जब पड़ोसियों को भी जिंदा जलाने और नाखूनों से नोंचकर मारने में लोगों ने नहीं किया संकोच!

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 14 Jan 2025 5:36 PM

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भारत का विभाजन, 1947

Story Of Partition Of India : भारत के विभाजन की त्रासदी ने 10 लाख से अधिक लोगों को अपना शिकार बनाया. अंग्रेजों ने हिंदू और मुसलमानों के बीच नफरत की आग इस तरह फैला दी थी कि वे एक दूसरे की शक्ल नहीं देखना चाहते थे और पागलपन इस कदर हावी था कि जिंदा जला देने और नाखूनों से नोंचकर हत्या करने के लिए भी लोग आमादा थे. आबरू बचाने के लिए महिलाओं को घर वालों ने मार डाला या फिर उन्होंने आत्महत्या कर ली. रावलपिंडी का थोहा खालसा गांव इस बात का प्रमाण देता है.

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Story Of Partition Of India 2 : ‘आज सायंकाल 5 बजकर 20 मिनट पर दिल्ली में महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई, उनका हत्यारा हिंदू था.’ 30 जनवरी 1948 को रेडियो से शाम के छह बजे यह शोक समाचार प्रसारित किया गया. बिड़ला हाउस से पुलिस ने रेडियो को जो जबसे महत्वपूर्ण समाचार भेजा था, उसमें इस बात का जिक्र किया गया था कि बापू का हत्यारा नाथूराम गोडसे हिंदू ब्राह्मण है. उस वक्त महात्मा गांधी के हत्यारे के बारे में यह बताना बहुत जरूरी था कि वह हिंदू था, क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो हिंदुस्तान एक बार फिर सांप्रदायिक दंगे की आग में झुलसने लगता. बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी ने अपने जीवन के अंतिम लगभग 144 दिन बिताए थे और यहीं उनकी हत्या भी हुई थी. इस घटना का जिक्र आज इसलिए क्योंकि गणतंत्र दिवस के 75 साल पूरे होने के मौके पर हम उन घटनाओं का स्मरण कर रहे हैं, जिनका असर हमारे देश और समाज पर आज भी दिखता है. भारत का विभाजन धर्म के नाम पर हुआ था, जिसने नफरत की एक दीवार देश में खड़ी कर दी थी.

 Story Of Partition Of India : 10 लाख लोगों की हुई थी मौत

अंग्रेजों ने भारत को आजादी देते हुए जो घिनौना खेल खेला था, उसकी वजह से पूरा देश हिंदू-मुस्लिम हिंसा की आग में धधक उठा था और कुल 10 लाख लोगों की मौत हुई थी. उस वक्त ब्रिटिश सरकार को यह अंदेशा भी नहीं था कि विभाजन की यह आग इस कदर फैलेगी. डोमनीक लापिएर और लैरी काॅलिन्स ने अपनी किताब ‘फ्रीडम एड मिडनाइट’ में लिखा है कि जिन लोगों को गोली मारी गई, उनकी खुशकिस्मती थी, अन्यथा अधिकतर लोगों को हैवानियत की हद तक प्रताड़ित कर मारा गया था. किसी को लाठी डंडे से पीटकर मारा गया, तो किसी को पत्थर से कूचकर. लोगों पर नफरत इस कदर हावी था कि वे पागल हो गए थे और गला दबाकर और नाखूनों से नोंचकर भी लोगों को मारने पर आमदा थे. किताब में यह जिक्र भी है कि लोगों को जिंदा जला दिया गया था और महिलाओं को मारने से पहले उनके स्तन काट दिए जाते थे और बलात्कार किया जाता था. 

रावलपिंडी दंगे से हुई थी शुरुआत

rawalpindi massacre 1947
थोहा खालसा, रावलपिंडी का कुआं, जहां कूदकर महिलाओं ने दी थी जान

भारत के विभाजन के बाद जो हिंसा फैली थी उसकी शुरुआत भारत विभाजन से पहले ही हो गई थी. ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत में एक भयंकर हिंसा हुई थी, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि इस हिंसा में 2000 से 7000 हिंदू और सिख मारे गए थे. इन लोगों की हत्या इसलिए की गई थी क्योंकि कुछ हिंदू और सिख संगठनों ने भारत के विभाजन और पाकिस्तान की मांग का विरोध किया था.इनके प्रदर्शनों से मुसलमान नाराज हो गए और इनकी नाराजगी का परिणाम सिखों और हिंदुओं की हत्या के रूप में सामने आया. ‘थोहा खालसा’ रावलपिंडी जिले का एक गांव था जहां भयंकर नरसंहार हुआ. इस गांव में सिख और हिंदू एक गुरुद्वारे में आसरा लेकर बैठे थे. यह गांव सिखों का था, लेकिन आसपास मुसलमानों के गांव थे, जहां से हमलावर आए और गांव वालों पर हमला किया. गांव के लोगों ने पैसे देकर जान बचाने की कोशिश भी की, लेकिन बात नहीं बनी और अंतत: गांव के लगभग 200 लोग मारे गए, महिलाएं जिनकी संख्या सौ के आसपास बताई जाती है, अपने बच्चों के साथ गुरुद्वारा परिसर में स्थित कुएं में कूद गईं. कुछ महिलाओं को उनके घरवालों ने ही तलवार से काट दिया, ताकि वे बलात्कार और अन्य प्रताड़ना का शिकार ना हों.

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रावलपिंडी दंगे का असर पूरे देश पर हुआ

रावलपिंडी में जो नरसंहार हुआ, उसने नफरत की आग पूरे देश में भड़का दी थी. हिंदू और सिखों ने  मुसलमानों से बदला लेने की ठान ली थी. बदले की भावना तब और खतरनाक हो गई जब देश का विभाजन भारत और पाकिस्तान के रूप में स्वीकार कर लिया गया. जिस इलाके में जिसका दबदबा था उन्होंने अल्पसंख्यकों पर अत्याचार किया. सिर्फ हिंदू और सिख ही इस दंगे में नहीं मारे गए बल्कि मुसलमान भी हजारों की संख्या में मारे गए. 

1.5 करोड़ लोगों को अपनी जमीन छोड़कर दूसरी ओर जाना था

Partition of India
1. 5 करोड़ लोगों का घरबार छूटा

जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ तो 10 मिलियन यानी एक करोड़ हिंदुओं को अपना घरबार छोड़कर भारत की धरती पर आना था, वहीं भारत से 5 मिलियन यानी 50 लाख मुसलमानों को पाकिस्तान जाना था. इनके लिए कोई खास इंतजाम नहीं थे, ये मीलों पैदल चलकर अपना सफर तय कर रहे थे. रास्ते में कई लोग हिंसा का भी शिकार बने, कुछ तकलीफ झेल नहीं पाए और मर गए, कुछ भूख से मर गए और इस तरह के लोगों की संख्या हजारों-लाखों में थी. यही वजह है कि 10 लाख से अधिक लोग इस विभाजन की त्रासदी का शिकार बने और मारे गए.

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FAQ : रावलपिंडी नरसंहार कब हुआ था?

रावलपिंडी नरसंहार आजादी से पहले मार्च 1947 में हुआ था.

भारत का विभाजन किस आधार पर हुआ?

भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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