सिजेरियन प्रसव में नहीं आ रही है कमी

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 03 Jun 2026 12:20 PM

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NFHS -6 की रिपोर्ट सिजेरियन प्रसव के मामले कम नहीं हुए.

cesarean deliveries : नवीनतम सर्वेक्षण एनएफएचएस-5 (2019-21) की तुलना में मातृ स्वास्थ्य, बाल टीकाकरण और पोषण में व्यापक स्तर पर हुए सुधारों की ओर इशारा करता है. जैसे, संस्थागत प्रसव 90.6 फीसदी (88.6 फीसदी से बढ़कर) तक पहुंच गया, प्रसवपूर्व देखभाल का दायरा बढ़कर 95.9 फीसदी (92.6 प्रतिशत से) हो गया, और स्किल्ड बर्थ अटेंडेंस में 91.3 फीसदी तक सुधार हुआ.

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-उम्मन सी कुरियन, सीनियर फेलो व हेड
हेल्थ इनिशिएटिव, ओआरएफ-

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 29 मई को नवीनतम एनएफएचएस (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण)-6 (2023-24) के फैक्ट शीट जारी किये, जिसमें 715 जिलों के करीब 6.79 लाख परिवारों को शामिल किया गया है. नवीनतम सर्वेक्षण एनएफएचएस-5 (2019-21) की तुलना में मातृ स्वास्थ्य, बाल टीकाकरण और पोषण में व्यापक स्तर पर हुए सुधारों की ओर इशारा करता है. जैसे, संस्थागत प्रसव 90.6 फीसदी (88.6 फीसदी से बढ़कर) तक पहुंच गया, प्रसवपूर्व देखभाल का दायरा बढ़कर 95.9 फीसदी (92.6 प्रतिशत से) हो गया, और स्किल्ड बर्थ अटेंडेंस में 91.3 फीसदी तक सुधार हुआ. बारह-तेईस महीने की उम्र के बच्चों में पूर्ण टीकाकरण कवरेज कार्ड-आधारित अनुमानों पर 87.1 प्रतिशत तक पहुंच गया, जिसमें रोटावायरस टीकाकरण 36.4 फीसदी के दोगुने से भी अधिक बढ़कर 85.4 प्रतिशत हो गया. हालांकि कई संकेतक चिंताजनक हैं.


छह महीने से कम उम्र के शिशुओं में केवल स्तनपान 63.7 फीसदी से घटकर 55.8 फीसदी रह गया. सार्वजनिक सुविधाओं में होने वाले संस्थागत जन्मों की हिस्सेदारी 61.9 प्रतिशत से घटकर 58.6 फीसदी रह गयी, जो समग्र संस्थागत प्रसव दरों में वृद्धि के बावजूद निजी प्रसव देखभाल के प्रति झुकाव को दर्शाता है. सिजेरियन सेक्शन (सी-सेक्शन) की दर 21.5 फीसदी से बढ़कर 27.2 फीसदी हो गयी, जो डब्ल्यूएचओ द्वारा अनुशंसित सीमा से काफी ऊपर है. आधुनिक गर्भनिरोधकों का उपयोग 56.4 फीसदी से घटकर 52.7 फीसदी रह गया. अधिक वजन, मोटापे से ग्रस्त महिलाओं की हिस्सेदारी 24.0 फीसदी से बढ़कर 30.7 फीसदी और पुरुषों की 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 27.3 फीसदी हो गयी.

पिछले दो दशकों में देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बदलाव उन हस्तक्षेपों से उभरे हैं, जो स्वास्थ्य मंत्रालय के औपचारिक दायरे से बाहर थे : जैसे पेयजल, स्वच्छता, पोषण, सड़क तक पहुंच, स्वच्छ ऊर्जा, स्त्री शिक्षा, वित्तीय समावेशन और खाद्य सुरक्षा आदि. एनएफएचएस स्वास्थ्य और संबद्ध विषयों पर भारत की जानकारी के प्रमुख स्रोतों में से एक है और एनएफएचएस-5 में उपलब्ध कई संकेतकों को इस बार हटाने के स्वास्थ्य मंत्रालय के फैसले पर बहस जारी है. उम्मीद है कि एक बार विस्तृत रिपोर्ट, प्रश्नावली और यूनिट स्तर के डाटा जारी होने के बाद इन सभी सवालों के जवाब मिल जायेंगे.


वर्ष 2005-06 से 2023-24 तक के चारों सर्वेक्षण दौरों में वयस्कों में शैक्षिक प्राप्ति में लगातार सुधार हुआ है. दस या अधिक वर्षों की स्कूली शिक्षा प्राप्त 15-49 वर्ष की महिलाओं की हिस्सेदारी 2005-06 में 22.3 फीसदी से बढ़कर 2023-24 में 46.4 फीसदी हो गयी, जो दो दशकों में दोगुनी से भी अधिक है. पुरुषों के लिए संबंधित आंकड़ा, जो एनएफएचएस-4 के बाद से उपलब्ध है, 47.1 फीसदी से बढ़कर 54.6 फीसदी हो गया. स्कूली शिक्षा में लैंगिक अंतर हालांकि कम हो रहा है, फिर भी काफी बड़ा बना हुआ है, और जैसे-जैसे इसमें सुधार और समानता आयेगी, देश में स्वास्थ्य के और भी अधिक लाभ अनलॉक होंगे.

बच्चों के कुपोषण में धीरे-धीरे सुधार हुआ है, जिसमें नाटापन 2005-06 और 2023-24 के बीच 48.0 फीसदी से गिरकर 29.3 फीसदी रह गया है, जो लगभग 20 प्रतिशत अंकों की कमी है और यह मातृ पोषण, स्वच्छता और बाल आहार प्रथाओं में संचयी सुधारों को दर्शाती है. कमजोरी और कम वजन क्रमशः 19.0 फीसदी और 31.8 फीसदी के साथ स्वीकार्य सीमाओं से काफी ऊपर बने हुए हैं, जो गंभीर और दीर्घकालिक खाद्य असुरक्षा की की ओर इशारा करते हैं. वर्ष 2019-21 में केवल स्तनपान का 63.7 फीसदी से घटकर 2023-24 में 55.8 फीसदी होना चिंताजनक गिरावट है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है. वयस्कों में, 2019-21 के बाद से बीएमआइ वितरण के दोनों छोर खराब हो गये हैं. यह एक ऐसा बदलाव है, जो पारंपरिक कुपोषण के दायरे से परे नीतिगत प्रतिक्रियाओं की मांग करता है. यह तो स्पष्ट है कि पिछले दो दशकों में जीवन स्तर में लगातार सुधार देखा गया है.

एनएफएचएस और अन्य आधिकारिक स्रोतों का उपयोग कर ट्रैक किये गये आंकड़ों के अनुसार बिजली, पेयजल और स्वच्छता तक पहुंच का काफी विस्तार हुआ है. घरेलू बिजली की पहुंच 67.9 फीसदी से बढ़कर 98.3 फीसदी हो गयी, और बेहतर पेयजल कवरेज 87.6 फीसदी से बढ़कर 96.5 प्रतिशत हो गया. हालांकि खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन का उपयोग, जो 2022-23 में 63.4 फीसदी था, अब भी काफी पीछे है, और ग्रामीण कवरेज 50 फीसदी से नीचे है. इन विकासों के समानांतर परिवारों में स्वास्थ्य बीमा कवरेज 2005-06 के 4.8 फीसदी से बढ़कर 2023-24 में 60.2 प्रतिशत हो गया. यह एक ऐसा बदलाव है जो काफी हद तक सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित योजनाओं, जैसे कि हाल ही में आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाइ द्वारा संचालित है. इसी अवधि के दौरान महिलाओं के स्वामित्व वाले बैंक खाते, जिनका वे स्वयं उपयोग करती हैं, 15.1 फीसदी से बढ़कर 89.0 प्रतिशत हो गये, जो जन-धन वित्तीय समावेशन अभियान और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण संरचना, दोनों को दर्शाता है.


ये दोनों संकेतक मिलकर उन संस्थागत व्यवस्थाओं में सार्थक लाभ का सुझाव देते हैं, जो परिवारों को अत्यधिक स्वास्थ्य व्यय से बचाते हैं. एनएफएचएस के परिणाम बताते हैं कि 2005-06 के बाद से पुरुषों और महिलाओं, दोनों में तंबाकू के उपयोग में गिरावट आयी है. दो दशकों में पुरुषों में इसका प्रसार 57.0 फीसदी से गिरकर 36.3 प्रतिशत रह गया है, हालांकि यह किसी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य मानक के अनुसार उच्च बना हुआ है. पुरुषों में शराब का सेवन भी 31.9 फीसदी से घटकर 18.9 प्रतिशत हो गया है, जबकि महिलाओं का स्तर सभी मानकों पर कम बना हुआ है. भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य समुदाय के लिए एनएफएचएस-6 के निष्कर्ष एक मिला-जुला परिणाम प्रस्तुत करते हैं. भले ही ऐतिहासिक सुधारों का विस्तार हो रहा है, लेकिन स्तनपान, सिजेरियन दर और वयस्क कुपोषण के दोहरे बोझ को लेकर नयी चिंताएं पैदा हो रही हैं. इसके साथ ही, अन्य सरकारी प्रणालियों के साथ डाटा सामंजस्य के आधार पर पिछले दौरों में उपलब्ध कई संकेतकों को हटाना, एक ऐसी शृंखला की निरंतरता पर सवाल उठाता है, जो मुख्य रूप से दीर्घकालिक तुलनीयता से अपना मूल्य प्राप्त करती है. हालांकि, आने वाले हफ्तों में यूनिट स्तर का डाटा प्रसारित होने के बाद स्थिति स्पष्ट हो जायेगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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Rajneesh Anand

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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