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200 साल पुरानी मुनरो डोक्ट्रिन के बाद ट्रंप का नया 'डोनरो डोक्ट्रिन', जानिए क्यों दहशत में हैं लैटिन अमेरिका!

Updated at : 09 Jan 2026 7:18 PM (IST)
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Donroe Doctrine Trump Latin America Policy

डोनरो डोक्ट्रिन: ट्रंप की लैटिन अमेरिका पॉलिसी

Donroe Doctrine: डोनरो डॉक्ट्रिन, जो ट्रंप की लैटिन अमेरिका पॉलिसी का एक नया रूप है, मुनरो डॉक्ट्रिन का एक आधुनिक और आक्रामक वर्जन है. यह पश्चिमी गोलार्ध में राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य शक्ति दिखाने के अमेरिका के अधिकार पर जोर देता है. वेनेजुएला में मादुरो को गिरफ्तार करने की कोशिश और उसके तेल संसाधनों पर कंट्रोल पाने की कोशिश इसके मुख्य उदाहरण हैं. आलोचक इसे नव-उपनिवेशवाद की वापसी मानते हैं, जबकि अमेरिका इसे सुरक्षा और रणनीतिक हितों के नाम पर सही ठहराता है. यह पॉलिसी ग्लोबल कॉम्पिटिशन और अमेरिकी प्रभाव को दिखाने की कोशिश को दिखाती है.

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Donroe Doctrine: इस महीने की शुरुआत में ‘डोनरो डोक्ट्रिन’ शब्द सुर्खियों में आया, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे हवाले देते हुए वेनेजुएला में एक बड़े सैन्य अभियान की घोषणा की. इस अभियान में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी सेना ने हिरासत में लिया. डोनरो डोक्ट्रिन, पुराने मुनरो डोक्ट्रिन का आधुनिक और आक्रामक रूप माना जा रहा है, जिसे अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्ध में अपनी बढ़ती शक्ति और प्रभाव दिखाने के लिए पेश किया.

मुनरो डोक्ट्रिन और इसका इतिहास

मुनरो डोक्ट्रिन को सबसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने दिसंबर 1823 में (लगभग 200 साल पहले) कांग्रेस को अपने संदेश में पेश किया था. इसमें कहा गया कि अमेरिका (उत्तर, मध्य और दक्षिण अमेरिका) में अब यूरोपीय देशों को उपनिवेश (Colony) बनाने की अनुमति नहीं है और अगर कोई यूरोपीय देश स्वतंत्र अमेरिकी राष्ट्रों के मामलों में हस्तक्षेप करेगा, तो उसे अमेरिका के लिए खतरा माना जाएगा. डोक्ट्रिन ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका यूरोप की लड़ाइयों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन पश्चिमी गोलार्ध में नए बाहरी नियंत्रण का विरोध करेगा. 19वीं और 20वीं सदी तक मुनरो डोक्ट्रिन अमेरिकी विदेश नीति की बुनियाद रहा. बाद में इसे और आक्रामक रूप दिया गया, जैसे 1904 में रूजवेल्ट कोरोलरी ने अमेरिका को यह अधिकार दिया कि वह पश्चिमी गोलार्ध के देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर सके ताकि यूरोपीय प्रभाव रोका जा सके. 20वीं सदी में इसका उपयोग कई बार हुआ, जैसे 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट में, जब सोवियत मिसाइलों की मौजूदगी को अमेरिका ने अपने क्षेत्र में खतरा मानकर रोक दिया.

Donroe Doctrine in Hindi: डोनरो डोक्ट्रिन कोई औपचारिक नीति नहीं

डोनरो डोक्ट्रिन कोई औपचारिक नीति नहीं है, बल्कि ट्रंप और उनके सहयोगियों द्वारा पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका की वर्तमान आक्रामक नीति के लिए बनाया गया नाम है. ट्रंप ने इसे वेनेजुएला अभियान के बाद स्पष्ट रूप से संदर्भित किया और बताया कि यह पुराने मुनरो डोक्ट्रिन का आधुनिक और ज्यादा आक्रामक रूप है. इस सिद्धांत के अनुसार, अमेरिका को राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य रूप से किसी भी पश्चिमी गोलार्ध के क्षेत्र में अपनी शक्ति दिखाने का अधिकार है. इसमें ट्रंप कोरोलरी भी शामिल है, जो अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है. इसके तहत पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिका के प्रभाव का मुख्य क्षेत्र माना जाता है, बाहरी ताकतों को यहां प्रवेश से रोकने की बात कही जाती है और अमेरिकी सुरक्षा हितों के खतरे पर हस्तक्षेप को सही ठहराया जाता है.

ट्रंप प्रशासन ने इसे चीन और रूस जैसे वैश्विक ताकतों के साथ प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया. अमेरिका ने वेनेजुएला, ग्रीनलैंड और पनामा नहर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी प्राथमिकता को इस डोक्ट्रिन के माध्यम से स्पष्ट किया. (Donroe Doctrine Trump Latin America Policy in Hindi)

लैटिन अमेरिका: डोनरो का केंद्र

भौगोलिक नजदीकी, ऐतिहासिक रिश्ते और रणनीतिक संसाधनों की वजह से लैटिन अमेरिका डोनरो डोक्ट्रिन का मुख्य केंद्र है. जनवरी 2026 में वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई, जिसे व्हाइट हाउस ने ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व कहा, डोनरो डोक्ट्रिन के तहत अमेरिकी सुरक्षा और शक्ति प्रदर्शन का उदाहरण माना गया. ट्रंप प्रशासन ने इसे ड्रग तस्करी से लड़ने और वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार जैसे रणनीतिक ऊर्जा संसाधनों को हासिल करने के उद्देश्य से जोड़ा. विशेषज्ञों के अनुसार, यह दृष्टिकोण पिछले अमेरिकी प्रशासनों से अलग है, जिन्होंने अक्सर लैटिन अमेरिका नीति में साझेदारी और सहयोग को प्राथमिकता दी. डोनरो डोक्ट्रिन के तहत, जो देश अमेरिका के हितों के खिलाफ जाते हैं चाहे वह अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ गठबंधन के माध्यम से हो या आर्थिक नीति के कारण वे कूटनीतिक दबाव, प्रतिबंध या सीधे सैन्य कार्रवाई का सामना कर सकते हैं.

ट्रंप ने कोलंबिया, क्यूबा और मेक्सिको को निशाना बनाया

ट्रंप का वेनेजुएला पर सैन्य करवाई के बाद कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो को बीमार आदमी कहा, और दावा किया कि पेट्रो अमेरिका को कोकीन बनाते और बेचते हैं. ट्रम्प ने चेतावनी दी कि यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा और मिलिट्री कार्रवाई की संभावना का इशारा किया. ट्रम्प ने यह भी कहा कि क्यूबा कमजोर हो गया है, और वेनेजुएला से तेल और पैसे की सप्लाई बंद होने के कारण क्यूबा अब गिरने की कगार पर है. उन्होंने सुझाव दिया कि अमेरिका को शायद सीधे कार्रवाई करने की जरूरत भी न पड़े. ट्रम्प ने कहा कि मेक्सिको को अपने ड्रग कार्टेल को कंट्रोल करना होगा, नहीं तो अमेरिका कार्रवाई कर सकता है.

ट्रम्प ने ईरान और ग्रीनलैंड का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि अगर ईरान विरोधियों पर हमला किया तो अमेरिका जोरदार जवाब देगा. उन्होंने यह भी कहा कि ग्रीनलैंड राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है. इन टिप्पणियों पर संबंधित देशों से प्रतिक्रियाएं आईं, कोलंबिया के पेट्रो ने ट्रम्प की टिप्पणियों को अपने देश की संप्रभुता पर हमला बताया. वहीं क्यूबा ने वेनेजुएला के खिलाफ अमेरिका की कार्रवाई को स्टेट टेररिज्म कहा और डेनमार्क ने ग्रीनलैंड पर अमेरिका के दावे को खारिज कर दिया.

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया क्या है इस कारवाई को लेकर 

आलोचक मानते हैं कि ट्रंप का यह संस्करण अमेरिका को फिर से नव-उपनिवेशवाद (Neocolonialism) की ओर ले जा सकता है, जैसा कि अतीत में अमेरिका ने कई लैटिन अमेरिकी देशों में किया. लैटिन अमेरिकी सरकारों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रही हैं. कुछ देशों ने सुरक्षा कार्रवाई का संकोचपूर्ण समर्थन किया, जबकि अन्य ने इसे संप्रभुता का उल्लंघन और अंतरराष्ट्रीय कानून का हनन बताया. वैश्विक शक्तियों ने भी इस डोक्ट्रिन की आलोचना की, क्योंकि इससे उनके आर्थिक और सुरक्षा हित सीधे चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि अगर अमेरिका लैटिन अमेरिका को केवल अपने प्रभाव के क्षेत्र के रूप में दिखाता है, जबकि अन्य बड़े खिलाड़ी वहां आर्थिक और कूटनीतिक संबंध बनाए रखते हैं, तो यह नए भू-राजनीतिक तनाव को जन्म दे सकता है. डोनरो डोक्ट्रिन, मुनरो डोक्ट्रिन का आधुनिक संस्करण है, जो अमेरिकी रणनीतिक हितों को सर्वोपरि रखता है और अंतरराष्ट्रीय सहयोग या संप्रभुता के पुराने नियमों को अक्सर पीछे छोड़ देता है.

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Govind Jee

लेखक के बारे में

By Govind Jee

गोविन्द जी ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से की है. वे वर्तमान में प्रभात खबर में कंटेंट राइटर (डिजिटल) के पद पर कार्यरत हैं. वे पिछले आठ महीनों से इस संस्थान से जुड़े हुए हैं. गोविंद जी को साहित्य पढ़ने और लिखने में भी रुचि है.

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