शारदीय नवरात्र सातवां दिन : ऐसे करें कालरात्रि दुर्गा की पूजा
Updated at : 27 Sep 2017 6:16 AM (IST)
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‘जिनका रूप विकराल है, जिनकी आकृति और विग्रह कृष्ण कमल सदृश है तथा जो भयानक अट्टहास करनेवाली हैं, वे कालरात्रि देवी दुर्गा मंगल प्रदान करें.’ दस महाविद्याओं की महिमा-7 दस महाविद्याओं में षोड़शी माहेश्वरी शक्ति की सबसे मनोहर श्रीविग्रहवाली सिद्द विद्यादेवी हैं. उनकी अंगकान्ति उदीयमान सूर्यमंडल की आभा की तरह है. उनकी चार भुजाएं एवं […]
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‘जिनका रूप विकराल है, जिनकी आकृति और विग्रह कृष्ण कमल सदृश है तथा जो भयानक अट्टहास करनेवाली हैं, वे कालरात्रि देवी दुर्गा मंगल प्रदान करें.’
दस महाविद्याओं की महिमा-7
दस महाविद्याओं में षोड़शी माहेश्वरी शक्ति की सबसे मनोहर श्रीविग्रहवाली सिद्द विद्यादेवी हैं. उनकी अंगकान्ति उदीयमान सूर्यमंडल की आभा की तरह है. उनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं. शांत मुद्रा में लेटे हुए सदाशिव पर स्थित कमल के आसन पर विराजिता षोड़शी देवी के चारों हाथों में पाश, अकुंश, धनुष और वाण सुशोभित है. वर देने के लिए सदा-सर्वदा उद्यत उन भगवती का श्रीविग्रह सौम्य और हृदय दया से आपुरित है.
शास्त्र के अनुसार जो उनका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं, उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रह जाता. वस्तुतः उनकी महिमा अवर्णनीय है. संसार के समस्त मंत्र-तंत्र उनकी आराधना करते हैं. वेद भी उनका वर्णन नहीं कर पाते. उनकी कृपा का एक कण भी मनुष्य को अभीष्ट से अधिक प्रदान करने में समर्थ है.
दस महाविद्याओं की उपासना में सृष्टिक्रम की उपासना लोकग्राह्य है. इसमें भुवनेश्वरी को प्रधान माना गया है. देवीभागवत के अनुसार सदाशिव फलक हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र और ईश्वर उस फलक या श्रीमंच के पाये हैं. इस श्रीमंच पर भुवनेश्वरी के साथ भुवनेश्वर विद्यमान हैं.
देवी का स्वरूप ह्लीं इस बीजमंत्र में सर्वदा विद्यमान है, जिसे देवी भागवत में देवी का प्रणव कहा गया है. जगदंबा भुवनेश्वरी का स्वरूप सौम्य और अंगकान्ति अरूण है. भक्तों को अभय एवं समस्त सिद्धियां प्रदान करना उनका स्वाभाविक गुण है. शास्त्रों में इनकी अपार महिमा बतायी गयी है.
महाशक्ति त्रिपुरसुंदरी महादेव की स्वरूपा-शक्ति हैं. कालिका पुराण के अनुसार शिवजी की भार्जा त्रिपुरा श्रीचक्र की परम नायिका है.प रम शिव इन्हीं के सहयोग से सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और स्थूल-से-स्थूल रूपों में भासते हैं.
त्रिपुर भैरवी महात्रिपुरसुंदरी की रथवाहिनी है, ऐसा उल्लेख मिलता है. इन्द्रियों पर विजय और सर्वतः उत्कर्ष तथा हर क्षेत्र में विजय की प्राप्ति के लिए महाशक्ति स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरसुंदरी की उपासना का विधान शास्त्रों में कहा गया है. (क्रमशः)
प्रस्तुति : डॉ एन के बेरा
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