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India Japan: अमेरिका से मोहभंग, जापान संग लड़ाकू इंजन बनाने की तैयारी में भारत

Updated at : 13 Aug 2025 5:16 PM (IST)
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AI IMAGE OF Fighter Jet

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India Japan: दूसरे विश्व युद्ध के बाद हथियार निर्माण से दूर रहा जापान बदलते भू-राजनीतिक हालात में फिर से रक्षा क्षेत्र में सक्रिय हो रहा है. भारत और जापान उन्नत लड़ाकू विमान इंजन निर्माण में संभावित सहयोग पर विचार कर रहे हैं, जिससे भारत की पश्चिमी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता घट सकती है.

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India Japan: दूसरे विश्व युद्ध से पहले जापान की अधिकतर कंपनियां उन्नत हथियार बनाने में विशेषज्ञ मानी जाती थीं. युद्ध के बाद जापान ने सैन्य संघर्ष से दूरी बना ली और हथियार निर्माण पर सख्त प्रतिबंध लगा दिया. इसके बाद कई कंपनियों ने अपनी तकनीकी क्षमता को नागरिक क्षेत्रों में इस्तेमाल करते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और मशीनरी जैसे सेक्टर में वैश्विक पहचान बनाई. लेकिन बदलते भू-राजनीतिक हालात और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के चलते जापान अब फिर से रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में कदम बढ़ा रहा है.

ताजा रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत और जापान के बीच उन्नत लड़ाकू विमान इंजन के निर्माण को लेकर संभावित सहयोग पर बातचीत हो सकती है. ब्लूमबर्ग के अनुसार, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ-साथ भारत जापान के संपर्क में है ताकि हाई-परफॉर्मेंस ट्विन-इंजन फाइटर प्रोजेक्ट्स के लिए इंजन को-प्रोडक्शन किया जा सके. इस परियोजना के प्रस्तावों का मूल्यांकन DRDO करेगा और फिर रक्षा मंत्रालय को अपनी सिफारिशें देगा.

मौजूदा हालात में यह भी माना जा रहा है कि भारत अमेरिका के साथ हुए इंजन समझौते से हटकर नए विकल्प तलाश सकता है. जून 2023 में भारत ने अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) के साथ F414 इंजन के घरेलू उत्पादन के लिए समझौता किया था, जिसमें 80% तक तकनीकी हस्तांतरण का प्रावधान था. लेकिन हाल के भू-राजनीतिक तनावों ने भारत का भरोसा अमेरिका पर कमजोर कर दिया है. जापान की रक्षा कंपनियों ने बीते वर्षों में नौसैनिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं और अब वे एयरोस्पेस सेक्टर में भी अपनी तकनीकी क्षमता दिखाने को तैयार हैं. उदाहरण के तौर पर, जापानी कंपनी मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज ने ऑस्ट्रेलिया के साथ 6.5 अरब डॉलर का फ्रिगेट सौदा किया, जो उसकी रक्षा क्षमताओं का प्रमाण है.

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दूसरे विश्व युद्ध के बाद से जापान ने हथियारों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया था और अपनी रक्षा तकनीक का उपयोग केवल घरेलू सुरक्षा के लिए किया. हालांकि 2014 के बाद उसने इस नीति में बदलाव करना शुरू किया. 2016 में उसे बड़ा झटका तब लगा जब 35 अरब डॉलर का ऑस्ट्रेलियाई पनडुब्बी प्रोजेक्ट उसके हाथ से निकलकर फ्रांस को मिल गया. बाद में ऑस्ट्रेलिया ने फ्रांस को भी किनारे कर अमेरिका और ब्रिटेन के साथ AUKUS गठबंधन बनाया और परमाणु पनडुब्बी निर्माण की घोषणा की. लेकिन इस परियोजना में भी बाधाएं आईं, क्योंकि अमेरिका और ब्रिटेन ने कुछ महत्वपूर्ण तकनीक साझा करने से इनकार कर दिया, जिससे प्रगति धीमी हो गई.

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भारत और जापान के बीच पहले से ही मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं. जापान की मदद से भारत में बुलेट ट्रेन परियोजना पर काम चल रहा है. अगर दोनों देशों के बीच लड़ाकू विमान इंजन बनाने का समझौता होता है, तो यह उनकी रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करेगा. इसके अलावा, जापानी तकनीक हासिल करने से भारत की पश्चिमी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम होगी और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली अड़चनों से बचा जा सकेगा. अतीत में अमेरिका ने कई महीनों तक तेजस विमान के लिए इंजन की आपूर्ति नहीं की थी, जिससे उत्पादन पर असर पड़ा. जापान के साथ साझेदारी से भारत को ऐसी समस्याओं से राहत मिल सकती है और अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता को नई ऊंचाई तक ले जा सकता है.

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Aman Kumar Pandey

लेखक के बारे में

By Aman Kumar Pandey

अमन कुमार पाण्डेय डिजिटल पत्रकार हैं। राजनीति, समाज, धर्म पर सुनना, पढ़ना, लिखना पसंद है। क्रिकेट से बहुत लगाव है। इससे पहले राजस्थान पत्रिका के यूपी डेस्क पर बतौर ट्रेनी कंटेंट राइटर के पद अपनी सेवा दे चुके हैं। वर्तमान में प्रभात खबर के नेशनल डेस्क पर कंटेंट राइटर पद पर कार्यरत।

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