Chandrayaan-3: 125 ग्राम के हैं प्रज्ञान के नेवीगेशन कैमरे, हाई रेडीऐशन और लो तापमान सहने में भी सक्षम
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 31 Aug 2023 12:51 PM
इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स सिस्टम प्रयोगशाला या LEOS ने पहली बार इन कैमरों को चंद्रयान -2 की तैयारियों के हिस्से के रूप में 2012 की शुरुआत में विकसित किया था. कैमरे उस रोवर पर थे जो 2019 मिशन के हिस्से के रूप में गया था जो असफल रहा.
Chandrayaan-3: चंद्रमा पर भारत के विक्रम की बहुप्रतीक्षित तस्वीरें चंद्रयान-3 दिखाते हुए सतह पृथ्वी पर पहुंच गई है लैंडर जिसने 23 अगस्त को ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग की थी उस रैंप के साथ जिसने रोवर को बाहर निकलने की अनुमति दी. तस्वीरें कल यानी कि बुधवार सुबह 7.30 बजे और 11 बजे ली गईं रोवर, प्रज्ञान के ऑनबोर्ड कैमरों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है दो पेलोड दिखाएं – चंद्र भूकंपीय उपकरण एक्टिविटी (आईएलएसए) और चंद्रा का सरफेस थर्मो फिजिकल प्रयोग (ChaSTE) – चंद्रमा पर उतरना इन-सीटू प्रयोगों के लिए सतह। जानिकारी के लिए बता दें इसरो ने तस्वीरों का दूसरा बैच (सुबह 11 बजे लिया गया) जारी किया लैंडर से महज 15 मीटर की दूरी से लिया गया था. आपकी जानकारी के लिए बता दें प्रज्ञान नेविगेशन कैमरे, जो रोवर का मार्गदर्शन करते थे, थे बेंगलुरु में LEOS नामक एक शांत प्रयोगशाला में डेवलप किया गया है.
इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स सिस्टम प्रयोगशाला या LEOS ने पहली बार इन कैमरों को चंद्रयान -2 की तैयारियों के हिस्से के रूप में 2012 की शुरुआत में विकसित किया था. कैमरे उस रोवर पर थे जो 2019 मिशन के हिस्से के रूप में गया था जो असफल रहा. सेल्वराज पी पूर्व इसरो समूह प्रमुख, LEOS और रोवर के प्रोजेक्ट मैनेजर ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि, साल 2019 में 12 लोगों क एक रोवर टास्क फोर्स को फिर से निर्माण किया गया था. इस टीम का टारगेट ऐसे हल्के कैमरों को तैयार करना था जो कि लूनर रेडीऐशन और इक्स्ट्रीम टेम्परचर का सामना आसानी से कर सके. जानकारी के लिए बता दें इस रोवर में लगे दोनों ही कैमरे महज 125 ग्राम के हैं। पूर्व इसरो ग्रुप हेड, LEOS और रोवर के प्रोजेक्ट मैनेजर पी सेल्वराज ने आगे मामले पर बात करते हुए कहा कि हमने LEOS के खुद के आप्टिक्स और लघु सेंसर्स का इस्तेमाल किया है. आगे बताते हुए उन्होंने कहा कि इसे इतनी अच्छी तरह से काम करते देख कर काफी अच्छा भी लगा. आज जो तस्वीरें जारी की गईं है वे काफी साफ और स्पष्ट हैं.
सेल्वराज ने कहा, ये छोटे डिजिटल कैमरे बहु-तत्व लेंस का उपयोग करते हैं और उनकी छवि गुणवत्ता सत्यापित होती है ज़मीन पर अनेक परीक्षणों के माध्यम से. आगे बताते हुए उन्होंने कहा कि ये कैमरे 50 मेगाराड (विकिरण) का सामना कर सकते हैं अंतरिक्ष) जिसका मतलब है कि नियमित कैमरों के विपरीत जो प्राप्त किया जा सकता है ऐसी स्थितियों में क्षतिग्रस्त होने पर, ये वास्तव में कार्य कर सकते हैं वह भी लंबे समय तक. प्रयुक्त सामग्री और प्रक्रियाएं भी इसकी अनुमति देती हैं बेहद कम तापमान में जीवित रहते हैं. हमने इसका परीक्षण वैक्युम में -200° सेल्सियस तापमान में किया है. हमें उम्मीद है कि यह रात भर जीवित रहेगा और जब सूरज फिर से उगेगा तो इसमें जीवन लौट आए.
सेल्वराज ने कहा ये कैमरे प्रज्ञान की आंखें हैं, जो इसे अनुमति देती हैं कि यह चंद्रमा की सतह पर नेविगेट कर सके, केवल यहीं नहीं इसके साथ ही तस्वीरो को भेज सके. प्रत्येक पथ योजना के लिए, इनमें से डेटा नेविगेशन कैमरों को जमीन पर डाउनलोड करना होगा जहां एक डिजिटल एलिवेशन मॉडल (डीईएम) तैयार किया जाता है. तब, ज़मीन और तंत्र की टीमें तय करती हैं कि कौन सा रास्ता है प्रज्ञान के लिए सर्वोत्तम और रोवर के लिए कमांड को अपलिंक करें अनुसरण करना. रोवर द्वारा ली गई तस्वीरें इस बात को दोहराती हैं कि कैसे 23 अगस्त को लैंडिंग कितनी सहज और कितनी पक्की थी विक्रम चंद्रमा पर है.
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