America Operation Crested Ice: ग्रीनलैंड, दुनिया के नक्शे पर बर्फ से ढका एक शांत इलाका. लेकिन इसी बर्फ के नीचे ऐसा राज छुपा है, जो आज भी दुनिया की बड़ी ताकतों को बेचैन करता है. आज जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका के लिए जरूरी बता रहे हैं और कह रहे हैं कि अगर ध्यान नहीं दिया गया तो रूस और चीन कब्जा कर लेंगे, तब यह सवाल फिर उठ रहा है कि क्या ग्रीनलैंड सिर्फ जमीन का टुकड़ा है या फिर सुरक्षा का सबसे बड़ा मोहरा?
दरअसल, ग्रीनलैंड में अमेरिका की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है. अमेरिकी सेना यहां 70 साल से भी ज्यादा समय से जमी हुई है. एक वक्त ऐसा भी था, जब यहां न्यूक्लियर बम, लड़ाकू विमान और मिसाइल सिस्टम तक तैनात थे वो भी दुनिया की नजरों से दूर.
America Operation Crested Ice: अमेरिका की नजर ग्रीनलैंड पर क्यों टिकती रही?
ग्रीनलैंड, वॉशिंगटन डीसी और मॉस्को के बीच लगभग बराबर दूरी पर है. इसी वजह से यह अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम रहा है. अमेरिका ने 1946 में ही ग्रीनलैंड खरीदने की कोशिश की थी. 1951 में अमेरिका और डेनमार्क के बीच यूएस-डेनमार्क रक्षा समझौता हुआ. इस समझौते के बाद अमेरिका को ग्रीनलैंड की जमीन और हवाई इलाके में खुली छूट मिल गई. हालात ऐसे बन गए थे कि 1955 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा था कि अमेरिका ग्रीनलैंड में लगभग जो चाहे, वो कर सकता है.
डेनमार्क की नीति कुछ और हकीकत कुछ और
डेनमार्क की आधिकारिक नीति साफ थी कि शांतिपूर्ण समय में उसकी जमीन पर न्यूक्लियर हथियार नहीं रखे जाएंगे. यूरेशियन टाइम्स के मुताबिक, पर्दे के पीछे डेनमार्क ने अमेरिका को ग्रीनलैंड में न्यूक्लियर हथियार रखने की इजाजत दे दी थी. इस सीक्रेट समझौते की जानकारी ना ग्रीनलैंड के लोगों को थी, ना डेनमार्क की आम जनता को. सब कुछ बेहद गोपनीय तरीके से चल रहा था. 1953 में अमेरिका ने ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में थुले एयरबेस बनाना शुरू किया, जिसे आज पिटुफिक स्पेस बेस कहा जाता है. 1957 में डेनमार्क के तत्कालीन प्रधानमंत्री हांस क्रिश्चियन हैंसन ने चुपचाप अमेरिका को यहां न्यूक्लियर हथियार रखने की मंजूरी दे दी. 1958 में अमेरिका ने यहां एटम बम, थर्मोन्यूक्लियर बम और बाद में हवाई रक्षा मिसाइलों के लिए 48 न्यूक्लियर हथियार तैनात किए.
ऑपरेशन ‘क्रोम डोम’ शुरू हुआ
कोल्ड वॉर के दौर में अमेरिका को डर था कि कहीं सोवियत संघ अचानक हमला न कर दे. इसी डर से शुरू हुआ ऑपरेशन ‘क्रोम डोम’. इस योजना के तहत यह था कि हर वक्त न्यूक्लियर बम से लैस अमेरिकी विमान हवा में रहते थे. ग्रीनलैंड के ऊपर से रोज दो बार न्यूक्लियर उड़ानें होती थीं. थुले एयरबेस के ऊपर एक विमान लगातार चक्कर लगाता रहता था, ताकि हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके.
Reupping this. This isn't the first time we've betrayed Greenland. In 1968 we crashed a B-52 with nuclear weapons we said weren't on board, contaminated that country, and killed hundreds of workers. https://t.co/rV78X8alaK
— John Jackson (@hissgoescobra) January 5, 2026
21 जनवरी 1968 ग्रीनलैंड की जमी हुई समुद्री बर्फ पर क्रैश हो गया
21 जनवरी 1968 को अमेरिका का एक B-52G परमाणु बॉम्बर विमान, जिसमें चार न्यूक्लियर बम थे, ग्रीनलैंड की जमी हुई समुद्री बर्फ पर क्रैश हो गया. यूरेशियन टाइम्स के अनुसार, हादसा मानवीय गलती की वजह से हुआ. विमान के अंदर हीटर के पास रखे फोम में आग लग गई. आग तेजी से फैल गई और कॉकपिट धुएं से भर गया. हालात ऐसे हो गए कि विमान को उतारना संभव नहीं था और विमान क्रैश हो गया जिसमें 7 में से 6 क्रू मेंबर बच गए और एक की मौत हो गई.
विमान थुले एयरबेस से करीब 7 मील दूर गिरा हादसे में न्यूक्लियर बम फटे नहीं, लेकिन उनके अंदर मौजूद रेडियोधर्मी पदार्थ बर्फ पर फैल गए. मीलों तक बर्फ जहरीली हो गई. यह ग्रीनलैंड के इतिहास की सबसे बड़ी पर्यावरणीय घटनाओं में से एक मानी जाती है. यह हादसा डेनमार्क के चुनाव से सिर्फ 48 घंटे पहले हुआ था. अमेरिकी दूतावास को डर था कि अगर यह बात सामने आई, तो डेनमार्क में बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा हो जाएगा. (B-52 Nuclear Bomber Crashed in Greenland in Hindi)
America Operation Crested Ice in Hindi: अमेरिका मलबा को समुद्र में डुबोना चाहता था
हादसे के बाद डेनमार्क ने अमेरिका पर दबाव डाला कि विमान का पूरा मलबा और रेडिएशन से दूषित बर्फ ग्रीनलैंड से हटाई जाए. अमेरिका पहले मलबा समुद्र में डुबोना चाहता था, लेकिन थुले एयरबेस बचाने के लिए उसे डेनमार्क की शर्त माननी पड़ी. इसके बाद शुरू हुआ ऑपरेशन ‘क्रेस्टेड आइस’. दूषित बर्फ को काटकर सीलबंद टैंकों में भरा गया और अमेरिका भेजा गया.
एक न्यूक्लियर हिस्सा आज भी नहीं मिला
सफाई के दौरान एक न्यूक्लियर बम का अहम हिस्सा, जिसमें यूरेनियम और अन्य तत्व थे, कभी नहीं मिला. विशेषज्ञों का कहना है कि यह हिस्सा अपने आप फट नहीं सकता, लेकिन माना जाता है कि वह आज भी ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे कहीं दबा हुआ है. करीब 60 साल पुरानी यह घटना बताती है कि ग्रीनलैंड हमेशा से अमेरिका की सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा रहा है पहले नाजियों के खिलाफ, फिर सोवियत संघ के खिलाफ और अब चीन और रूस के बढ़ते असर के बीच. आज जब ग्रीनलैंड को लेकर बयानबाजी तेज है, तब यह कोल्ड वॉर का किस्सा याद दिलाता है कि आर्कटिक की बर्फ के नीचे सिर्फ बर्फ नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे खतरनाक सच्चाइयां भी दबी हुई हैं.
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