क्या आप जानते हैं, आजादी के बाद पाकिस्तान के पास नहीं थी अपनी करेंसी, भारतीय नोट पर पाकिस्तान का स्टांप लगाकर चलाया था काम

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Indian Currency Notes With Pakistan Printed On Them

भारत के नोट पर पाकिस्तान की मुहर

Story Of Partition Of India : 1947 में जब भारत दो टुकड़ों में बंटा तो यहां की तमाम चीजों का बंटवारा हुआ, जिसमें सरकारी खजाने, फर्नीचर, रेलवे, पुस्तकें, डाक टिकट, झाडू़, साइकिल बग्गी, गाड़ियां अनाज और सड़कों का भी विभाजन अंग्रेजी हुकूमत ने कर दिया. लेकिन कुछ ऐसी चीजें भी थीं जिनका विभाजन संभव नहीं था और भारत ने उन चीजों पर अपना हक जताया और विभाजन से मना कर दिया. ऐसी ही चीजों में शामिल था वह प्रेस जहां भारतीय नोट और डाक टिकट छपते थे. चूंकि प्रेस का बंटवारा नहीं हुआ तो एक साल तक पाकिस्तान के पास अपना नोट नहीं था और वह भारतीय मुद्रा पर पाकिस्तान का रबर स्टांप लगाकर इस्तेमाल करता था.

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Story Of Partition Of India 4 : भारत विभाजन की प्रक्रिया जब शुरू हुई तो कांग्रेस ने सबसे पहले देश के नाम भारत पर अपना दावा ठोंका और यह कहा कि वह भारत नाम पर अपना एकाधिकार चाहता है और इस मसले पर वह किसी भी तरह के समझौते के पक्ष में नहीं है. हालांकि उस वक्त इस तरह के सुझाव सामने आए थे कि देश का नाम हिंदुस्तान कर दिया जाए. लेकिन इस सुझाव को कांग्रेस ने अस्वीकार कर दिया और भी कहा कि चूंकि पाकिस्तान, भारत से अलग होकर जा रहा है इसलिए भारत नाम पर हमारा हक है और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं में भारत की जो हैसियत थी वो भारत की होगी ना कि पाकिस्तान की.

विभाजन के वक्त क्या थी स्थिति?

विभाजन के वक्त जब सूची तैयार की जा रही थी तो दोनों तरफ से ही खूब बहस हुई और अपने-अपने दावे ठोके गए. कइयों ने अच्छे सामानों को छुपाकर टूटी-फूटी कुर्सी और मेज तक रखे, ताकि उन्हें फायदा हो. बंटवारे पर बहस होती, मारपीट जैसी स्थिति हो जाती और मारपीट भी होती, तब जाकर फैसला होता कि कौन सी चीज कहा जाएगी. फ्रीडम एड मिडनाइट में डोमिनीक लापिएर और लैरी काॅलिन्स लिखते हैं कि लाइब्रेरी की किताबों को लेकर तो इतना झगड़ा हुआ कि किसी किताब का एक हिस्सा पाकिस्तान में तो दूसरा भारत में रहा. डिक्शनरी के दो हिस्से करके बांट दिए गए. चूंकि भारत और पाकिस्तान का विभाजन धर्म के आधार पर हो रहा था इसलिए एक बड़ा मसला था जिसपर काफी विवाद हो रहा था. यह मामला था समुद्र में मारे गए जहाजियों की पत्नियों को पेंशन देने का. अगर कोई मुस्लिम महिला भारत में रह जाती है, तो क्या उसे पेंशन पाकिस्तान देगा? हिंदू महिला को क्या पेंशन भारत देगा? ऐसे कई प्रश्न थे, जिनका जवाब तलाशना काफी मुश्किल हो रहा था. भारत के हिस्से में कितनी मील सड़क आएगी, पाकिस्तान का हक कितने रेल लाइनों पर होगा?

गुप्तचर विभाग की चीजों का विभाजन नहीं हुआ

भारत के बंटवारे के वक्त कई ऐसी चीजें भी थीं, जिनका बंटवारा संभव नहीं था और उनमें से एक थी गुप्तचर विभाग की फाइलें. भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर दिया था वे एक भी फाइल या विभाग का कुछ भी सामान पाकिस्तान को नहीं देंगे, जिसकी वजह से गुप्तचार विभाग के सामानों का बंटवारा नहीं हुआ. 

नोट और डाक टिकट का भी नहीं हुआ बंटवारा

Story Of Partition Of India
भारतीय डाक टिकट और नोट जिसपर मुहर लगाकर पाकिस्तान ने इस्तेमाल किया

भारत के विभाजन के फलस्वरूप दो देश अस्तित्व में आए थे-भारत और पाकिस्तान. अब समस्या यह थी कि भारत में नोट और डाक टिकट जिस प्रेस में छपता था, वह प्रेस एक ही था. भारत ने यह स्पष्ट कर दिया नोट और डाक टिकट किसी भी देश की पहचान है और वे इस प्रेस का बंटवारा नहीं कर सकते हैं. परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान को लगभग एक साल तक भारत की मुद्रा ही अपनानी पड़ी, वे इन नोटों पर रबर से बना स्टांप लगाकर नोट को अलग करते थे.

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भारत ने पाकिस्तान को नहीं दिया चावल 

पाकिस्तान ने भारत सरकार से यह आग्रह किया था कि उनके सिंध प्रांत से 11 हजार टन चावल भारत भेजा गया था, वह उन्हें वापस कर दिया जाए. लेकिन भारत ने यह आग्रह स्वीकार नहीं किया. यहां गौर करने वाली बात यह है कि भारत ने किसी बुरे इरादे से चावल नहीं लौटाने का फैसला नहीं किया था, बल्कि चावल इसलिए नहीं दिया गया, क्योंकि वह चावल भारत के पास था ही नहीं, उसे खा लिया गया था. 

ताजमहल को तोड़कर पाकिस्तान भेजने की थी मांग

कुछ कट्टरपंथी यह मुसलमान यह चाहते थे कि ताजमहल को तोड़कर पाकिस्तान भिजवा दिजा जाए, क्योंकि ताजमहल का निर्माण एक मुसलमान शासक ने करवाया था. उसी तरह हिंदू यह चाहते थे कि सिंधु नहीं उन्हें मिलनी चाहिए, क्योंकि वेद की रचना इसी नदी के किनारे हुई थी. भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान कुछ चीजें ऐसी थीं, जिनका बंटवारा सिक्का उछाल कर किया गया. सिर्फ एक चीज थी जो ना तो भारत के हिस्से आई ना पाकिस्तान की. वो चीज था एक बिगुल. जब वायसराय के अस्तबल के सामानों का बंटवारा हो रहा था, तो उसमें एक बिगुल निकला, जिसे लेकर लड़ाई होने लगी.कुछ लोग उसके टुकड़े करना चाहते थे, तब वायसराय के एसडीसी ने उसे निशानी के तौर पर रखने की बात कही और उसे लेकर चले गए.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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