सभी रिकॉर्ड्स को सुनकर बाकायदा हमारे यहां उस पर चर्चा होती. तब तो हम बच्चे थे लेकिन उन चर्चाओं को सुनकर हमें बहुत अच्छा लगता. मुस्लिम माहौल होने के बावजूद हमारे यहां भजनों के भी रिकॉर्ड्स आते जो बडे चाव से सुने जाते थे.’

संगीत के ज़रिए आज़ादी की लड़ाई लड़ी

राहोँ से जालन्धर जाते समय एक छोटा सा स्टेशन पडता था खटकड कलां. जब कभी यात्रा के दौरान हमारे अब्बा जान साथ होते तो वह हम सभी भाई बहनों को उस स्टेशन पर उतारते और पिंड (गांव) को सलाम और प्रणाम दोनों करवाते. यह मेरे वालिद का ही प्रभाव था कि फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद मैंने ही सलाम और प्रणाम दोनों करने की शुरूआत की. मुझसे पहले हिन्दू भाई प्रणाम और मुस्लिम भाई सलाम करते थे. खैर, खटकड कलां स्टेशन पर हम सभी को उतारकर सलाम और प्रणाम करने की वजह बताते हुए उन्होंने हमें कहा था, ‘’इसी पिंड विच भगत सिंह जन्म्यासी (इसी गांव में भगत सिंह जन्मा था).’’ उसके बाद वह हमें भगत सिंह के बहादुरी की पूरी कहानी सुनाते. यही वजह है कि मैं अपने खून में भगत सिंह को महसूस करता हूं. मैंने संगीत के जरिए ही आज़ादी की लडाई लडी है और जीती है.मैंने कभी अपने संगीत को नीचा होने नहीं दिया।फिल्मी करियर में मैंने कभी कोई घटिया गाना नहीं दिया. फिल्मी, नॉन फिल्मी सभी को मिलाकर 600 से भी अधिक गाने मैने बनाये लेकिन कोई गीत किसी का कॉपी नहीं किया. सभी बेजोड और अपने आप में अनोखे हैं. खैर, जालन्धर पहुंचकर हम सिनेमा देखते. सिनेमा में मुख्य रूप से हम के. एल. सहगल की फिल्में देखना खूब पसन्द करते थे. उनकी एक्टिंग इतनी स्वभाविक होती थी कि लगता ही नहीं था कि वह एक्टिंग कर रहे हैं. उन्हें देखकर मुझे लगता था अरे इसमें कौन सी बडी बात है, इनकी तरह एक्टिंग तो हम भी कर सकते हैं. उनकी एक्टिंग के साथ उनकी गायकी का मैं इतना कायल हो गया था कि बचपन में ही तय कर लिया कि चाहे जो हो जाए के एल सहगल जैसा नायक बनना है. इसके लिए मैं दस साल की उम्र में घर से भागकर दिल्ली चला आया था लेकिन फिर जैसे तैसे घरवाले मुझे घर वापस समझा बुझा के ले आए कि बड़े होकर मुम्बई जाना।

खय्याम सिर्फ खय्याम में मिलेगा

अपने करियर में मैंने हर वो चीज पाई जिसकी मैंने तमन्ना की थी. मैंने शुरू से क्वांटिटी की बजाय क्वालिटी में विश्वास किया है. मैंने भले ही 60 फिल्में और 9 सीरियल किये हों लेकिन मैंने अपने नेशन को 9 रत्न दिये हैं जिनमें गजल, गीत, शबद, नाद, कीर्तन शामिल हैं. खय्याम ऐसी अलहदा स्टाइल है जो किसी से नहीं मिलती है. आपको खय्याम के काम की स्टायल बड़े-बड़े संगीतकारों में मिलेगी लेकिन खय्याम सिर्फ खय्याम में ही मिलेंगे. मैं समझता हूं जहां जहां भी मेरे भजनों की, मेरे गज़लों की और मेरे गीतों की झलक मिली उस संगीतकार ने मुझे इज़्ज़त बख्शी. मैंने अधिकतर कवियों और शायरों के साथ काम किया. मुझे खुशी है कि जिस तरह का साहित्यिक माहौल मुझे घर पर मिला वही माहौल मुझे फिल्मों में भी मिला. रिकॉर्डिंग के दौरान माहौल ऐसा होता था जैसे हम खुदा की इबादत कर रहे हों. दरअसल हमारी रिहर्सल्स इतनी जबर्दस्त होती थी कि एक ही बार में हमारी रिकॉर्डिंग सक्सेसफुली हो जाती थी.

उमराव जान का संगीत अमर

मैं अक्सर ‘पाकीजा’ और ‘उमराव जान’ के संगीत की तुलना होते सुनता है। पाकिजा और उमराव जान की तुलना ना की जाए तो बेहतर होगा. हालांकि दोनों कोठा संस्कृति पर बेस्ड थी. इसमें दो राय नहीं कि गुलाम मोहम्मद जी ने पाकिजा को बुलन्दी पर पहुंचाया. लेकिन यह भी तो देखिए कि पाकिजा का म्युजिक जहां राजस्थानी म्युजिक पर बेस्ड था, वहीं उमराव जान का म्युजिक लखनऊ म्युजिक पर बेस्ड था. श्रोताओं को यह हक है कि वह पाकिजा के गानों को उमराव जान से बेहतर मानें लेकिन पुरी दुनिया का कहना है कि उमराव जान, क्लासिकल इमॉर्टल है. इसमें विशेष रूप से शहर्यार के गीतों पर आशा जी के बोलों के साथ रेखा जी की जो अदायगी है वह काबिले गौर है. सुभाषिनी जी और मुज़फ्फर जी ने जो फिल्म बनाई उसके तो कहने ही क्या. जब हमनें उमराव जान हाथ में ली थी तो हमारे लिए भी यह एक चैलेंज था क्योंकि पाकिजा सिर पर खडी थी. बडे बजट की पाकिजा में मीना जी, अशोक कुमार और राज कुमार के सामने उमराव जान छोटे बजट की फिल्म थी. मैंने कभी किसी के काम को न दबाया और ना खुद दबा. गुलाम मोहम्मद जी की मृत्यु के बाद उनके छोडे गये काम की जिम्मेदारी मैंने ली लेकिन उनके प्रभाव में आये बिना मैंने अपनी स्टायल को ही सर्वोपरि माना.

आज का गीत संगीत देखने तक सीमित

संगीत के मद्देनजर इस माहौल को मैं बहुत अच्छा तो नहीं कहूंगा अब गानों की शुरूआत मधुर धुनों की बजाय फास्ट पेस इलेक्ट्रॉनिक गिटार की बेसुरी चींख से होता है. देखिए इंस्ट्रूमेंट चाहे इंडियन हो या वेस्टर्न उनसे निकलने सात सुर ही हैं. यह भी गलत नहीं कि इलेक्ट्रॉनिक रिदम अब हमारी संगीत की जरूरत बन चुकी है. अगर किसी एक इंडियन इंस्ट्रूमेंट का इस्तेमाल हम करना चाहें तो अब वह मुमकिन भी नहीं इससे रिकॉर्डिंग में क्लैरिटी नहीं आएगी. इलेक्ट्रॉनिक रिदम अब हमारी जरूरत बन चुके हैं लेकिन ध्यान देनेवाली बात यह है कि आप उसका इस्तेमाल कैसे करते हैं. और सबसे बडी बात इलेक्ट्रॉनिक रिदम का इस्तेमाल सबसे पहले मैंने कल्याण जी भाई के साथ किया था. हालांकि मेडिकल साइंस ने यह चेतावनी दे दी है कि यदि आप लगातार लाऊड म्युजिक सुनते रहें तो आप धीरे धीरे मेंटल सीकनेस का शिकार हो जाएंगे. एक बुरी बात मैं जो देख रहा हूं वह है सिंगिंग से जुडे लोगों में ड्रग्स का सेवन. अब इसे पैसा और पोजिशन से जोडकर देखा जाने लगा है. पुराने गानों में जो मेलोडी हुआ करती थी वह आज नदारद है. फिर भी मैं उम्मीद करता हूं कि कुछ प्रोड्यूसर्स और संगीतकारों की वजह से वह मेलोडी वापस आ जाए. आज गानें सुनने की बजाय देखने की चीज बन चुकी है सो मैं बहुत ज्यादा गाने नहीं सुनता. फिर भी अपने लोगों से मैं यह कहना चाहूंगा कि आप चाहे जो भी करें लेकिन अपनी तहज़ीब ना छोडे.

बनाया है ट्रस्‍ट

अपने बेटे की मौत के बाद उन्होंने एक ट्रस्ट बनाया है. जिसमें उन्होंने अपनी पूरी संपति फ़िल्म वर्कर्स की भलाई के लिए खर्च करने का फैसला लिया है. खय्याम कहते हैं कि यह मेरी पत्नी जगजीत कौर का फ़ैसला थ. अल्लाह की मेहरबानी से हमें बहुत कुछ मिला है अब समय है कि मैं वापस लौटाऊं. यह बहुत बड़ा ट्रस्ट है जो हमारे जाने के बाद भी कैमरे के पीछे काम कर रहे लोगों की मदद करेगा जिन्हें उनकी मेहनत के अनुरूप मेहनताना नहीं मिल पाता है. यह ट्रस्ट नवोदित और संघर्षरत संगीत से जुड़े लोगों की भी मदद करेगा.

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