कौन हैं मोहम्मद अली जाफरी? जिनकी स्ट्रेटजी से तन कर खड़ा है ईरान; हरा नहीं पा रहे US-इजरायल

ईरानी आईआरजीसी के पूर्व कमांडर मोहम्मद अली जाफरी.
Iran Mohammad Ali Jafari: अमेरिका और इजरायल की मिश्रित शक्ति के सामने ईरान कितने दिन टिकेगा? 28 फरवरी को जब ट्रंप और नेतन्याहू की सेनाओं ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व को समाप्त कर दिया, तब लगा कि कुछ ही दिनों में तेहरान का किला ढह जाएगा. लेकिन अब इस युद्ध को 14 दिन बीत गए हैं और ईरान अब भी उसी शक्ति के साथ खड़ा है, इसके पीछे किसकी रणनीति रही?
Iran Mohammad Ali Jafari: 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ शुरू किया. इस अभियान में फाइटर प्लेन, ड्रोन और मिसाइलों के जरिए ईरान के शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेताओं को निशाना बनाया गया.
इन हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई, आईआरजीसी प्रमुख मोहम्मद पाकपोर, रक्षा मंत्री अजीज नसीरजादेह और सशस्त्र बलों के प्रमुख सैयद अब्दोलरहीम मौसवी सहित कई बड़े अधिकारी मारे गए.
अमेरिका को लगा कि ईरान की कमांड और कंट्रोल प्रणाली टूट चुकी है और कुछ ही दिनों में ईरानी व्यवस्था ढह जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ईरान अब भी मुकाबले में मजबूती से खड़ा है. इसके पीछे जिस व्यक्ति की सबसे बड़ी भूमिका मानी जाती है, वह हैं इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के पूर्व प्रमुख मोहम्मद अली जाफरी और उनकी ‘मोजैक डिफेंस’ रणनीति.
ईरान की रणनीति क्या है?
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा था कि ईरान ने पिछले दो दशकों में अमेरिकी सैन्य अभियानों का अध्ययन किया है और उनसे कई सबक लिए हैं.
उनके मुताबिक राजधानी पर बमबारी होने से भी ईरान की युद्ध क्षमता खत्म नहीं होगी, क्योंकि सेना अलग-अलग इकाइयों में बंटी हुई है और हर इकाई स्वतंत्र रूप से काम कर सकती है.
ईरान युद्ध के 14वें दिन तक भी लगातार अमेरिका और इजरायल पर मिसाइल और ड्रोन हमले कर रहा है. उसने मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिका के लगभग सभी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है.
ईरान के हमले इतने सटीक हैं कि अमेरिका अपने एयरक्राफ्ट कैरियर को ईरानी मिसाइलों की जद से दूर रखे हुए है. लगभग दो हफ्ते बाद भी पूरे मध्य पूर्व में तनाव बना हुआ है.
‘मोजैक डिफेंस’ ने ईरान को मजबूत बनाया
ईरान की नेतृत्व व्यवस्था को खत्म करने के लिए कोई ‘किल स्विच’ नहीं है. जब केंद्रीय नेतृत्व ही नहीं है, तो अमेरिका किसे निशाना बनाए?
मोहम्मद अली जाफरी ने ‘डिसेंट्रलाइज्ड मोजैक डिफेंस’ रणनीति बनाई. इस रणनीति का मूल विचार यह है कि अगर युद्ध में देश का शीर्ष नेतृत्व खत्म भी हो जाए, तब भी सेना लड़ाई जारी रख सके. इसलिए सैन्य शक्ति को एक जगह केंद्रित रखने के बजाय कई हिस्सों में बांट दिया गया है.
मोजैक डिफेंस कैसे काम करता है?
इस सिद्धांत के तहत ईरान ने अपनी सैन्य संरचना को 31 प्रांतीय कमांडों में विभाजित कर दिया. हर कमांड के पास होता है: अपना मुख्यालय, मिसाइल और ड्रोन भंडार, खुफिया संसाधन, बासिज मिलिशिया की इकाइयाँ, नौसैनिक हमलावर दल और पहले से तय युद्ध योजनाएँ.
इससे इन 31 स्थानीय कमांडरों को स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति मिलती है, भले ही केंद्रीय नेतृत्व से संपर्क टूट जाए. इन इकाइयों ने अमेरिका और इजरायल के सैन्य ठिकानों के साथ-साथ खाड़ी देशों में हवाई अड्डों, तेल रिफाइनरियों, टर्मिनलों और अन्य बुनियादी ढांचे पर हमले किए.
हर प्रांत एक ‘मोजैक’ की तरह है, जहां कमांडरों को स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति है. इस वजह से यदि तेहरान से संपर्क टूट भी जाए, तब भी सेना एक संगठित ताकत के रूप में लड़ सकती है.
तेहरान से कोई निर्देश न मिलने पर भी ये पहले बनी योजनाओं के आधार पर काम कर रहे हैं. ईरान लगभग भारत के आधे क्षेत्रफल वाला देश है, जहां पहाड़, रेगिस्तान और मैदानी इलाका है.
इतने बड़े देश में सेना उतरना भी अमेरिका के लिए आसान नहीं है. अगर अमेरिकी सेना उतरी तो भी उसे हर जगह आईआरजीसी और बासिज फोर्स के लड़ाकों से भिड़ना होगा. यह सबकुछ विकेंद्रीकृत व्यवस्था की वजह से ही हो पा हा है.
मोजैक सिद्धांत किन अनुभवों से बना?
यूएस इंस्टीट्यूट ऑफ पीस की 2010 की रिपोर्ट के अनुसार यह सिद्धांत दो प्रमुख अनुभवों पर आधारित है:
2003 में अमेरिका का इराक पर हमला: ईरान-इराक युद्ध लंबा और थकाऊ युद्ध था, जिसमें इराक ने ईरान पर जमीनी हमला किया और रासायनिक हथियारों तथा मिसाइलों का इस्तेमाल किया. इसके जवाब में ईरान ने बसीज मिलिशिया जैसी वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध बड़ी संख्या वाली सेनाओं के जरिए मानव लहर हमलों का सहारा लिया. इससे ईरान ने अधिक शक्तिशाली इराकी सेना को लंबे संघर्ष में उलझाकर बराबरी पर ला दिया.
2003 के इराक युद्ध से मिला सबक: 2003 में अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन ने 2003 invasion of Iraq के दौरान इराक की सेना को बहुत जल्दी हरा दिया. उस समय इराक की सेना पूरी तरह सद्दाम हुसैन के केंद्रीकृत नियंत्रण में थी. निचले स्तर के कमांडरों को बिना उनकी अनुमति के कोई बड़ा फैसला लेने की छूट नहीं थी. इस वजह से इराकी सेना अमेरिकी हमले का प्रभावी जवाब नहीं दे पाई और बगदाद तक का रास्ता जल्दी साफ हो गया.
अमेरिका को शायद लगा था कि वह 2026 में ईरान में वही कर सकता है जो उसने 2003 में इराक में किया था. 2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया था, तो Saddam Hussein की सेना को ध्वस्त करने में सिर्फ 26 दिन लगे थे.
लेकिन ईरान में किसी ने 2003 के इराक युद्ध का गहराई से अध्ययन किया था और तय किया था कि ईरानी शासन का वही हश्र नहीं होने दिया जाएगा जो सद्दाम हुसैन के शासन का हुआ था. वह व्यक्ति था मोहम्मद अली जाफरी.
उन्हीं ने यह सबक लिया कि सेना को पूरी तरह केंद्रीकृत नियंत्रण में रखना खतरनाक है. ईरान युद्ध के 14वें दिन 13 मार्च को भी ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमले जारी हैं और अमेरिका-इजरायल का सपना- ईरान की हार अब भी बहुत दूर है.
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जाफरी की रणनीति: जीत नहीं, हार को असंभव बनाना
विशेषज्ञों के अनुसार यह रणनीति ईरान को जरूरी नहीं कि युद्ध जिताए, लेकिन उसकी हार लगभग असंभव बना देती है. श्रीलंकाई मूल के ऑस्ट्रेलिया के लेखक एक्सपर्ट शनाका एंस्लेम परेरा ने लिखा, ‘ईरान आत्मघाती मिशन पर नहीं है, बल्कि ऑटोपायलट पर चल रहा है. मोजैक सिद्धांत जीतने के लिए नहीं, बल्कि हार को असंभव बनाने के लिए बनाया गया था.’
ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता, आईआरजीसी की वैचारिक प्रतिबद्धता और जाफरी की रणनीति ने मिलकर उसे ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है कि उसके विरोधियों को तेज जीत के बजाय लंबे और महंगे युद्ध का सामना करना पड़ सकता है.
मोहम्मद अली जाफरी ने अपने अध्ययन में यह समझने की कोशिश की कि अत्यधिक केंद्रीकृत कमान वाली सेनाएँ संकट के समय क्यों जल्दी बिखर जाती हैं. इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने ऐसी सैन्य व्यवस्था तैयार की जिसमें फैसले लेने की ताकत कई स्तरों पर बाँट दी गई. नतीजा यह हुआ कि सेना किसी एक नेतृत्व या मुख्यालय पर निर्भर नहीं रही और उसे पूरी तरह निष्क्रिय करना लगभग असंभव हो गया.
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कौन हैं जनरल मोहम्मद अली जाफरी?
मोहम्मद अली जाफरी ईरान के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी रहे हैं. रैंड कॉर्पोरेशन की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने इस्लामी क्रांति के बाद आईआरजीसी की खुफिया इकाई में अपना सैन्य करियर शुरू किया था, जो ईरान के कुर्दिस्तान क्षेत्र में सक्रिय थी. उन्होंने ईरान-इराक युद्ध में भी हिस्सा लिया और धीरे-धीरे सेना में ऊँचे पदों तक पहुंचे.
1992 में उन्हें आईआरजीसी की जमीनी सेना का कमांडर बनाया गया और साथ ही ‘सराल्लाह’ नाम की एक विशेष इकाई की जिम्मेदारी दी गई, जिसका काम तेहरान की रक्षा करना था. 2005 में उन्हें आईआरजीसी के सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज का प्रमुख बनाया गया. इसी दौरान उन्होंने ‘मोजैक डिफेंस’ सिद्धांत विकसित किया. 2007 में उन्हें आईआरजीसी का कमांडर-इन-चीफ बनाया गया और उन्होंने इस रणनीति को पूरी तरह लागू किया.
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लेखक के बारे में
By Anant Narayan Shukla
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
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