ब्रिटिश काल से अबतक कायम है UPSC सिविल सेवा परीक्षा का क्रेज, ये थे पहले सफल भारतीय
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 22 Jan 2025 5:16 PM
सिविल सेवा परीक्षा का क्रेज
UPSC : यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा का क्रेज हमारे देश में किस कदर है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जब किसी बच्चे का जन्म होता है तो उसे आशीर्वाद देने वाले गीतों के बोल ऐसे होते हैं -बबुआ हमार डीएम होइहे.बिहार जैसे राज्यों में तो हर माता-पिता यह चाहते हैं कि उनका बच्चा आईएएस बने
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UPSC : यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 के लिए आवेदन की प्रक्रिया जल्दी ही शुरू होने वाली है. यूपीएससी सिविल सेवा को देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में से एक माना जाता है. इस सेवा के जरिए भारतीय विदेश सेवा, भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा सहित अन्य सेवाओं में भर्ती की जाती है.
क्या है यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन लोक सेवा आयोग यानी Union Public Service Commission (UPSC) करता है. यह परीक्षा वर्ष में एक बार आयोजित की जाती है. इस परीक्षा के जरिए केंद्रीय और राज्य स्तरीय प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति होती है.यह परीक्षा तीन चरणों में आयोजित की जाती है -1. प्रारंभिक परीक्षा, 2. मुख्य परीक्षा 3. साक्षात्कार. यह परीक्षा प्रति वर्ष आयोजित की जाती है. प्रारंभिक परीक्षा ऑब्जेक्टिव टाइप होती है, जिसमें दो पेपर होते हैं. पेपर 1 में सामान्य अध्ययन के सवाल पूछे जाते हैं, जबकि पेपर 2 में सिविल सेवा योग्यता परीक्षा जिसे CSAT कहा जाता है उससे संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं. मुख्य परीक्षा का फार्मेट निबंध जैसा होता है इसमें नौ पेपर होते हैं, जिसमें दो पेपर क्वालीफाइंग होते हैं और केवल सात के अंक गिने जाते हैं. तीसरी परीक्षा इंटरव्यू होती है जिसमें व्यक्ति के व्यक्तित्व का आकलन किया जाता है और सफल उम्मीदवार की तलाश की जाती है.
पहले लंदन में होती थी सिविल सेवा परीक्षा
सिविल सेवा परीक्षा की शुरुआत देश में अंग्रेजों के समय हुई थी.भारत में जब अंग्रेजों का शासन था तो ईस्ट इंडिया कंपनी के सिविल सेवकों की नियुक्ति कंपनी के निदेशकों द्वारा किया जाता था. उन्हें लंदन के हैलीबरी कॉलेज में ट्रेनिंग दी जाती थी और फिर भारत भेजा जाता था.लेकिन 1854 में ब्रिटिश संसद की प्रवर समिति की लॉर्ड मैकाले की रिपोर्ट के बाद योग्यता आधारित परीक्षा शुरू हुई. 1854 में लंदन में सिविल सेवा आयोग की स्थापना की गई थी और 1855 से परीक्षा की शुरुआत हुई. इस परीक्षा को इस तरह डिजाइन किया गया था कि यह भारतीयों के लिए बहुत मुश्किल थी और इस परीक्षा का आयोजन भी लंदन में ही होता था.इस परीक्षा के लिए योग्य उम्मीदवारों की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और अधिकतम 23 वर्ष निर्धारित की गई थी.
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सत्येंद्रनाथ टैगोर पहले भारतीय आईएएस थे

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर 1864 में सिविल सेवा परीक्षा में पास होने वाले पहले भारतीय थे. उनके पास होने के तीन बाद चार अन्य भारतीय भी इस परीक्षा में सफल हुए. इसके बाद भारतीयों ने देश में परीक्षा आयोजित करने के लिए याचिका दायर की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. इसकी वजह यह थी कि अंग्रेज यह नहीं चाहते थे कि इस परीक्षा में भारतीय ज्यादा सफल हों. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1922 से भारतीय सिविल सेवा परीक्षा भारत में आयोजित की जाने लगी. शुरुआत में इलाहाबाद से परीक्षाएं आयोजित की गईं बाद में जब संघीय लोक सेवा आयोग की स्थापना दिल्ली में हुई तो परीक्षाएं यहां से नियंत्रित होने लगीं. 26 जनवरी, 1950 को जब देश में संविधान लागू हुआ तो संघीय लोक सेवा आयोग को संघ लोक सेवा आयोग के नाम से जाना जाने लगा .
प्रतिवर्ष 10 लाख करते हैं सिविल सेवा परीक्षा के लिए आवेदन
सिविल सेवा परीक्षा का ग्लैमर देश में इतना ज्यादा है प्रति वर्ष लगभग 10 लाख लोग इस परीक्षा के लिए आवेदन करते हैं. लेकिन औसतन पास करने वालों की संख्या महज 0.2% है. इस परीक्षा को देश के ही नहीं, विश्व के सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक माना जाता है. सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले उम्मीदवारों को उनकी रैंकिंग के आधार पर निम्न सेवाओं के लिए चुना जाता है-
- भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS)
- भारतीय पुलिस सेवा (IPS)
- केंद्रीय सिविल सेवाएं (समूह A)
- भारतीय विदेश सेवा (IFS)
- भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा सेवा (IA&AS)
- भारतीय सिविल लेखा सेवा (ICAS)
- भारतीय कॉर्पोरेट कानून सेवा (ICLS)
- भारतीय रक्षा लेखा सेवा (IDAS)
- भारतीय रक्षा संपदा सेवा (IDES)
- भारतीय सूचना सेवा (IIS)
- भारतीय डाक सेवा (IPoS)
- भारतीय P&T लेखा और वित्त सेवा (IP&TAFS)
- भारतीय रेलवे सुरक्षा बल सेवा (IRPFS)
- भारतीय राजस्व सेवा (IRS-IT)
- भारतीय राजस्व सेवा (IRS-C&CE)
- भारतीय व्यापार सेवा (ITrS)
- भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा (IRMS)
- केंद्रीय सिविल सेवाएं (समूह B)
- सशस्त्र सेना मुख्यालय सिविल सेवाएं (AFHCS)
- दिल्ली, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह सिविल सेवा (DANICS)
- दिल्ली, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पुलिस सेवा (DANIPS)
- पांडिचेरी सिविल सेवा (PCS)
- पांडिचेरी पुलिस सेवा (PPS)
सिविल सेवा की परीक्षा पहले कहां होती थी?
सिविल सेवा की परीक्षा पहले लंदन में होती थी.
भारत में पहली बार कब हुई थी सिविल सेवा की परीक्षा?
1922 में सिविल सेवा परीक्षा पहली बार भारत में आयोजित की गई.
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लेखक के बारे में
By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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