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क्या है Cord Blood Treatment, जानिए कैसे ठीक हुआ मिश्रित नस्ल की अमेरिकी महिला का HIV

Updated at : 17 Feb 2022 1:04 PM (IST)
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क्या है Cord Blood Treatment, जानिए कैसे ठीक हुआ मिश्रित नस्ल की अमेरिकी महिला का HIV

अमेरिका में ल्यूकेमिया की एक मरीज एचआईवी (HIV) को हराकर अब पूरी तरह स्वस्थ हो गयी हैं. मिश्रित नस्ल की इस महिला को गर्भनाल रक्त के उपयोग कर इलाज किया गया. शोधकर्ताओं का कहना है कि, स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के जरिए ही इस महिला का इलाज हुआ.

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अमेरिका में ल्यूकेमिया की एक मरीज एचआईवी (HIV) को हराकर अब पूरी तरह स्वस्थ हो गयी हैं. इसी के साथ वो एचआईवी को हराने वाली दुनिया की पहली महिला बन गई है. वो दुनिया की तीसरी ऐसी एचआईवी पेशेंट है जिसने इस लाइलाज बीमारी को हराकर ठीक हो गई हैं. मिश्रित नस्ल की इस महिला को गर्भनाल रक्त के उपयोग कर इलाज किया गया.

इससे पहले दुनिया के दो और ऐसे शख्स है जो अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण से ठीक हुए थे. दोनों प्रकार के प्रत्यारोपण में एक उत्परिवर्तन के साथ स्टेम सेल होते हैं जो एचआईवी को रोकते हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि, स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के जरिए ही इस महिला का इलाज हुआ. बता दें, यह स्टेम सेल एक ऐसे व्यक्ति ने दान किए थे जिसके अंदर एचआईवी वायरस के खिलाफ कुदरती प्रतिरोध क्षमता थी.

क्या है इलाज की ये नयी तकनीक : दरअसल, एचआईवी (HIV) से ग्रसित इस महिला का इलाज करने के लिए डॉक्टरों ने गर्भनाल के खून का इस्तेमाल किया. बोन मैरो ट्रांसप्लांट से इतर इस तकनीक में गर्भनाल के खून से लिये गये स्टेम सेल को डोनर से ज्यादा मिलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती है. बता दें, एचआईवी मरीजों के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट बेहतर विकल्प नहीं है. उनके लिए यह काफी खतरनाक होता है, इसलिए इससे उन्हीं लोगों का इलाज किया जाता है जो कैंसर से पीड़ित हों और कोई दूसरा रास्ता न बचा हो.

2013 में चला था एचआईवी का पता महिला को 2013 में एचआईवी का पता चला था. चार साल बाद, उसे ल्यूकेमिया का भी पता चला. इस ब्लड कैंसर का इलाज हैप्लो-कार्ड ट्रांसप्लांट के जरिये किया गया. ट्रांसप्लांट के दौरान एक करीबी रिश्तेदार ने भी महिला की इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए उसे ब्लड डोनेट किया. महिला का आखिरी ट्रांसप्लांट 2017 में हुआ था. पिछले चार सालों से वह ल्यूकेमिया से पूरी तरह ठीक हो चुकी है. ट्रांसप्लांट के तीन साल बाद डॉक्टरों ने उसका एचआईवी इलाज भी बंद कर दिया और वे अब तक किसी वायरस की चपेट में फिर से नहीं आयी हैं.

इलाज के दौरान सबसे पहले मरीज की कीमोथेरेपी की जाती है ताकि कैंसर कोशिकाओं को जड़ से खत्म किया जा सके. उसके बाद डॉक्टर विशेष जेनेटिक म्यूटेशन वाले व्यक्ति से स्टेमसेल लेकर उसे मरीज के शरीर में ट्रांसप्लांट करते हैं. रिसर्चर का मानना है कि इस ट्रांसप्लांट के बाद मरीजों में एचआईवी से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाती है.

Posted by: Pritish Sahay

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