महाकुंभ की संस्कृति

Updated at : 10 Feb 2019 2:29 AM (IST)
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महाकुंभ की संस्कृति

कुंभ मेला को यूनेस्को ने विश्व का विशालतम मानवीय सांस्कृतिक समागम माना है. विवेकानंद तिवारी की भारतीय संस्कृति में गहरी रुचि रही है. हाल में आयी अपनी किताब ‘सनातन-समागम महकुंभ’ में विवेकानंद ने बारह लेखों के जरिये कुंभ, अर्द्धकुंभ से होते हुए इस महाकुंभ के इतिहास-भूगोल का पूर्ण वृत्तांत रखा है. लेखक का मानना है […]

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कुंभ मेला को यूनेस्को ने विश्व का विशालतम मानवीय सांस्कृतिक समागम माना है. विवेकानंद तिवारी की भारतीय संस्कृति में गहरी रुचि रही है. हाल में आयी अपनी किताब ‘सनातन-समागम महकुंभ’ में विवेकानंद ने बारह लेखों के जरिये कुंभ, अर्द्धकुंभ से होते हुए इस महाकुंभ के इतिहास-भूगोल का पूर्ण वृत्तांत रखा है.
लेखक का मानना है कि भारतीय परंपरा में न केवल कुंभ पर्व अपितु प्रत्येक पर्वों का आरंभ वैदिक काल से माना जाता है. वेद अनादि और अनंत है, अतः भारतवर्ष के सभी पर्व सृष्टि के आदि से ही आरंभ माने जाते हैं.
लेखक अपने संशय को वैज्ञानिक दृष्टि से नहीं रख पाता और एक प्रचलित उपकथा का जिक्र करता है, ‘समुद्र-मंथन से तेरह रत्नों के पश्चात चौदहवां रत्न अमृत निकला. कुंभ (घड़ा) अमृत से भरा था. इस अमृतकलश को धन्वंतरि लेकर प्रकट हुए. धन्वंतरि के हाथ से अमृतकलश को छीन कर बृहस्पति भागे.
क्रोधित असुरों ने उनका चार स्थानों पर संघर्ष किया.’ उस संघर्ष के स्थान थे- गोदावरी के तट पर (नासिक), क्षिप्रा नदी के तट पर (उज्जैन), गंगा नदी के किनारे (हरिद्वार) और गंगा-यमुना के संगम पर (प्रयागराज). इन्हीं चारों स्थान पर बारह वर्ष पर कुंभ और छह वर्ष पर अर्द्धकुंभ का आयोजन होता है.
‘कुंभ मेलों की अनिष्ट घटनाएं’ लेख में साल 1954 में कुंभ मेले में मौनी अमावस्या के दिन फोटोग्राफर की आंखों से घटना का जो जिक्र हुआ है, वह भारतीय पत्रकारिता का जहां उज्ज्वल पक्ष है, वहीं तत्कालीन सत्ता की हृदयहीनता की कहानी भी है. इस किताब में शामिल लेखों में नागा संन्यासी और अखाड़े, बौद्ध धर्म में कुंभ माहात्म्य और कुंभ स्नान और प्रदूषण आदि पर महत्वपूर्ण जानकारियां हैं.
महर्षियों की बनायी सामाजिक व्यवस्था में धर्म की मर्यादा की रक्षा का, विधर्मियों को समुचित उत्तर देने के लिए तथा समाज में व्याप्त धर्म संबंधित गलत धारणाओं को दूर करने के लिए यह भार श्रेष्ठ ज्ञानी संतों, महात्माओं तथा संन्यासियों को सौंपा गया था.
इन्हीं में से नागा संन्यासियों ने समय-समय पर भारतवर्ष में आगत विधर्मियों का सामना किया और धर्म की रक्षा की. जाहिर है, महाकुंभ में शामिल हो पुण्य कमाने की लालसा हर हिंदू के मन में रहती है.
यह किताब महाकुंभ की खूबियां-खामियां भी बताती है. सस्ता साहित्य मंडल से छपी यह किताब सांस्कृतिक अभरुचि वाले पाठकों के लिए अत्यंत लाभकारी है.
– मनोज मोहन
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