लुटियंस दिल्ली में एक स्मारक अनाम मजदूरों का हो

लुटियंस दिल्ली
Lutyens Delhi : यह उनकी सादगी, मानवीयता और नि:स्वार्थ सेवा का जीता-जागता प्रमाण है. समय बदल गया है. आज राजस्थान से दिल्ली में मजदूर कम आते हैं. जो तब आये थे, वे दिल्ली का अभिन्न अंग बन गये.
Lutyens Delhi : राष्ट्रपति भवन में ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की मूर्ति हटाकर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की मूर्ति लगायी गयी है. यह कदम औपनिवेशिक सोच से बाहर निकलकर भारतीय विरासत को सम्मान देने की दिशा में एक संकेत माना जा रहा है. पर केवल प्रतीक बदल देने से बात पूरी नहीं हो जाती. हमें उन लोगों को भी याद करना चाहिए, जिन्होंने इन ऐतिहासिक भवनों को अपने हाथों से बनाया. नयी दिल्ली का निर्माण 1911 से 1931 के बीच हुआ, जब अंग्रेजों ने राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली लाने का निर्णय किया. उस समय लुटियंस मुख्य वास्तुकार थे और उनके साथ हर्बर्ट बेकर भी काम कर रहे थे. पर इन भव्य इमारतों को खड़ा करने का असली काम तो हजारों भारतीय मजदूरों ने किया था. निर्माण के दौरान करीब 30,000 श्रमिक दिन-रात मेहनत कर रहे थे, जिनमें सैकड़ों कुशल संगतराश भी शामिल थे.
ये मजदूर ज्यादातर राजस्थान के जयपुर, जोधपुर और भीलवाड़ा जैसे क्षेत्रों से आये थे. वे अपने परिवारों के साथ गांव छोड़कर दिल्ली पहुंचे और वहां अस्थायी बस्तियों में रहने लगे. उनकी मजदूरी बहुत कम थी- पुरुषों को एक रुपया रोज और महिलाओं को आधा रुपया, यानी अठन्नी. कम मेहनताना होने के बावजूद उन्होंने पूरी लगन से काम किया और भव्य इमारतों को आकार दिया. पत्थरों पर बारीक नक्काशी करने वाले कई संगतराश आगरा, मिर्जापुर और भरतपुर से आये थे. उनके पूर्वज ताजमहल, लाल किला और जामा मस्जिद जैसे ऐतिहासिक स्मारकों के निर्माण में योगदान दे चुके थे. नयी दिल्ली की शान केवल मानचित्रों से नहीं, बल्कि इन मेहनतकश हाथों की मेहनत से बनी है. कम मजदूरी के बावजूद इन सीधे-सादे लोगों ने दिन-रात अथक मेहनत की. यहां काम कर रहे संगतराश पत्थरों पर नक्काशी, जालियां और बारीक काम में निपुण थे. राष्ट्रपति भवन के भव्य स्तंभ, संसद भवन की गोलाकार संरचना, नॉर्थ-साउथ ब्लॉक की शानदार नक्काशी- सबमें इन कारीगरों की कला और कौशल साफ दिखाई देता है. इन कारीगरों ने लाखों ईंटों और बड़ी मात्रा में पत्थरों से शानदार इमारतें खड़ी की थीं.
इन भवनों के निर्माण में भारतीय ठेकेदारों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं थी. संसद भवन (तब काउंसिल हाउस या लेजिस्लेटिव चैंबर्स) के मुख्य ठेकेदार लक्ष्मण दास सिंध के थे. खुशवंत सिंह ने उन्हें ‘सच्चाई और नेकनीयती की मिसाल’ बताया है. लक्ष्मण दास ने कभी घटिया सामग्री इस्तेमाल नहीं की, मजदूरों को समय पर वेतन दिया और टैक्स में कभी कोई चोरी नहीं की. खुशवंत सिंह ने जितनी प्रशंसा लक्ष्मण दास की की है, उतनी प्रशंसा अपने पिता सर शोभा सिंह या अन्य ठेकेदारों की नहीं की, जबकि शोभा सिंह ने भी नयी दिल्ली की कई इमारतों का निर्माण किया था. लक्ष्मण दास मजदूरों के साथ घुल-मिलकर रहते थे, उनकी परेशानियां समझते थे. संसद भवन के उद्घाटन के समय लक्ष्मण दास मौजूद थे. उनका मिशन पूरा हो चुका था, इसका उन्हें संतोष था. पर उन्होंने नयी दिल्ली में कोई नया प्रोजेक्ट नहीं लिया. वह सिंध भी नहीं लौटे, हरिद्वार जाकर साधु बन गये, वहीं उनका निधन हुआ.
यह उनकी सादगी, मानवीयता और नि:स्वार्थ सेवा का जीता-जागता प्रमाण है. समय बदल गया है. आज राजस्थान से दिल्ली में मजदूर कम आते हैं. जो तब आये थे, वे दिल्ली का अभिन्न अंग बन गये. उनके वंशज अब विभिन्न क्षेत्रों में सफल हैं- कई सामाजिक-आर्थिक रूप से मजबूत हैं, यहां तक कि मंत्री पद तक पहुंचे. जैसे, मदन लाल खुराना सरकार में सुरेंद्र रातावाल मंत्री थे, जिनके दादा और रिश्तेदारों ने संसद भवन बनाया था. रातावाल को इस विरासत पर गर्व है. आने वाली पीढ़ियां भी नयी ऊंचाइयां छू रही हैं और छुएंगी. राजधानी में आजकल सेंट्रल विस्टा और अन्य परियोजनाओं को पूरा करने के लिए हजारों मजदूर आये हुए हैं. ये एक प्रोजेक्ट के खत्म होने के बाद अगले प्रोजेक्ट से जुड़ जाते हैं. ये ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ से हैं. दिल्ली के पुराने लोगों को याद होगा कि यहां पर 1982 के एशियाई खेलों के समय बहुत बड़ी तादाद में मजदूर आये थे. तब बिहार से काफी तादाद में मजदूर आये थे. अब बिहार से आने वाले मजदूरों की संख्या निश्चित रूप से बहुत कम हुई है.
अब आते हैं मूल प्रश्न पर. क्या हम उन अज्ञात मजदूरों, संगतराशों और ठेकेदारों, जैसे लक्ष्मण दास, की याद में एक स्मारक नहीं बना सकते? राष्ट्रपति भवन या संसद भवन के आसपास, या किसी सार्वजनिक स्थान पर, जो इन लाखों हाथों को समर्पित हो. यह सिर्फ पत्थर नहीं होगा, बल्कि उन मेहनतकशों का प्रतीक होगा जिन्होंने नयी दिल्ली को खड़ा किया. लुटियंस की मूर्ति हटाना औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति है, पर असली मुक्ति तब होगी जब हम उन भारतीयों को याद करेंगे, जिन्होंने असल में यह शहर बनाया. ऐसा स्मारक बनाने से इतिहास के उन पन्नों को सम्मान मिलेगा, जो अक्सर अनदेखे रह जाते हैं. आने वाली पीढ़ियां जानेंगी कि राजधानी की भव्यता सिर्फ डिजाइन से नहीं, उन मजदूरों के पसीने, बलिदान और कौशल से बनी है. सरकार, समाज और इतिहासकार मिलकर इस दिशा में कदम उठायें. यह हमारा नैतिक दायित्व है, क्योंकि सच्ची आजादी तब पूरी होती है, जब हम अपने असली नायकों को श्रद्धांजलि देते हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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